गांधी के मुताबिक : छल-कपट से फिलिस्तीन यहूदियों को नहीं दिया जा सकता

'पिछले युद्ध में मुसलमान सैनिकों ने अपना खून इसलिए नहीं बहाया कि वे फिलिस्तीन को मुसलमानी नियंत्रण से बाहर किसी दूसरे को अर्पित कर दें।;

Update: 2026-06-12 21:40 GMT
  • विवेकानंद माथने

'पिछले युद्ध में मुसलमान सैनिकों ने अपना खून इसलिए नहीं बहाया कि वे फिलिस्तीन को मुसलमानी नियंत्रण से बाहर किसी दूसरे को अर्पित कर दें। मैं चाहता हूं कि मेरे यहूदी मित्र भारत के सात करोड़ मुसलमानों की स्थिति पर निष्पक्ष भाव से विचार करें। एक स्वतंत्र राष्ट्र के नाते क्या वे अपनी पवित्र मिल्कियत का एक ऐसे ढंग से छीना जाना बर्दाश्त कर सकते हैं जो उनकी दृष्टि में विश्वासघातपूर्ण है?'

महात्मा गांधी उस दौर में सक्रिय थे जब फिलिस्तीन का प्रश्न विश्व राजनीति में उभर रहा था। यूरोप में यहूदियों का उत्पीड़न, 'ज़ायोनी आंदोलन' का उदय, फिलिस्तीन में 'यहूदी राष्ट्रीय गृह' की मांग, 'बाल्फोर घोषणा' और बढ़ते यहूदी प्रवास जैसी घटनाएं तेजी से हो रही थीं। गांधीजी के कई निकट सहयोगी यहूदी थे, वहीं भारतीय मुसलमानों और अरब जगत के प्रश्नों से भी उनका गहरा सरोकार था। वे दोनों समुदायों के इतिहास और पीड़ा से परिचित थे और यहूदियों के प्रति सहानुभूति रखते थे, लेकिन फिलिस्तीनी अरबों पर हो रहे अन्याय और औपनिवेशिकता थोपने के सख्त खिलाफ थे।

'प्रथम विश्वयुद्ध' के बाद वैश्विक राजनीति तेजी से बदल रही थी। पराजित 'तुर्क साम्राज्य' (उस्मानी सल्तनत) को विभाजित करने के लिए ब्रिटेन और फ्रांस ने 'सेवर की संधि' की रूपरेखा बनाई, जिसके तहत अरब क्षेत्रों और इस्लामी पवित्र स्थलों को यूरोपीय नियंत्रण में बांटने की योजना थी। इस औपनिवेशिक हस्तक्षेप ने भारतीय मुसलमानों के साथ-साथ महात्मा गांधी को भी गहराई से उद्वेलित कर दिया। गांधीजी ने इसे केवल धार्मिक नहीं, बल्कि साम्राज्यवाद के क्रूर चेहरे और वैश्विक न्याय के हनन के रूप में देखा।

मार्च 1921 में महात्मा गांधी ने लंदन के समाचार पत्र 'डेली हेरॉल्ड' को दिए एक साक्षात्कार में ब्रिटिश सरकार द्वारा मुसलमानों से किए गए वादों से मुकरने और 'सेवर की संधि' के जरिए अरब जगत पर थोपी गई नाइंसाफी की आलोचना की। 'खिलाफत आंदोलन' और फिलिस्तीन के संबंध को रेखांकित करते हुए गांधीजी ने कहा था कि 'खिलाफत मूलत: एक धार्मिक आंदोलन है;' यह आंदोलन सीधे पैगम्बर के निर्देशों से प्रेरणा ग्रहण करता है।' जिन्हें 'अरब के द्वीप' कहा जाता है उन्हें पूरी तरह से केवल मुसलमानों के ही नियंत्रण में रहना चाहिए; उस पर खलीफा की धार्मिक प्रभुसत्ता होनी चाहिए, चाहे फिलहाल खलीफा कोई भी हो।' इस्लाम के अस्तित्व के लिए यह जरूरी है कि ब्रिटेन और फ्रांस को दी गई अधिसत्ता बिलकुल समाप्त कर दी जाये।'

'फिलिस्तीन भी मुसलमानों के नियंत्रण में होना चाहिए।' धर्म या युद्ध का कोई भी फतवा 'मित्र-राष्ट्रों' द्वारा फिलिस्तीन का यहूदियों को सौंपा जाना उचित नहीं सिद्ध कर सकता। यह खास तौर पर भारतीय मुसलमानों के साथ और आमतौर पर समूचे भारत के साथ विश्वासघात करना होगा; यदि युद्ध के प्रारंभ में ब्रिटेन ने ऐसे किसी अधिकार हरण की संभावना की ओर इशारा किया होता तो एक भी भारतीय सिपाही युद्ध में न जाता।' 'प्रथम विश्वयुद्ध' के बाद 'खिलाफत आंदोलन' (1919-1924) के दौरान भारतीय मुसलमान तुर्की के खलीफा और इस्लामी पवित्र स्थलों की स्थिति को लेकर चिंतित थे।

इसी संदर्भ में ब्रिटिश वादों और फिलिस्तीन के भविष्य पर महात्मा गांधी ने 23 मार्च 1921 को 'यंग इंडिया' में लिखा- 'सेवर्स की संधि में जिस परिवर्तन की बात सोची जा रही है, उससे भारतीय मुसलमान संतुष्ट नहीं हो सकते; और इतना कहना काफी कह देना है।' मेरी नम्र राय में, भारत के मुसलमानों की मांगें स्वीकार कर ली जायें' इसके दो कारण हैं। 'खिलाफत' एक आदर्श है और जब कोई व्यक्ति किसी आदर्श को लेकर चलता है तो उसका रास्ता दुनिया की कोई ताकत नहीं रोक सकती। मुसलमान उस आदर्श का प्रतिनिधित्व करते हैं और समस्त भारत के सर्वसाधारण का समर्थन उन्हें प्राप्त है।'

गांधीजी ने कहा था कि 'छल-कपट से और नैतिकता के बंधनों को तोड़कर फिलिस्तीन यहूदियों के हाथों में नहीं दिया जा सकता। फिलिस्तीन के सवाल को लेकर तो यह लड़ाई नहीं लड़ी गई थी। ब्रिटिश सरकार एक भी मुसलमान सिपाही से यह कहने का साहस नहीं कर सकती थी कि वह फिलिस्तीन को अपने मुसलमान भाइयों के नियंत्रण से छीनकर यहूदियों को दे देगी। फिलिस्तीन यहूदियों का तीर्थस्थल है, इसलिए उनके लिए यह एक ऐसी भावना की चीज है जिसका आदर करना चाहिए और अगर मुसलमान आदर्शवादी यहूदियों को उतनी ही स्वतंत्रता से पूजन आदि नहीं करने देते जितनी स्वतंत्रता से स्वयं करते हैं तो यहूदियों का शिकायत करना उचित होगा।'

'नैतिकता या युद्ध के परिणामस्वरूप फिलिस्तीन यहूदियों को नहीं सौंपा जा सकता।... अगर 'खिलाफत' के सवाल का न्यायसम्मत निपटारा होता है तो 'जजीरत-उल-अरब' को खलीफा की धार्मिक प्रभुसत्ता के आधीन पूरी तरह से मुसलमानों के नियंत्रण में ही देना होगा।' 'खिलाफत आंदोलन' के दौरान ही दक्षिण अफ्रीका के एक मित्र ने गांधीजी से पूछा था कि 'क्या मुसलमान फिलिस्तीन यहूदियों को वापस कर देंगे?' इसके जवाब में गांधीजी ने 6 अप्रैल 1921 को 'यंग इंडिया' में मुसलमानों के ऐतिहासिक दावे को रेखांकित करते हुए लिखा था- 'मुसलमान दावा करते हैं कि फिलिस्तीन 'जजीरत-उल-अरब' का अविभाज्य अंग है। वे पैगम्बर की आज्ञा के अनुसार उस पर कब्जा बनाये रखने के लिए बाध्य हैं, किन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि यहूदी और ईसाई फिलिस्तीन में बे-रोक टोक आ-जा नहीं सकते या वहां बसकर अचल संपत्ति के स्वामी नहीं हो सकते।' गैर-मुसलमान या यहूदी उस स्थान पर संपूर्ण प्रभुता-संपन्न वह अधिकार प्राप्त नहीं कर सकते, जिस पर धार्मिक विजय के अधिकार से मुसलमानी शक्तियों का सदियों से कब्जा रहा है।'

'पिछले युद्ध में मुसलमान सैनिकों ने अपना खून इसलिए नहीं बहाया कि वे फिलिस्तीन को मुसलमानी नियंत्रण से बाहर किसी दूसरे को अर्पित कर दें। मैं चाहता हूं कि मेरे यहूदी मित्र भारत के सात करोड़ मुसलमानों की स्थिति पर निष्पक्ष भाव से विचार करें। एक स्वतंत्र राष्ट्र के नाते क्या वे अपनी पवित्र मिल्कियत का एक ऐसे ढंग से छीना जाना बर्दाश्त कर सकते हैं जो उनकी दृष्टि में विश्वासघातपूर्ण है?' यहूदियों के प्रति सहानुभूति के बावजूद, महात्मा गांधी का स्पष्ट मानना था कि ऐतिहासिक और नैतिक रूप से फिलिस्तीन पर पहला अधिकार वहां के मूल निवासियों का है और किसी भी बाहरी छल-कपट या औपनिवेशिक दबाव से इसे यहूदियों को नहीं सौंपा जा सकता।

(लेखक 'आजादी बचाओ आंदोलन' एवं 'किसान स्वराज आंदोलन' से संबद्ध हैं।)

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