ललित सुरजन की कलम से स्वाधीनता और जनतंत्र का रिश्ता
आज की दुनिया की यह भयावह सच्चाई है कि पूंजीवाद और साम्राज्यवाद नया बाना धारण करके जगह-जगह अपनी घुसपैठ कर चुके हैं।
आज की दुनिया की यह भयावह सच्चाई है कि पूंजीवाद और साम्राज्यवाद नया बाना धारण करके जगह-जगह अपनी घुसपैठ कर चुके हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति आइज़नहावर ने 1960 के अपने अंतिम भाषण में सैन्य-औद्योगिक गठजोड़ (मिलिटरी-इंडस्ट्रियल कांप्लेक्स) के खिलाफ अमेरिकी जनता को आगाह किया था। उसी दानवी ताकत ने कितने ही देशों को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। जिस डिजिटल प्रगति पर जनसामान्य मुग्ध है, उसे पता ही नहीं है कि ऊपर से मासूम दीखने वाले ये खिलौने कैसे उसके लिए आत्मघाती हो सकते हैं। जानना चाहिए कि इज़राइल जिसका निर्माण ही 1948 में हुआ, आज कैसे विश्व बाज़ार में हथियारों का बड़ा सौदागर बन गया है। उसने भारत को अपने हथियारों का सबसे बड़ा ग्राहक कैसे बना लिया, क्या यह हमारी सोच का विषय नहीं होना चाहिए? यह भी तो पूछना चाहिए कि इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की हत्या के पीछे अदृश्य हाथ किसका था! क्या कारण था कि पहले राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी, फिर भाई रॉबर्ट कैनेडी की हत्या की गई और तीसरे भाई एडवर्ड कैनेडी को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार भी नहीं बनने दिया गया! क्या विश्व के दो लोकतांत्रिक देशों की इन घटनाओं में कोई समानता खोज सकते हैं?
(देशबन्धु में 15 अगस्त 2019 को प्रकाशित)
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