जब सरकारें हास्य से डरती हैं, तो यह दिखाता है कि बहुत कुछ गलत है

'कॉकरोच जनता पार्टी' की लोकप्रियता यह भी दिखाती है कि राजनीतिक सोच बदल रही है।;

Update: 2026-05-25 21:42 GMT
  • के. रवींद्रन

'कॉकरोच जनता पार्टी' की लोकप्रियता यह भी दिखाती है कि राजनीतिक सोच बदल रही है। पारंपरिक विपक्षी राजनीति को अक्सर लोगों की नाराजग़ी को एक साफ़ राष्ट्रीय विकल्प में बदलने में मुश्किल हुई है। लेकिन, व्यंग्य को असरदार होने के लिए किसी कार्यक्रम की ज़रूरत नहीं होती। इसकी ताकत सत्ताधारी व्यवस्था के आस-पास बने 'अटल होने के भ्रमÓ को तोड़ने में है।

काकरोच जनता पार्टी' की शुरुआत भले ही एक व्यंग्य के तौर पर हुई हो, लेकिन इसकी लोकप्रियता ने इंटरनेट पर चलने वाले किसी मामूली मज़ाक से कहीं ज़्यादा गंभीर बात को उजागर किया है। सरकारी अधिकारियों से मिली प्रतिक्रिया से पता चलता है कि सत्ताधारी व्यवस्था को इस व्यंग्य से उतना डर नहीं लग रहा, जितना इस बात की संभावना से कि इस व्यंग्य को सुनने-समझने वाले लोग मिल गए हैं।

'कॉकरोच जनता पार्टी' के व्यंग्यात्मक उभार को लेकर मोदी सरकार की ज़ाहिर बेचैनी समकालीन राजनीति की एक बार-बार दिखने वाली विशेषता को दर्शाती है, और वह है सत्ताधारी पार्टी की आलोचना और राष्ट्र-विरोध के बीच की रेखा का धुंधला पड़ जाना। जब सत्ता में बैठे लोग असहमति, पैरोडी या मज़ाक को राष्ट्र-विरोधी कृत्य मानते हैं, तो वे अपनी वैधता को लेकर अपनी ही गहरी असुरक्षा को ज़ाहिर करते हैं। एक आत्मविश्वास से भरी सरकार मज़ाक को झेल सकती है। एक घबराई हुई सरकार मीम्स, चुटकुलों और काल्पनिक राजनीतिक पार्टियों में भी दुश्मन ढूंढती है।

व्यंग्य की अपील को समझने के बजाय उसे दबाने की ज़िद राजनीतिक रूप से दूरदर्शिता की कमी को दर्शाती है। 'कॉकरोच जनता पार्टी' ने स्पष्ट रूप से लोगों की नब्ज़ को छुआ है, क्योंकि यह उस मनोदशा का प्रतिनिधित्व करती है जिसे कई नागरिक—विशेष रूप से युवा लोग—पहले से महसूस करते हैं, लेकिन शायद औपचारिक राजनीति के माध्यम से व्यक्त नहीं कर पाए हैं। किसी व्यंग्यात्मक संगठन की लोकप्रियता ज़रूरी नहीं कि किसी संगठित तोड़फोड़ का सुबूत हो। यह तो जमा होती जा रही चिढ़ और झुंझलाहट का सबूत है।

व्यंग्य के प्रति राज्य का सहज संदेह लोकतांत्रिक संस्कृति में एक बड़ी समस्या की ओर भी इशारा करता है। राजनीतिक सत्ता नागरिकता की शर्त के रूप में श्रद्धा की मांग नहीं कर सकती। लोकतंत्र में, नेताओं और दलों को उपहास, जांच और अस्वीकृति के लिए खुला रहना चाहिए। देश किसी भी सरकार से बड़ा है, और लोकतांत्रिक निष्ठा को वर्तमान में सत्ता में बैठे लोगों के प्रति आज्ञाकारिता से नहीं मापा जा सकता।

गहरा सबक यह है कि सोशल मीडिया को अब राजनीतिक वास्तविकता से अलग एक खेल का मैदान नहीं माना जा सकता। यह अब उन प्रमुख मंचों में से एक है जहां जनमानस बनता है, फैलता है और दृढ़ होता है। नई पीढ़ी अपनी निराशा व्यक्त करने के लिए पार्टी घोषणापत्रों या टेलीविजन बहसों का इंतजार नहीं करती। यह व्यंग्य, रीमिक्स संस्कृति, मीम्स, पैरोडी अकाउंट और वायरल नारों का उपयोग करती है। राजनीतिक संचार के पुराने मॉडलों में प्रशिक्षित अधिकारियों को ये तरीके भले ही गैर-गंभीर लगें, लेकिन इनमें अक्सर तीक्ष्ण सामाजिक समझ होती है।

जो सरकारें ऑनलाइन हास्य को तुच्छ समझकर खारिज कर देती हैं, वे इसके नैदानिक महत्व को समझ नहीं पातीं। एक मीम विरोध प्रदर्शन से पहले ही आक्रोश प्रकट कर सकता है। एक पैरोडी चुनाव से पहले ही अविश्वास दिखा सकती है। एक व्यंग्यात्मक आंदोलन यह संकेत दे सकता है कि आधिकारिक कथन लोगों को समझाने में विफल हो रहे हैं। इस अर्थ में, कॉकरोच जनता पार्टी को खतरे के बजाय एक चेतावनी के रूप में देखा जाना चाहिए। यह सत्ता प्रतिष्ठान को संदेश देता है कि एक ऐसा वर्ग मौजूद है जो सत्ता का मज़ाक उड़ाने को तैयार है क्योंकि अब सत्ता उसकी बात नहीं सुनती।

'कॉकरोच जनता पार्टी' की लोकप्रियता यह भी दिखाती है कि राजनीतिक सोच बदल रही है। पारंपरिक विपक्षी राजनीति को अक्सर लोगों की नाराजग़ी को एक साफ़ राष्ट्रीय विकल्प में बदलने में मुश्किल हुई है। लेकिन, व्यंग्य को असरदार होने के लिए किसी कार्यक्रम की ज़रूरत नहीं होती। इसकी ताकत सत्ताधारी व्यवस्था के आस-पास बने 'अटल होने के भ्रम' को तोड़ने में है। यह लोगों को बताता है कि सत्ता पर हंसा जा सकता है, और जब सत्ता हंसी का पात्र बन जाती है, तो उसका डर कम हो जाता है।

इसका मतलब यह नहीं है कि व्यंग्य राजनीति का कोई विकल्प है। हास्य विरोधाभासों को उजागर तो कर सकता है, लेकिन वह संस्थाएं नहीं बना सकता, नौकरियां पैदा नहीं कर सकता या लोगों के कल्याण का काम नहीं कर सकता। फिर भी, व्यंग्य राजनीतिक सवालों के लिए ज़मीन तैयार कर सकता है। यह विरोध करने के मनोवैज्ञानिक बोझ को कम कर सकता है। यह लोगों को यह पहचानने में मदद कर सकता है कि उनकी निजी निराशाएं सिर्फ उनकी नहीं, बल्कि औरों की भी हैं। ठीक इसी वजह से सरकारें अक्सर इससे डरती हैं। खतरा वह मज़ाक नहीं है, बल्कि उस मज़ाक के इर्द-गिर्द बना लोगों का वह समूह है।

सरकार की ओर से ज़्यादा समझदारी भरा जवाब यह होगा कि वह लोगों की असल शिकायतों पर ध्यान दे। सत्ताधारी व्यवस्था ने अपनी ज़्यादातर राजनीतिक ताकत 'संदेशों पर सख्त नियंत्रणÓ, 'केंद्रीयकृत संचार' और 'राष्ट्रीय उद्देश्य को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने' के आधार पर खड़ी की है। यह रणनीति सालों तक बहुत असरदार रही है। लेकिन व्यंग्य के ज़रिए होने वाले विरोध का बढ़ना यह दिखाता है कि संदेशों पर नियंत्रण की भी अपनी सीमाएं होती हैं। 'कॉकरोच जनता पार्टी' की लोकप्रियता महज़ एक मज़ाकिया घटना नहीं है। यह एक राजनीतिक लक्षण है। यह उस पीढ़ी की थकान को दिखाता है जो ऑनलाइन रहती है, सब्र खो चुकी है, दुनिया भर के हालात से अपनी तुलना करती है, और यह मानने को तैयार नहीं है कि वफ़ादारी का मतलब चुप रहना होता है। सरकार इसे किसी दूसरे नाम से राजद्रोह मान सकती है, या फिर इसे उस समाज की प्रतिक्रिया के तौर पर देख सकती है जो चाहता है कि उसे गंभीरता से लिया जाए। यह चुनाव ही तय करेगा कि यह मज़ाक समय के साथ फीका पड़ जाएगा, या फिर लोकतांत्रिक हताशा का एक और भी तीखा प्रतीक बन जाएगा।

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