मोदीशाही : नाकामियों के लिए अब युद्घ की ओट

मोदी राज के अधिकांश हिस्से में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम, यूपीए के दस वर्ष के दौरान रहे औसत दाम से आधे या उससे थोड़े ही ज्यादा रहे थे।;

Update: 2026-05-21 21:40 GMT
  • राजेन्द्र शर्मा

मोदी राज के अधिकांश हिस्से में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम, यूपीए के दस वर्ष के दौरान रहे औसत दाम से आधे या उससे थोड़े ही ज्यादा रहे थे। इस सस्ते दाम और ईरान तथा रूस से तेल पर उपलब्ध अतिरिक्त रियायतों को जोड़ लिया जाए तो, यह इसके लिए बहुत अच्छा मौका था कि भारत, तेल के अपने रणनीतिक भंडार बढ़ा लेता, जैसा कि चीन ने किया भी।

बंगाल फतह करने के दर्प से दमकते और उसके ऊपर से गुजरात में सोमनाथ के आयोजन से अपने हिंदू हृदय सम्राटत्व की पुनर्पुष्टिï की चमक चेहरे पर लिए हुए, प्रधानमंत्री मोदी जब बारास्ता यूएई यूरोप की पांच दिन की यात्रा पर पहुंचे, तो उन्हें यह देखकर कुछ झटका तो जरूर लगा होगा कि उनके राज में भारत वास्तव में किस रास्ते पर चल रहा है, उसकी सच्चाई नैरेटिव नियंत्रण और मीडिया 'प्रबंधन' में उनकी तमाम कामयाबियों के बावजूद, सात समंदर पार पहुंच चुकी है।

पहले प्रधानमंत्री के नीदरलैंड के दौरे के संयुक्त प्रेस संबोधन के समापन के मौके पर, प्रधानमंत्री मोदी द्वारा मीडिया के सवालों के लिए मौका ही नहीं दिए जाने पर, जिसे कि वर्तमान भारतीय प्रधानमंत्री ने अपनी नीति ही बना लिया है, डच पत्रकारों ने विरोध जताया। इससे भी महत्वपूर्ण यह कि प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा की पूर्व-संध्या में एक प्रमुख डच प्रकाशन, डी फोक्सक्राट ने डच प्रधानमंत्री रॉब जेट्टïेन को यह कहते हुए उद्धृत किया था कि, 'भारत के घटनाक्रमों को लेकर अनेक चिंताएं हैं' और ये चिंताएं प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर ही नहीं हैं, 'अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर भी हैं...जो भारी दबाव में हैं।' प्रधानमंत्री मोदी के ही दौरे के सिलसिले में विदेश मंत्रालय द्वारा बाद में बुलायी गयी पत्रकार वार्ता में, जब डच पत्रकारों ने यह सवाल किया कि क्या प्रधानमंत्री जेट्टïेन ने प्रधानमंत्री मोदी से वार्ताओं में उक्त चिंताओं को उठाया था, भारत के विदेश मंत्रायल में सचिव (पश्चिम), सिबी जार्ज ने इसके जवाब में भारतीय सभ्यता की महानता से लेकर भारत की विशालता तक पर, दस-पंद्रह मिनट का लैक्चर ही नहीं पिलाया, इस तरह के सवाल उठाने वालों को भारत के संबंध में पूरी तरह ना-जानकार भी करार दे दिया।

बहरहाल, पत्रकारों के सवालों ने प्रधानमंत्री मोदी का पीछा नहीं छोड़ा। मोदी के नार्वे दौरे के क्रम में, जब प्रधानमंत्री मोदी, नार्वे के प्रधानमंत्री जोनास स्टोर के साथ प्रेस वक्तव्य जारी करने के बाद जाने लगे, एक साहसी महिला पत्रकार लिंग स्वेन्ड्स ने उन्हें इस सवाल से घेरने की कोशिश की कि, 'आप दुनिया के सबसे स्वतंत्र प्रेस के सवालों का सामना क्यों नहीं करते?' बाद में, विदेश मंत्रालय की ओर से आयोजित पत्रकार वार्ता में, सिबी जार्ज ने एक बार फिर भारत की महानता और विशालता का अपना भाषण सुनाया। लेकिन, इससे पहले सुश्री स्वेन्ड्स और उनके साथी पत्रकारों को अपना सवाल और स्पष्टï करने का भी मौका मिल गया: 'मानवाधिकारों के मामले में भारत के रिकार्ड को देखते हुए, हम आप (के राज के भारत) पर क्यों विश्वास कर लें?'

अगर मोदी राज के भारत की बदनामी की डोंगी पिटने में मोदी के पलायन और विदेश मंत्रालय के अफसर के प्रवचन के बाद भी कोई कसर रह गयी थी, तो वह इस पूरे प्रकरण में मोदी भक्त सोशल मीडिया के कूद पड़ने से पूरी हो गयी। कहने की जरूरत नहीं है कि इसने मानवाधिकारों तथा अल्पसंख्यकों के अधिकारों के मामले में, मोदी के भारत के शर्मनाक रिकार्ड को तो योरोपीय मीडिया में गाढ़े रंग से रेखांकित किया ही, हाथ के हाथ इस सवाल का भी जवाब दे दिया कि मोदी के राज में भारत, प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में, दुनिया के 180 देशों में से 157वें स्थान पर और वास्तव में श्रीलंका, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल से भी नीचे क्यों है?

भारत में प्रेस की स्वतंत्रता का इस दयनीय हालत में पहुंचाने के ही बल पर, मोदी निजाम अपनी विफलताओं के लिए नये-नये नैरेटिव गढ़ने और उन्हें जनता के बीच चलाने में इतना कामयाब रहा है। जाहिर है कि यह कारनामा अकेले मोदी की पार्टी या उनके संघ परिवार का भी नहीं है, यह कारनामा है संघ-भाजपा जोड़ी के साथ उस इजारेदार पूंजी के पक्के गठजोड़ का, जिसका सोशल मीडिया समेत, मीडिया के अधिकांश हिस्से पर नियंत्रण है। यही मशीन विधानसभा चुनावों के हालिया चक्र के फौरन बाद से, मोदी राज की चौतरफा दिखाई दे रही विफलताओं को ढांपने के लिए, एक नया नैरेटिव गढ़ने में जुटी हुई है। नैरेटिव यह है कि तेल के संकट से लेकर, रुपए के अवमूल्यन, बढ़ते व्यापार घाटे, घटती औद्योगिक विकास दर, घटते विदेशी मुद्रा भंडार तथा बढ़ती बेरोजगारी तक, जो भी संकट दिखाई दे रहे हैं, सब के लिए बाहर की परिस्थितियां ही जिम्मेदार हैं। मोदी राज पर, उसकी नीतियों पर, इस सब की कोई जिम्मेदारी नहीं है।

विधानसभाई चुनाव के नतीजे आते ही, नरेंद्र मोदी ने तेल के संकट का ही नहीं आम तौर पर आर्थिक संकट आने का भी ऐलान कर दिया और नागरिकों पर तेल बचाने तथा तरह-तरह से विदेशी मुद्रा बचाने समेत, हर मामले में कटौती करने की जिम्मेदारी डाल दी, ताकि वर्तमान संकट से देश को बचाया जा सके। प्रधानमंत्री मोदी ने नीदरलैंड में प्रवासी/ अनिवासी भारतीयों के सामने अपने संबोधन में, संकट की अपनी चेतावनी को और आगे बढ़ाया। उन्होंने कहा कि इस संकट में विश्व की दशकों की प्रगति डूब जाने का खतरा है। करोड़ों लोगों के गरीबी में धंस जाने का खतरा है!

इस नैरेटिव की समस्या, इसकी संकट की पहचान में नहीं है, हालांकि संकट की सच्चाई को मोदी सरकार अब तक छुपाने की जितनी कोशिशें करती आ रही थी, उसकी कोई भी आलोचना करेगा। सच तो यह है कि पश्चिम एशिया में छिड़े युद्घ तथा खासतौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य का महत्वपूर्ण तेल मार्ग बंद होने से, एक ओर तेल की आपूर्ति का और दूसरी ओर तेल के दाम का जो संकट पैदा हुआ है, विधानसभा चुनावों के संपन्न होने तक तो मोदी निजाम उसे भी नकारने में ही लगा रहा था। चुनाव के नतीजे आते ही, डीजल तथा पेट्रोल के दाम में तीन-तीन रुपए और सीएनजी के दाम में दो रुपए की बढ़ोतरी ही नहीं की गयी, अब तेल मार्केटिंग कंपनियों को छोटी-छोटी किस्तों में दाम बढ़ाते रहने का जैसे इशारा ही दे दिया गया है। चार दिन में ही दो बार की बढ़ोतरी में तेल के दाम 4 रुपए और सीएनजी के 3 रुपए बढ़ाए जा चुके हैं।

वास्तव में इस प्रकटत: बाहरी संकट के असर से भारत को बचाने के लिए मोदी सरकार कम से कम तीन तरह की चीजें कर सकती थी, जो उसने नहीं कीं या जिनका उल्टा किया और इस तरह उसने भारत के लिए इस संकट को और बढ़ा दिया है।

पहली का संबंध, मोदी सरकार की विदेश नीति से ही है। यूपीए की सरकार के वक्त में भारत को अमेरिका के साथ रणनीतिक रूप से बांधने की जो शुरूआत हुई थी, उसे मोदी राज ने संघ-भाजपा की अमेरिका भक्ति के अनुरूप, अमेरिका की अधीनस्थता की नीति तक और संघ-भाजपा के इ•ारायल प्रेम के अनुरूप, इ•ारायल-अनुराग तक पहुंचा दिया। इसी का नतीजा था कि भारत ने पहले अमेरिकी पाबंदियों के चलते ईरान से काफी सस्ता पड़ने वाला तेल खरीदना बंद किया, फिर रूस से सस्ता तेल खरीदना अमेरिका की अनुमति से कभी शुरू किया और कभी बंद किया। और अंतत: अमेरिका के महंगे तेल पर अपनी निर्भरता बढ़ाना मंजूर कर लिया। अब स्थिति यह है कि भारत पूरी तरह से, अमेरिका-इ•ारायल की हमलावर धुरी से जुड़ चुका है, जिस पर ईरान पर हमले से ठीक पहले प्रधानमंत्री मोदी की इ•ारायल यात्रा ने मोहर भी लगा दी थी और ईरान तथा रूस से तेल के उसके रास्ते बंद हैं। जाहिर है कि यह सब मोदी सरकार की अदूरदर्शी नीतियों का ही नतीजा है। दूसरे, जैसा कि नरेंद्र मोदी ने खुद एक बार सार्वजनिक रूप से शेखी मारते हुए कहा था—'मैं खुशनसीब हूं कि मेरे समय में तेल के (अंतरराष्ट्रीय) दाम घटे हैं। मोदी राज के अधिकांश हिस्से में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम, यूपीए के दस वर्ष के दौरान रहे औसत दाम से आधे या उससे थोड़े ही ज्यादा रहे थे। इस सस्ते दाम और ईरान तथा रूस से तेल पर उपलब्ध अतिरिक्त रियायतों को जोड़ लिया जाए तो, यह इसके लिए बहुत अच्छा मौका था कि भारत, तेल के अपने रणनीतिक भंडार बढ़ा लेता, जैसा कि चीन ने किया भी। लेकिन, भारत में इन भंडारों में यूपीए के बाद कोई बढ़ोतरी ही नहीं हुई। मोदी सरकार ने तो इस मौके का इस्तेमाल, दो चीजों के लिए ही किया। पहला, रूस के सस्ते तेल से भारतीय निजी तेल शोधन तथा व्यापार कंपनियों को, यह तेल योरोप को महंगे दाम पर बेचकर, अनाप-शनाप कमाई करने का मौका देने के लिए। दूसरा, भारत में घरेलू उपभोक्ताओं से तेल के लिए, यूपीए के दौर के मुकाबले डेढ़ गुना या उससे भी ज्यादा दाम वसूलने और इसके लिए पेट्रोल-डीजल पर बेहिसाब कर बटोरने के जरिए, सरकारी तिजोरियां भरने के लिए। और जनता को निचोड़कर की गयी इस अवैध कमाई को अंतत: अपने इजारेदार मित्रों को तरह-तरह की सीधी रियायतें देने में और पुन: विकास के नाम पर उनकी अंधाधुंध कमाई कराने के लिए, बड़े पैमाने पर नुमाइशी और आबादी के एक छोटे से तबके की ही मांग को पूरा करने वाले, ढांचागत निवेशों में झोंका गया। इससे, रोजगार तथा आर्थिक वृद्घि पर इस निवेश का असर बहुत घट गया।

अब रही रुपए के प्रति डालर 100 रुपए की ओर भाग रहे होने, विदेशी पूंजी के भारतीय बाजारों से पलायन करने, विदेश व्यापार घाटा तेजी से बढ़ने, औद्योगिक विकास दर घटने, बेरोजगारी के तेजी से बढ़ने, खेती के संकट से घिरने आदि के संकटों की बात, तो जाहिर है कि ये सभी संकट तो पश्चिम एशिया युद्घ से पहले, यूक्रेन-रूस युद्घ से भी पहले, कोरोना से भी पहले से घिर रहे थे और मोदी सरकार के नीतिगत चुनावों से निकले नहीं भी हों, तो उनसे तेजी से बढ़े जरूर थे। यह दूसरी बात है कि मीडिया पर अपने लगभग पूर्ण नियंत्रण के जरिए, मोदी सरकार तब इन जमा होते संकटों को ढांपने में या झुठलाने में ही लगी रही थी। और आज जब ये संकट एक विस्फोट के साथ सामने आते जा रहे हैं, मोदीशाही अपनी चौतरफा नाकामियों को छुपाने के लिए, पश्चिम एशिया युद्घ के पीछे छुपने की कोशिश कर रही है।

(लेखक साप्ताहिक पत्रिका लोक लहर के संपादक हैं।)

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