ही ही-खी खी कूटनीति ने भारत का बनाया मजाक

इस महंगाई की सबसे पहली मार पोषण पर ही पड़ती है, खासकर महिलाओं और बच्चों के कुपोषित होने की आशंका सबसे अधिक रहती है।;

Update: 2026-05-20 22:48 GMT

इस महंगाई की सबसे पहली मार पोषण पर ही पड़ती है, खासकर महिलाओं और बच्चों के कुपोषित होने की आशंका सबसे अधिक रहती है। सोना न खरीदने या विदेश न जाने की अपील तो उस समृद्ध तबके को ही परेशान करेगी, जिसके पास बढ़ती महंगाई के बावजूद इन चीजों पर खर्च करने की गुंजाइश रहती है। विदेश न जाने या सोना न खरीदने के बावजूद उनके रोजमर्रा के खान-पान पर कोई खास असर नहीं पड़ने वाला है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ठान रखा है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश को शर्मसार करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। विदेशी राष्ट्राध्यक्षों के साथ उनकी ही ही-खी खी और जबरन गले पड़ना ही काफी नहीं था कि अब मेलोडी टॉफी बांटकर अंतरराष्ट्रीय संबंधों को साधा जा रहा है। हमें नहीं मालूम कि प्रधानमंत्री का असल बचपन किस अवस्था में गुजरा, लेकिन जब वे 6-7 बरस के रहे होंगे यानी सन् 56-57 में, तब विद्यालयों में जन्मदिन के मौकों पर संगी-साथियों और शिक्षकों को टॉफी बांटने का चलन भी नहीं था। यह बाद का चलन है और आज कई स्कूलों में जन्मदिन के मौके पर बच्चे टॉफी का पैकेट लेकर जाते हैं, अपनी कक्षा के बच्चों को खिलाते हैं और साथ ही स्कूल के सभी शिक्षकों को भी। यह कोई अनिवार्यता नहीं है, लेकिन बच्चों की खुशियां बांटने का एक ढंग है। आम तौर पर मेलोडी या कॉफी बाइट जैसी टॉफियों के पैकेट ही बच्चे ले जाते हैं, क्योंकि यह ज्यादा महंगी नहीं पड़ती है। नरेन्द्र मोदी ने पारले कंपनी की इसी मेलोडी टॉफी के पैकेट को अब इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को भेंटस्वरूप दिया है। सवाल है कि क्या नरेन्द्र मोदी बचपन में स्कूल में टॉफी न बांट पाने की कसक को 75 बरस की उम्र में पूरा कर रहे हैं, या मेलोनी से अपनी निजी दोस्ती को वे सोशल मीडिया के जरिए प्रचारित-प्रसारित कर रहे हैं या कूटनीति को लेकर उनकी समझ इतनी हल्की है जिसे वे टॉफी के रैपर में लपेट कर पेश कर रहे हैं।

पाठकों को बता दूं कि मेलोनी और मोदी के नामों को मिलाकर हैशटैग मेलोडी तीन सालों से सोशल मीडिया पर चल रहा है। 2023 में हुए कॉप 28 समिट में मेलोनी ने मोदी के साथ सेल्फी शेयर की थी और तब इस हैशटैग का इस्तेमाल किया था। तब से दोनों नेताओं की जब भी मुलाकात होती है, इंटरनेट पर मेलोडी हैशटैग के साथ मीम्स और चुटकुले आने लगते हैं। सोशल मीडिया की दुनिया यही है कि यहां गंभीर से गंभीर विषय भी मजाक में कब तब्दील हो जाए, पता नहीं चलता। लेकिन भारतीय परंपरा और संस्कृति की बार-बार दुहाई देने वाले मोदी क्या नहीं जानते कि एक स्त्री और एक पुरुष का नाम कब और क्यों साथ में जोड़ा जाता है, या लिखा जाता है। अगर सोशल मीडिया दो देशों के प्रधानमंत्रियों (जिसमें दोनों जीवनसाथी रहित हैं) को लेकर ऐसे सस्ते मजाक कर रहा है, तो क्या यह जरूरी है कि प्रधानमंत्री उस मजाक को आगे बढ़ाएं और सोशल मीडिया पर समय बिताने वालों को प्रोत्साहित करें कि वे आगे इसी तरह मस्ती-मजाक में कूटनीति जैसे गंभीर विषय को उपेक्षित होने दें।

20 मई की सुबह जब सोशल मीडिया एक्स पर प्रधानमंत्री मोदी की मेलोनी को मेलोडी भेंट करते हुए वीडियो देखा तो एकबारगी यकीन नहीं हुआ कि यह सच है, लेकिन ऐसा ही था। खुद मेलोनी ने इसे अपने सोशल मीडिया पर डाला और अब इंटरनेट पर यह चर्चा में है। वीडियो में नजर आ रहा है कि नरेन्द्र मोदी ने नीले बंद गले के सूट में मेलोनी को टॉफी का बैग थमाया, जबकि मेलोनी सफेद सूट में थीं। मेलोनी ने इस वीडियो को एक्स पर शेयर करते हुए लिखा, 'उपहार के लिए धन्यवाद। वीडियो में मेलोनी कहती सुनाई दे रही हैं,' उन्होंने हमें एक बहुत ही अच्छी टॉफी गिफ्ट की। इसके बाद दोनों नेता जोर-जोर से हंस पड़े। यह क्लिप पोस्ट होने के एक घंटे के अंदर लगभग 10 लाख लोगों ने इसे देखा, जिस पर हजारों प्रतिक्रियाएं लिखी गईं।

मोदी की यह हंसी गरीब जनता के जख्मों पर नमक छिड़कने के समान लग रही है, जो पेट्रोल-डीजल, सीएनजी, गैस सिलेंडर, दूध, ब्रेड सब कुछ महंगा होने पर परेशान है कि घर के खर्चों को कैसे पूरा किया जाएगा। इस महंगाई की सबसे पहली मार पोषण पर ही पड़ती है, खासकर महिलाओं और बच्चों के कुपोषित होने की आशंका सबसे अधिक रहती है। सोना न खरीदने या विदेश न जाने की अपील तो उस समृद्ध तबके को ही परेशान करेगी, जिसके पास बढ़ती महंगाई के बावजूद इन चीजों पर खर्च करने की गुंजाइश रहती है। विदेश न जाने या सोना न खरीदने के बावजूद उनके रोजमर्रा के खान-पान पर कोई खास असर नहीं पड़ने वाला है। लेकिन गरीब आदमी तो सबसे पहले अपनी थाली में ही कटौती करेगा।

देश को आर्थिक संकट की उथल-पुथल में छोड़कर विदेश जाने वाले नरेन्द्र मोदी के बचाव में यही तर्क सुनने मिल रहे हैं कि कूटनीतिक संबंध बढ़ने का लाभ देश को मिलेगा। लेकिन टॉफी भेंट करने को कूटनीति में कब और किस तरह शामिल किया गया है, यह सरकार को जरूर बताना चाहिए।

राहुल गांधी ने इस बेतुके व्यवहार पर लिखा है कि हमारे सिर पर आर्थिक संकट मंडरा रहा है, और हमारे प्रधानमंत्री इटली में मिठाइयां बांटने में व्यस्त हैं! किसान, युवा, महिलाएं, मजदूर और छोटे व्यापारी सब रो रहे हैं - प्रधानमंत्री हंस रहे हैं और रीलें बना रहे हैं, जबकि भाजपा के लोग तालियां बजा रहे हैं। यह नेतृत्व नहीं, बल्कि एक तमाशा है।

वाकई मोदी की हर विदेश यात्रा आखिर में तमाशे से ज्यादा कुछ और लगती ही नहीं है। अभी पांच देशों की यात्रा में मोदी की कई तस्वीरें और वीडियो सामने आए, जिसमें भारतीय नृत्य-संगीत की प्रस्तुति उनके सामने की जा रही है, और वे इसका आनंद उठाते दिख रहे हैं। या अपने समकक्षों के साथ वे बात तो कर रहे हैं, लेकिन वे वीडियो दूर से लिए गए हैं, या उनमें आवाज नहीं है, जिससे देश को पता चले कि आखिर दो राष्ट्र प्रतिनिधियों के बीच क्या बातें हो रही हैं। लोकतंत्र में जनता को यह जानने का हक तो है कि प्रधानमंत्री ने किस देश के साथ कौन सा करार किया, किन दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए, इन समझौतों और सौदों का लाभ अंतत: आम जनता को किस तरह मिलेगा। विदेश मंत्रालय जरूर औपचारिक भाषा में विज्ञप्ति जारी कर समझौतों-सौदों की जानकारी देता है, लेकिन उनका विस्तृत वर्णन सामने नहीं आ पाता। नरेन्द्र मोदी जाने से पहले या आने के बाद प्रेस कांफ्रेंस कर जनता को इसकी जानकारी भी नहीं देते। और विदेश में जब पत्रकार उनसे सवाल पूछें तो वे कैसे भागते हैं, इसका उदाहरण मंगलवार को नॉर्वे में देखने मिल ही गया।

नॉर्वे की पत्रकार हेले लिंग ने नरेन्द्र मोदी से इतना ही तो पूछा था कि आप कुछ सवाल क्यों नहीं लेते हैं। बस इसके बाद से देश में मोदी को बचाने के लिए खड़ी फौज ने हेले लिंग पर धावा बोल दिया है। वरिष्ठ पत्रकार और संपादक कहे जाने वाले जगदीश उपासने ने अपनी फेसबुक पोस्ट पर हेले लिंग की तैराकी की पोशाक पहने तस्वीरें डालीं, ताकि उनकी असलियत दुनिया के सामने आए। लेकिन उपासने साहब यह भूल गए कि हम अफगानिस्तान में नहीं हैं, जहां किसी महिला के तैराकी की पोशाक पहनने को अपराध माना जाए। और उससे भी पहली बात तो यही है कि हेले लिंग ने क्या पहना या क्या खाया, इससे उन्होंने जो सवाल किया, वो कैसे गलत हो गया। इस समय दूरदर्शन पर करोड़ों के पैकेज पर काम कर रहे सुधीर चौधरी ने भी बाकायदा एक कार्यक्रम हेले लिंग को समर्पित कर दिया कि वे महज 26 साल की हैं और उनके पास 5-6 साल का ही पत्रकारिता का अनुभव है। सुधीर चौधरी से भी यही सवाल किया जाना चाहिए कि हेले लिंग के पास भले कम सालों का अनुभव है, लेकिन उन्होंने जो सवाल मोदी से किया, उसका जवाब देने की जगह मोदी चले क्यों गए। ऐसे में हेले लिंग किस तरह गलत हो सकती हैं।

ध्यान रहे कि मंगलवार को हेले लिंग जब मोदी से सवाल करने के कारण सुर्खियों में आईं, तो सोशल मीडिया पर कई यूजर्स ने लिंग पर 'विदेशी प्लांट', 'जासूस' और यहां तक कि 'चाइनीज प्रॉक्सी' होने का आरोप लगाया। उनके पुराने चीन और राष्ट्रपति शी जिनपिंग पर लिखे लेखों का हवाला दिया गया। इन आरोपों पर लिंग ने स्पष्टीकरण दिया कि, 'मुझे कभी नहीं लगा था कि मुझे यह लिखना पड़ेगा, लेकिन मैं किसी विदेशी सरकार की जासूस नहीं हूं। मेरा काम पत्रकारिता है।'

खबर ये भी है कि हेले लिंग के इंस्टाग्राम और फेसबुक अकाउंट सस्पेंड कर दिए गए हैं। खुद लिंग ने सोशल मीडिया पर बताया कि पूरे दिन इंस्टाग्राम अकाउंट एक्सेस नहीं हो पा रहा था, जिसके बाद उसे सस्पेंड कर दिया गया। उन्होंने सस्पेंशन नोटिस का स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए लिखा, यह प्रेस फ्रीडम के लिए छोटी सी कीमत है, लेकिन पहले कभी ऐसा नहीं हुआ। इधर सोशल मीडिया एक्स पर लिंग के फॉलोअर्स कई गुना बढ़ चुके हैं, जिससे जाहिर होता है कि मोदी का सवालों से भागना चर्चा में आ गया है और शायद इसलिए भाजपा नेता और भाजपा के पत्रकार इस बात से परेशान हो रहे हैं। हालांकि लिंग ने साफ कहा है कि पत्रकार होने के नाते सवाल पूछना उनका काम है और जब किसी ताक़तवर देश का नेता उनके छोटे से देश में आता है और उनसे संबंध मज़बूत करना चाहता है, तो सवाल पूछना उनकी ज़िम्मेदारी है।

काश पत्रकारिता की ऐसी ही जिम्मेदारी हमारे देश के स्वनामधन्य पत्रकारों ने निभाई होती, तो न आज भारत की प्रेस स्वतंत्रता में रैंकिंग नीचे गिरती, न प्रधानमंत्री मेलोडी इतनी चॉकलेटी क्यों है, को देश की कूटनीति का ध्येय वाक्य बनाने की हिमाकत कर पाते।

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