ललित सुरजन की कलम से वैज्ञानिक जिन्हें हम भूल न जाएं
'हमारी शासन व्यवस्था, समाज व्यवस्था और शिक्षा व्यवस्था- सब में ज्ञान, विवेक और तर्कबुद्धि, इन सबका मानो कोई स्थान नहीं रह गया है।;
'हमारी शासन व्यवस्था, समाज व्यवस्था और शिक्षा व्यवस्था- सब में ज्ञान, विवेक और तर्कबुद्धि, इन सबका मानो कोई स्थान नहीं रह गया है। अंग्रेजी में जिसे सॉफ्ट पावर कहा जाता है उसे हम लगभग भूलते जा रहे हैं। चंद्रयान, मंगलयान, उपग्रहों का प्रक्षेपण इत्यादि देखकर मन स्वाभाविक रूप से आनंदित होता है कि हमारे देश ने वैज्ञानिक प्रगति का ऐसा मुकाम हासिल किया है; लेकिन आनंद के इस क्षण में अगर यह याद न रहे कि इन उपलब्धियों के पीछे किसकी कल्पना, ज्ञान और परिश्रम लगा हुआ है, तो क्या यह एक तरह से अकृतज्ञता नहीं है? विरोधाभास देखिए कि जब अपने आसपास के किसी प्रतिभावान युवक या युवती को किसी वैज्ञानिक मिशन में छोटी-मोटी भूमिका निभाने का भी अवसर मिलता है तो हम उस पर उल्लास प्रकट करते हैं, लेकिन ऐसे किसी मिशन की परिकल्पना कैसे होती है, उसे साकार कौन करता है, उसकी कार्ययोजना किसने बनाई है, यह सब हम शायद जानना ही नहीं चाहते। दूसरे शब्दों में हम एक अवसरवादी मनोवृत्ति का पालन करते दिखाई देते हैं।'
(देशबन्धु में 10 अगस्त 2017 को प्रकाशित)
https://lalitsurjan.blogspot.com/2017/08/blog-post_9.html