ईरान और इजरायल के बीच है, असली अदावत
ईरान ने मध्य-पूर्व में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए इजरायल की सीमाओं के निकट 'प्रतिरोध की धुरी' (एक्सिस ऑफ रेसिसटेंस) का गठन किया,;
- विवेकानंद माथने
ईरान ने मध्य-पूर्व में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए इजरायल की सीमाओं के निकट 'प्रतिरोध की धुरी' (एक्सिस ऑफ रेसिसटेंस) का गठन किया, जिसमें सीरिया की सरकार, लेबनान का 'हिजबुल्लाह,' गाजा का 'हमास' और यमन के 'हूती' विद्रोही शामिल हैं। इनका मुख्य उद्देश्य क्षेत्र में इजरायल और अमेरिकी प्रभाव का विरोध करना तथा फिलिस्तीनी संघर्ष का समर्थन करते हुए उनकी भूमि वापस पाना है।
ईरान और इजरायल के बीच संघर्ष विचारधारा, साम्राज्यवाद-विरोध, धार्मिक मान्यताओं और क्षेत्रीय वर्चस्व की लंबी ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम है। सवाल है कि 1979 के बाद ईरान इस संघर्ष में कैसे सक्रिय हुआ, उसकी वैचारिक दिशा क्या रही और किस प्रकार यह संघर्ष समय के साथ गहराता हुआ आज व्यापक क्षेत्रीय टकराव का रूप ले चुका है? 1948 में फिलिस्तीन की भूमि पर इजरायल की स्थापना के बाद, फिलिस्तीनियों द्वारा अपनी जमीन और अधिकारों को पुन: प्राप्त करने के प्रयासों के साथ संघर्ष के एक नए दौर की शुरुआत हुई।
इस संघर्ष के दौरान इजरायल अपनी सैन्य शक्ति के बल पर लगातार सीमाओं का विस्तार करता गया और फिलिस्तीनियों को उनके ही मूल क्षेत्रों से पीछे धकेलता रहा। विडंबना यह रही कि इन मुद्दों पर वैश्विक प्रतिक्रिया सीमित और असंगत रही है। लोकतंत्र और मानवाधिकारों की रक्षा का दावा करने वाले किसी भी देश ने इजरायल की विस्तारवादी नीति का विरोध और फिलिस्तीनियों के अधिकारों को बहाल करने के लिए प्रभावी और निर्णायक हस्तक्षेप नहीं किया।
1979 की 'इस्लामी क्रांति' के बाद ईरान में इस्लामी गणराज्य की स्थापना हुई। नई सरकार ने शाह के शासनकाल में इज़रायल के साथ रहे सभी संबंधों को पूरी तरह समाप्त कर दिया। ईरान ने इज़रायल को 'छोटा शैतान' और अमेरिका को 'बड़ा शैतान' की संज्ञा देते हुए इज़रायल को एक अवैध राष्ट्र घोषित कर दिया। इसके साथ ही ईरान ने इज़रायल के साथ सभी राजनयिक संबंध भी खत्म कर दिए। यहीं से इज़रायल और अमेरिका के विरुद्ध ईरान के वैचारिक विरोध की स्पष्ट शुरुआत हुई।
'इस्लामी क्रांति' के बाद ईरान ने दुनिया के उपेक्षित, दबे-कुचले समुदायों के समर्थन को अपनी विदेश नीति का आधार बनाया। ईरान के अनुसार फिलिस्तीनियों को उत्पीड़ित करके अपनी ही जमीन पर कैदी बना दिया गया है। वह उन लोगों की मदद कर रहा है, जिन्हें दुनिया ने उनके हाल पर छोड़ दिया है। इन परिस्थितियों में ईरान के लिए सशस्त्र प्रतिरोध एक प्रमुख रणनीति के रूप में उभरा। 1982 में लेबनान पर इजरायल के आक्रमण के बाद ईरान ने 'हिज़्बुल्लाह' के गठन में सहयोग दिया, जिससे इजरायल की उत्तरी सीमा पर एक नया दबाव बना। बाद में उसने 'हमास' सहित अन्य समूहों को समर्थन देकर प्रत्यक्ष युद्ध के बजाय 'प्रॉक्सी युद्ध' की रणनीति अपनाई।
ईरान ने मध्य-पूर्व में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए इजरायल की सीमाओं के निकट 'प्रतिरोध की धुरी' (एक्सिस ऑफ रेसिसटेंस) का गठन किया, जिसमें सीरिया की सरकार, लेबनान का 'हिजबुल्लाह,' गाजा का 'हमास' और यमन के 'हूती' विद्रोही शामिल हैं। इनका मुख्य उद्देश्य क्षेत्र में इजरायल और अमेरिकी प्रभाव का विरोध करना तथा फिलिस्तीनी संघर्ष का समर्थन करते हुए उनकी भूमि वापस पाना है।
अमेरिका ने ईरान के पड़ोसी देशों में अपने सैन्य ठिकाने स्थापित कर क्षेत्र में महाशक्ति के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है और दबाव बनाए रखा है। वहीं, इजरायल 'संयुक्त राष्ट्र संघ' के प्रस्तावों का उल्लंघन करते हुए 'वेस्ट बैंक' में बस्तियों का विस्तार और गाज़ा की घेराबंदी जारी रखे हुए है। कई विश्लेषकों के अनुसार, यह संघर्ष केवल भूभाग का नहीं, बल्कि क्षेत्रीय प्रभाव और प्रभुत्व की प्रतिस्पर्धा का भी है।
ईरान का मानना है कि इजरायल केवल एक देश नहीं, बल्कि मध्य-पूर्व में अमेरिका और पश्चिमी शक्तियों की एक अग्रिम चौकी है। उसके अनुसार, इजरायल का गठन इस क्षेत्र के संसाधनों पर नियंत्रण रखने और मुस्लिम देशों को कमजोर करने के लिए एक औपनिवेशिक परियोजना के तहत किया गया है। ईरान इस संघर्ष को साम्राज्यवाद और अन्याय के खिलाफ एक व्यापक लड़ाई के रूप में देखता है। इसी संदर्भ में उसने 'अल-कुद्स दिवस' की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य फिलिस्तीन के समर्थन में वैश्विक एकजुटता को मजबूत करना है।
दूसरी ओर, इजरायल इस पूरे परिदृश्य को अपनी सुरक्षा के दृष्टिकोण से देखता है। अपनी स्थापना के बाद से ही उसे अपने अस्तित्व के लिए लगातार युद्धों और हमलों का सामना करना पड़ा है। इसलिए वह अपनी सैन्य ताकत, खुफिया नेटवर्क और तकनीकी श्रेष्ठता को बनाए रखने की नीति अपनाता है और विशेष रूप से ईरान जैसे विरोधी देशों को कमजोर करने की रणनीति पर भी काम करता है।
परमाणु कार्यक्रम इस संघर्ष का एक और केंद्रीय मुद्दा है। इजरायल के पास अघोषित रूप से परमाणु हथियार हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय उस पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाता, वहीं ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लगाए गए हैं। ईरान इसे पश्चिमी देशों का दोहरा मापदंड मानता है, जबकि इजरायल का मानना है कि यदि ईरान परमाणु हथियार विकसित कर लेता है, तो उसके अस्तित्व को खतरा पैदा हो जाएगा।
ईरान का आरोप है कि इजरायल उसके खिलाफ एक गुप्त युद्ध चला रहा है। ईरानी परमाणु वैज्ञानिकों की हत्याओं, साइबर हमलों और सैन्य ठिकानों पर हमलों के पीछे इजरायल की भूमिका मानी जाती है। इजरायल द्वारा सीरिया में ईरानी ठिकानों पर किए गए हवाई हमलों को भी ईरान अपनी संप्रभुता पर हमला मानता है।
7 अक्टूबर 2023 को 'हमास' ने इजरायल पर हमला किया। इस हमले में बड़ी संख्या में इजरायली नागरिकों की मौत हुई और सैकड़ों लोगों को बंधक बनाया गया। इसके बाद इजरायल ने गाज़ा में व्यापक सैन्य अभियान शुरू किया, जिसमें अब तक 75,000 से अधिक निर्दोष फिलिस्तीनी नागरिक मारे गए, इनमें बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे शामिल हैं। गाज़ा के लगभग 19 लाख लोग विस्थापित हो चुके हैं।
इसके मानवीय प्रभावों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर चिंताएं व्यक्त की गईं हैं। 2024 में 'अंतरराष्ट्रीय न्यायालय' ने एक राय दी थी, जिसमें 1967 से फिलिस्तीनी क्षेत्रों (गाज़ा पट्टी, 'वेस्ट बैंक' और पूर्वी यरुशलम) पर इजरायल के कब्जे को अवैध बताया गया था और बस्तियों के विस्तार को अंतरराष्ट्रीय कानून के विरुद्ध माना गया था। हालांकि, इसका क्रियान्वयन 'संयुक्त राष्ट्र संघ' और उसके सदस्य देशों की राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है।
फिलहाल यह संघर्ष फिलिस्तीनियों की भूमि और अधिकारों की लड़ाई, ईरान के क्षेत्रीय प्रभाव और वैचारिक प्रतिबद्धता तथा इजरायल की सुरक्षा और अस्तित्व संबंधी चिंताओं को उजागर करता है। ईरान इसे अन्याय और विदेशी वर्चस्व के विरुद्ध 'प्रतिरोध की लड़ाई' के रूप में प्रस्तुत करता है, जो उसके लिए आत्मसम्मान और न्याय का प्रश्न है। दूसरी ओर, इजरायल अपनी सैन्य और तकनीकी श्रेष्ठता के सहारे स्वयं को सुरक्षित रखना चाहता है; उसके लिए यह संघर्ष अपने अस्तित्व और सुरक्षा को बनाए रखने का एक अनिवार्य प्रयास है।
स्पष्ट है कि यह संघर्ष केवल सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इतिहास, राजनीति, सुरक्षा और न्याय की परस्पर विरोधी धारणाओं का परिणाम है। जब तक इन बुनियादी प्रश्नों का कोई न्यायपूर्ण और सर्वमान्य समाधान नहीं निकलता, तब तक यह टकराव न केवल जारी रहेगा, बल्कि भविष्य में और भी अधिक व्यापक और विनाशकारी रूप ले सकता है।
(लेखक 'आजादी बचाओ आंदोलन' एवं 'किसान स्वराज आंदोलन' से संबद्ध हैं।)