दुनिया कौन चला रहा है?
इतिहास में कभी-कभी कुछ ऐसा घटता है कि दुनिया को कठपुतली बनाकर नचाने वालों का भांडा फूट जाता है।
— प्रेरणा
क्या मतलब है 'इकानामिक हिटमैन' का? पर्किन्स बताते हंै कि दुनिया के सभी अमीर देश 'इकानामिक हिटमैन' पालते हैं जिनका काम ही है कि वे विकासशील देशों के नेताओं से नजदीकी रिश्ता बनाते हैं और फिर 'विकास या संपन्नता' या 'गरीबी हटाओ' जैसे लुभावने मंजर दिखाकर, उन्हें बड़े विदेशी ऋण लेने के लिए तैयार करते हैं। वे बताते हैं कि आपको ऋण के लिए कहीं जाने की ज़रूरत नहीं, वह हम लाकर देंगे!
इतिहास में कभी-कभी कुछ ऐसा घटता है कि दुनिया को कठपुतली बनाकर नचाने वालों का भांडा फूट जाता है। ऐसा ही कुछ हुआ था 2004 में, जब जॉन पर्किन्स नाम के एक सज्जन ने 'कंफ़ेशन्स ऑफ एन इकानामिक हिटमैन' (एक आर्थिक हत्यारे की स्वीकारोक्ति) किताब प्रकाशित की थी। इस पर बड़ा हंगामा हुआ था, लेकिन कोई उसे झुठला नहीं सका, क्योंकि पर्किन्स ने किताब की शुरूआत में ही बता दिया था कि वे खुद भी एक 'इकानामिक हिटमैन' रहे थे।
क्या मतलब है 'इकानामिक हिटमैन' का? पर्किन्स बताते हंै कि दुनिया के सभी अमीर देश 'इकानामिक हिटमैन' पालते हैं जिनका काम ही है कि वे विकासशील देशों के नेताओं से नजदीकी रिश्ता बनाते हैं और फिर 'विकास या संपन्नता' या 'गरीबी हटाओ' जैसे लुभावने मंजर दिखाकर, उन्हें बड़े विदेशी ऋण लेने के लिए तैयार करते हैं। वे बताते हैं कि आपको ऋण के लिए कहीं जाने की ज़रूरत नहीं, वह हम लाकर देंगे!
पर्किन्स लिखते हंै कि यह मछली फंसाने जैसा है। एक बार मछली फंसी तो अमेरिका-यूरोप की सरकारों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों की चांदी हो जाती है। विकास के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर जरूरी है, सो ऐसी परियोजनाओं के लाभ का लुभावना सब्जबाग ऐसा खड़ा किया जाता है कि विकासशील देशों की सरकारें बड़े-बड़े ऋण ले लेती हैं। ऋण का पैसा उनके हाथ आता भी नहीं है, क्योंकि उन्हीं अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के एजेंट विकास परियोजनाओं का ठेका भी ले लेते हैं। जिसका पैसा था, उसी की जेब में वापस पहुंच जाता है, जबकि ऋण लेने वाले देश पर कर्ज लद जाता है।
एक बार देश कज़र् में फंसा तो शुरू होता है महाशक्तियों का खेल! कर्ज माफी या कर्ज की शर्तों में ढील के नाम पर उस देश पर जबर्दस्त राजनीतिक, आर्थिक या सैन्य दबाव डाला जाता है, ताकि वह अपनी राष्ट्रीय नीतियों में उनके अनुकूल बदलाव करे तथा अपने प्राकृतिक संसाधनों को निजी कंपनियों के लिए खोल दे। कर्जदार देश घुटने टेक देता है और 'इकानामिक हिटमैन' अपना कमीशन लेकर आगे चल देता है - नया देश, नया शिकार खोजने।
पर्किन्स की किताब पढ़ते हुए मुझे 1991 का आर्थिक संकट याद आया। तब भारत का 'विदेशी मुद्रा भंडार' लगभग खत्म हो चुका था। बताया गया था कि मात्र 2-3 हफ्तों की जरूरत लायक डॉलर देश के पास बचे हैं। सरकार को 'अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष' (आईएमएफ) और 'विश्वबैंक' से आपातकालीन ऋण लेना पड़ा। ऋण तो मिला, लेकिन उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण उस ऋण के साथ आया।
आपको 'विकीलीक्स' याद है? एक अंतरराष्ट्रीय वेबसाइट जो गुप्त सरकारी व कॉर्पोरेट दस्तावेज़ों की जासूसी कर, उन्हें सार्वजनिक करती है? इसकी स्थापना 2006 में जूलियन असांजे नामक युवा ने की थी। वह कहता था कि सरकारों, शक्तिशाली वित्तीय संस्थाओं आदि के गुप्त दस्तावेजों का खुलासा करना जरूरी है, ताकि लोग जान सकें कि उनके साथ कितना ख़तरनाक खेल हो रहा है। इससे सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता बढ़ेगी और 'दादा' देश जवाबदेही से काम करेंगे। इससे नाराज़ होकर सरकारों ने असांजे को जेल में डाला, देश-निकाला भी दे दिया। आज वह दर-दर की ठोकरें खा रहा है, पोशीदा जीवन जी रहा है।
'विकीलीक्सÓ के खुलासों से 2008 के भारत-अमेरिका परमाणु समझौते और उससे जुड़े सांसदों को कथित रिश्वत दिए जाने के आरोप सामने आए। आज की देखें तो अमेरिका के साथ टैरिफ विवाद के बीच भारत सरकार 'एटॉमिक एनर्जी एक्ट, 1962Ó और 'सिविल लायबिलिटी फॉर न्यूक्लियर डैमेज एक्ट, 2010' में बदलाव ला रही है। बात सीधी है: टैरिफ में छूट चाहते हो तो परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को निजी और विदेशी निवेश के लिए खोलना होगा।
सालों पहले जिस एपस्टीन की मौत हो चुकी है उसके सेक्स-कांड की परतें जिस तरह खुल रही हैं, उससे लगता है मानो वह कब्र से बोल रहा हो। दरअसल, एपस्टीन सिफ़र् एक अमीर कारोबारी नहीं था; वह सत्ता के गलियारों में सक्रिय एक बेहद असरदार दलाल था। पैसे और प्रतिष्ठा की आड़ में उसने दुनिया के बड़े-बड़े राजनेताओं, धनकुबेरों, वैज्ञानिकों, विचारकों, शिक्षाविदों और स्वयंभू समाजसेवियों का एक घना और प्रभावशाली नेटवर्क खड़ा कर लिया था। इसी नेटवर्क के भीतर वह लोगों की कमजोरियों और वासनाओं को हथियार बनाता था। नतीजे में यह जाल इतना शक्तिशाली बन गया कि उसके जरिए वह दुनिया के किसी भी कोने से अपने मनमुताबिक काम निकलवा सकता था।
ऐसे में मैं गांधी की बात करूं? तब आजादी निकट थी। एक पत्रकार ने पूछा: क्या आजाद भारत अपने विकास के लिए ब्रिटेन का मॉडल अपनाएगा? 'छोटे-से ब्रिटेन को अपनी दादागिरी बनाए रखने के लिए पूरी दुनिया पर राज करना पड़ा था,'गांधीजी ने तक्षण जवाब दिया, 'अगर विशाल भारत वही रास्ता अपनाएगा तो उसके लिए तो दुनिया भी कम पड़ जाएगी!' क्या कह रहे थे गांधीजी? यही कि यह विकास विनाश का दूसरा नाम है।
कल के इंग्लैंड की बात छोड़िए, आज के अमेरिका को ही देखिए! सबसे अमीर देश बने रहने के लिए वह एक पागल हाथी की तरह घूम रहा है। ट्रंप की घोषणा है कि अमेरिका दुनिया भर से टैक्स वसूलेगा और अपना सामान बिना टैक्स हर जगह बेचेगा। तेल की लूट करने और अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए वह कहीं नेताओं का अपहरण कर रहा है, कहीं उनका क़त्ल करवा रहा है, कहीं युद्ध भड़का रहा है, कहीं बगावत करने उकसा रहा है। दुनिया के कई देश उसके सामने झुक रहे हैं जिनमें भारत भी शामिल है। आज अमेरिका तय कर रहा है कि हम किससे तेल खरीदें, किससे कूटनीतिक संबंध रखें, किससे युद्ध करें, कब समझौता कर लें।
इसे जंगल का कानून कहते हैं। सभ्य समाज की रीत क्या है? गांधीजी कहते हैं: स्वदेशी! 'मेक इन इंडिया' नहीं, 'मेड इन इंडिया!' जब भी हम कुछ खरीदें, यह सोचें कि हमारा पैसा किसकी जेब में जा रहा है? अपने गांव में किसी की, पड़ोसी गांव में किसी की या फिर अपने ही देश में किसी की? अगर हां, तो यह स्वदेशी है ! दुनिया पर्यावरण संकट से जूझ रही है इसलिए उत्पादन और तकनीक दोनों ऐसे हों कि प्राकृतिक संतुलन बिगड़े नहीं व मानवीय श्रम लुटे नहीं। यह होगा तब कोई पूछेगा कि दुनिया कौन चला रहा है तो हम गर्व से कह सकेंगे: अपनी दुनिया हम स्वयं चला रहे हैं। आजादी का यही मतलब है।
(सुश्री प्रेरणा सामाजिक कार्यकर्ता और गांधीवादी-अर्थशास्त्र की अध्येता हैं।)