यह वह मगध है, जिसे तुम मेरी तरह गंवा चुके हो!
पच्चीस से तीस फिर से नीतीश, यही नारा जदयू के कार्यकर्ताओं ने पिछले साल के बिहार चुनाव में बुलंद किया था।;
— सर्वमित्रा सुरजन
इस बात पर इत्मीनान किया जा सकता है कि नीतीश कुमार अपनी बात के पक्के निकले, मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ दी, लेकिन पलटी नहीं मारी। मगर जनता के भरोसे से तो उन्होंने ऐसी पलटी मारी है कि उसका यकीन अब सिद्धांतवादी राजनीति से शायद उठ ही जाए। भाजपा ने नीतीश के लिए लगे नारे को ठेंगा दिखाते हुए अपने नारे मोदी है तो मुमकिन है, को सच कर दिखाया है।
पच्चीस से छब्बीस, इतना भी नहीं चले नीतीश। अब नीतीश कुमार जब संभवत: अपने जीवन के आखिरी राजनैतिक पड़ाव पर पहुंचे हैं, तो उनके लिए यही कहा जा सकता है। पच्चीस से तीस फिर से नीतीश, यही नारा जदयू के कार्यकर्ताओं ने पिछले साल के बिहार चुनाव में बुलंद किया था। उससे पहले 2015 के चुनाव में बहार में बिहार है, फिर से नीतीशे कुमार है- का गीत बिहार में चला था। 2020 के चुनाव में जेडीयू ने नारा बुलंद किया- 'क्यों करें विचार ठीके तो हैं नीतीश कुमार'। हर पांच साल में एक ही व्यक्ति पर अगर पार्टी का भरोसा दिखे और जनता भी उसी भरोसे पर भरोसा करे, तो उस व्यक्ति का नाम नीतीश कुमार हो सकता है, कम से कम बिहार की राजनीति के संदर्भ में तो यही कहा जा सकता है। 2005 से लेकर 2025 तक नीतीश कुमार ही बिहार की राजनीति के सूर्य बने रहे। बेशक लालू यादव का तेज भी कम नहीं हुआ, लेकिन उन्होंने उस तरह मौकापरस्त या सिद्धांतहीन राजनीति को स्वीकार नहीं किया, जिस पर चलकर नीतीश कुमार ने अपने लिए सत्ता का लंबा इंतजाम कर लिया था। भाजपा की सांप्रदायिक राजनीति का डटकर मुकाबला करने की हिम्मत लालू यादव ने दिखाई तो उसका भुगतान जेल जाकर, अब तक मुकदमे झेलकर और अपने परिवार में टूट देखने तक सब तरह से करना पड़ा। इतना जरूर रहा कि लालू यादव को कभी सत्ता से बेआबरू होकर निकलने की नौबत नहीं आई। किसी ने फाइलों का जोर दिखाकर उनसे यह नहीं कहा कि मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़कर राज्यसभा की सदस्यता लो और चुपचाप अपनी पांच-छह दशकों की राजनीति पर पूर्णविराम लगाओ। इतिहास शायद नीतीश कुमार के लिए यही सब न लिख पाए।
वैसे बिहार की जनता का नीतीश कुमार पर कितना यकीन था, यह इसी से जाहिर होता है कि चाहे वे एनडीए में रहें या महागठबंधन में, लोगों ने उन्हें ही मुख्यमंत्री बने देखना चाहा।
अटलजी की भाजपा में वे शामिल थे, तब भी बिहार पर उनकी पकड़ थी, और जब मोदीजी की भाजपा में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से क्षुब्ध होकर उन्होंने अलग राह पकड़ी, तब भी बिहार उनके साथ खड़ा रहा। अमित शाह ने उनके लिए भाजपा के दरवाजे बंद होने की बात कही, नरेन्द्र मोदी ने डीएनए पर सवाल उठाए, लेकिन फिर भी बिना किसी ठोस, प्रत्यक्ष कारण के वे अपने ही खड़े किए विपक्षी मोर्चे को छोड़कर फिर से एनडीए में चले गए, तब भी बिहार के लोगों ने उनसे सवाल नहीं किए कि आप आखिर इस तरह पलटी मार कर क्यों अपनी फजीहत करवाते हैं, क्यों हमारे चयन पर सवाल उठने देते हैं। बल्कि जब यह संदेह जोर पकड़ रहा था कि 2025 के चुनाव में नीतीश कुमार को भाजपा मुख्यमंत्री नहीं बनने देगी, क्योंकि उसके नेता अटलजी का सपना पूरा करने के लिए भाजपा का मुख्यमंत्री बना सकते हैं, तब भी 25 से 30 फिर से नीतीश का नारा बिहार में चला। लोगों को यकीन था कि नीतीश कुमार केवल रिकार्ड बनाने के लिए 10वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ नहीं लेंगे, बल्कि भाजपा के हर दांव-पेंच और दबाव का सामना कर अपना कार्यकाल पूरा करेंगे। लेकिन 2030 तक तो छोड़िए, नीतीश कुमार 2026 तक भी ढंग से बतौर मुख्यमंत्री नहीं चल पाए। जब 2000 में उन्होंने पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, तो बहुमत साबित न कर पाने के कारण महज सात दिनों के लिए ही उस कुर्सी पर बैठ पाए, मगर इसके बाद 2005 में मुख्यमंत्री बनकर पूरे पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। 2010 में फिर बहुमत से सरकार बनाई। हालांकि 2014 लोकसभा चुनाव में हार की जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने इस्तीफा दिया, मगर 22 फरवरी 2015 को नीतीश कुमार फिर मुख्यमंत्री बन गए। यह वही वक्त था जब उन्होंने नरेन्द्र मोदी का खुलकर विरोध किया था और महागठबंधन बनाकर लालू यादव के साथ आ गए थे। नवंबर 2015 को महागठबंधन के साथ फिर से नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री बने।
लेकिन शायद उनकी राजनैतिक महत्वाकांक्षाएं लालूजी की सिद्धांतवादी राजनीति में सध नहीं पा रही थीं, तो उन्होंने महागठबंधन छोड़कर 27 जुलाई 2017 को एनडीए के साथ फिर मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। 2020 में विधानसभा चुनाव हुए और एक बार फिर नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने। लेकिन अभी उन्हें राजनीति के दोनों ध्रुवों- एनडीए और महागठबंधन में अपने वजन का तौल करना बाकी था, लिहाजा 2022 में उन्होंने फिर महागठबंधन के साथ सरकार बनाई, लेकिन जनवरी 2024 में लोकसभा चुनाव से चंद माह पहले फिर एनडीए में लौट गए, फिर से मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इस बार भी वे जनता को ये यकीन दिलाने में सफल रहे कि बस अब पलटी मारने का दौर खत्म हो गया। आप भी इस सर्कस को देखते हुए थक गए होंगे, तो थोड़ा आराम कर लें। अब हम यहीं रहेंगे।
इस बात पर इत्मीनान किया जा सकता है कि नीतीश कुमार अपनी बात के पक्के निकले, मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ दी, लेकिन पलटी नहीं मारी। मगर जनता के भरोसे से तो उन्होंने ऐसी पलटी मारी है कि उसका यकीन अब सिद्धांतवादी राजनीति से शायद उठ ही जाए। भाजपा ने नीतीश के लिए लगे नारे को ठेंगा दिखाते हुए अपने नारे मोदी है तो मुमकिन है, को सच कर दिखाया है। बिहार में पहली बार भाजपा का मुख्यमंत्री बना है, और यह उपलब्धि भी उन्हीं सम्राट चौधरी को हासिल हुई है, जिन्होंने एक समय नीतीश कुमार को गद्दी से हटाने के लिए प्रतीकात्मक तौर पर मुरेठा (पगड़ी) बांध लिया था। हालांकि जनवरी 2024 में एनडीए की सरकार बनने पर उन्होंने अयोध्या में मुंडन करा अपना मुरेठा उतार दिया था। सम्राट चौधरी भी नीतीश कुमार की तरह कभी इस पाले, कभी उस पाले में रहे हैं। आरजेडी से अपनी राजनैतिक पारी की शुरुआत सम्राट चौधरी ने की और राबड़ी देवी मंत्रिमंडल में शामिल रहे, उसके बाद नीतीश की पार्टी जदयू और फिर जीतनराम मांझी की पार्टी हम से होते हुए 2018 में भाजपा में शामिल हुए। सम्राट चौधरी को भाजपा के दिवंगत नेता और नीतीश कुमार के साथ उपमुख्यमंत्री रहे सुशील मोदी ही भाजपा में लाए। भाजपा के उपाध्यक्ष, फिर सदन में नेता प्रतिपक्ष बनकर बहुत जल्द 2023 में बिहार भाजपा के अध्यक्ष भी बन गए। 2024 में उपमुख्यमंत्री बने, वित्त मंत्रालय भी संभाला। 2025 में फिर उपमुख्यमंत्री बने और 2026 आते-आते तय हो गया था कि अब उनके कदम मुख्यमंत्री की कुर्सी की तरफ बढ़ चुके हैं। 56 साल पहले भारत रत्न कर्पूरी ठाकुर ने भी उपमुख्यमंत्री बनने के बाद मुख्यमंत्री का पद संभाला था। तब से लेकर अब तक कम से कम 10 उपमुख्यमंत्री बिहार में रहे, लेकिन किसी को यह उपलब्धि हासिल नहीं हुई। सम्राट चौधरी ने यह कारनामा भी कर दिखाया। हालांकि उनका सबसे बड़ा कारनामा तो यही है कि महज आठ सालों में उन्होंने नरेन्द्र मोदी और अमित शाह का भरोसा ऐसा हासिल किया कि प्रदेश भाजपा के तमाम दिग्गजों को छोड़कर उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया है।
बिहार की राजनीति का सम्राट और नीतीश अध्याय राजनीति शास्त्र के अध्येताओं के लिए कई शोध के कई रोचक पहलुओं को खोलता है। जिसमें जातिगत समीकरण, सोशल इंजीनियरिंग, महिला मतदाताओं का झुकाव, सांप्रदायिक विभाजन, जंगलराज की अवधारणा ऐसे विभिन्न विषयों पर नए सिरे से विचार मंथन और विश्लेषण की जरूरत है। क्योंकि अब पुरानी धारणाएं बिल्कुल ही ध्वस्त हो चुकी हैं।
नीतीश कुमार ने बिहार में भाजपा की राजनीति आसान करने के लिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की जमीन को तैयार करने में मदद की, क्या सम्राट चौधरी अब उस पर नयी पौध तैयार करेंगे। जिस बिहार में कभी आडवानीजी का रथ लालू यादव के शासन में रोक दिया गया था, क्या अब वह बुलडोजर बनकर पुराने विश्वासों को कुचलेगा और अटल जी के कहे अनुरूप जमीन समतल करने का काम करेगा, यह अभी देखना बाकी है। श्रीकांत वर्मा ने लंबी कविता मगध में लिखा था:-
लो, वह दिखाई पड़ा मगध,
लो, वह अदृश्य-
कल ही तो मगध मैंने
छोड़ा था
कल ही तो कहा था
मगधवासियों ने
मगध मत छोड़ो
मैंने दिया था वचन-
सूर्योदय के पहले
लौट आऊंगा
न मगध है, न मगध
तुम भी तो मगध को ढूंढ रहे हो
बंधुओ,
यह वह मगध नहीं
तुमने जिसे पढ़ा है
किताबों में,
यह वह मगध है
जिसे तुम
मेरी तरह गंवा
चुके हो।