सुरक्षित भोजन का सवाल
मानव जीवन के लिए हवा, पानी के बाद जिंदा रहने के लिए भोजन ही मूलभूत आवश्यकता है।;
कुलभूषण उपमन्यु
मिलावट के विरुद्ध भी पर्याप्त कानूनी प्रावधान किए गए हैं। उनके लागू करने में भले ही कुछ ढील रहती हो, जैसे कि आए दिन मिलावटी दुग्ध पदार्थ पकड़े जाने की खबरें आती रहती हैं। पकड़ के बावजूद इतने मामले होते हैं जो चिंता की बात है। यानी मिलावटखोरी सुरक्षित भोजन की उपलब्धता के रास्ते में बड़ी रुकावट है, किंतु शुद्ध और सुरक्षित भोजन की उपलब्धता के विषय में एक बात बिल्कुल नजरंदाज की जा रही है।
मानव जीवन के लिए हवा, पानी के बाद जिंदा रहने के लिए भोजन ही मूलभूत आवश्यकता है। मानव समाज आदिकाल से ही भोजन के लिए संघर्षरत रहा है। सभ्यता का विकास जिस स्तर पर भी पहुंच जाए, भोजन की आवश्यकता हमेशा बनी ही रहेगी। आदिम समाजों में अधिकांश संघर्ष भोजन और भोजन प्रदान करने वाले क्षेत्रों के लिए ही होते रहे हैं। अधिकांश प्रवासन भी भोजन और आजीविका की तलाश में ही होते रहे हैं। यह प्रक्रिया आज भी किसी-न-किसी रूप में जारी है। वर्तमान संदर्भ में भोजन का अर्थ सुरक्षित, पोषक, स्वच्छ, मिलावट-रहित और मनुष्य द्वारा खाने योग्य भोजन से है। हमारे संविधान निर्माताओं ने इस बुनियादी जरूरत को समझ कर संविधान की 'धारा- 21Ó के अंतर्गत जीवन के अधिकार को मौलिक अधिकार का दर्जा दिया है।
उच्चतम न्यायालय ने इसकी व्याख्या आत्मसम्मान के साथ जीने के अधिकार के रूप में की है, जिसमें पर्याप्त सुरक्षित भोजन और बुनियादी जरूरतों तक पहुंच को शामिल किया गया है। 'धारा-47Ó राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों के अंतर्गत राज्य को निर्देश देती है कि भोजन में पोषक तत्वों में सुधार के साथ जीवन स्तर में सुधार करते हुए जन स्वास्थ्य में भी सुधार लाना सरकार की जिम्मेदारी है।
वर्ष 2006 में 'भोजन सुरक्षा एवं मानकीकरण अधिनियमÓ लाया गया। इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए एक नियामक प्राधिकरण बनाया गया है जो खाद्य पदार्थों के निर्माण, भंडारण, वितरण, बिक्री और आयात का नियमन और मानकीकरण की निगरानी करता है। वर्ष 2019 में 'उपभोक्ता संरक्षण अधिनियमÓ द्वारा उपभोक्ताओं को असुरक्षित, मिलावटी, त्रुटिपूर्ण और गलत जानकारी देकर खाद्य सामग्रियों की बिक्री के विरुद्ध संरक्षण दिया गया है। संविधान की उच्चतम न्यायालय द्वारा समय-समय पर 'धारा-21Ó के अंतर्गत की गई व्याख्याओं में भोजन के अधिकार में उपलब्धता, पहुंच, सामर्थ्य के भीतर होना, सुरक्षा, पोषक तत्वों से युक्त होना और जानकारी शामिल है। वर्ष 2013 में 'भोजन का अधिकार कानूनÓ बनाकर जरूरतमंद लोगों तक आर्थिक सहायता प्राप्त भोजन उपलब्ध करवाने की व्यवस्था की गई है।
मिलावट के विरुद्ध भी पर्याप्त कानूनी प्रावधान किए गए हैं। उनके लागू करने में भले ही कुछ ढील रहती हो, जैसे कि आए दिन मिलावटी दुग्ध पदार्थ पकड़े जाने की खबरें आती रहती हैं। पकड़ के बावजूद इतने मामले होते हैं जो चिंता की बात है। यानी मिलावटखोरी सुरक्षित भोजन की उपलब्धता के रास्ते में बड़ी रुकावट है, किंतु शुद्ध और सुरक्षित भोजन की उपलब्धता के विषय में एक बात बिल्कुल नजरंदाज की जा रही है, जिसके विषय में कोई स्पष्ट कानूनी प्रावधान भी नहीं है। वह है, कीटनाशकों और खरपतवार नाशकों के अंधाधुंध प्रयोग के कारण जहरीली हो रही खाद्य सामग्रियां। यहां तक कि रोगियों को स्वास्थ्य लाभ के लिए दिए जाने वाले फल भी जहरीले रसायनों से मुक्त नहीं हैं। सब्जियों में और भी ज्यादा स्थिति खराब है, क्योंकि उनको स्प्रे के बाद थोड़े अन्तराल में ही उपयोग कर लिया जाता है, जिससे जहर को शमित होने का समय भी नहीं मिलता।
भारत सरकार की 'सेंट्रल इन्सेक्टिसाइड बोर्ड एंड रजिस्ट्रेशन कमेटीÓ द्वारा लाल और पीले त्रिकोण से अंकित दवाइयों का छिड़काव प्रतिबंधित करने की सिफारिश की गई है, क्योंकि ये अति-जहरीले और अधिक-जहरीले की श्रेणी में आते हैं। इनमें नीले और हरे त्रिकोण से अंकित रसायनों का ही प्रयोग स्प्रे के लिए करना चाहिए, क्योंकि ये कम जहरीले और सुरक्षित श्रेणी में आते हैं, किंतु इन सिफारिशों को लागू करने का कोई कानूनी प्रावधान नहीं है, जिससे इन जहरीले रसायनों के प्रयोग को नियंत्रित नहीं किया जा सके। खरपतवार नाशकों में 'पैराक्यूएटÓ और 'ग्लाइफोसेटÓ जैसे रसायन अति जहरीले हैं और कैंसर कारक हैं। इनका असर भी जमीन में रह जाता है और फसलों तक पहुंच जाता है। इसका कुल प्रभाव उन इलाकों में देखा जा सकता है, जहां इन रसायनों का प्रयोग अधिक हो रहा है। पंजाब में बठिंडा का इलाका कैंसर बेल्ट बन चुका है। हिमाचल प्रदेश में भी कैंसर फैलने की दर राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है, क्योंकि यहां भी सब्जी, फलों पर कीटनाशकों और खरपतवार नाशकों का प्रयोग बढ़ता जा रहा है।
गेहूं, धान, मक्की जैसी फसलों में अब निराई-गुड़ाई की परंपरा खत्म होती जा रही है। फटाफट ऐसे रसायनों का स्प्रे किया जा रहा है, जो उस फसल के अलावा सब कुछ जला देते हैं, जिसमें स्प्रे के लिए उसे बनाया गया है। खेतों में खाली होने पर पनपने वाले नए-नए खरपतवारों के लिए 'पैराक्यूएट' और 'ग्लाइफोसेट' जैसे रसायनों को धड़ल्ले से प्रयोग किया जा रहा है। स्प्रे में सावधानी के नाम पर भी जानकारी का पूर्ण अभाव ही दिखाई देता है। इसलिए सुरक्षित अन्न, सब्जियां और फल उपलब्ध करवाने के लिए इन अति जहरीले रसायनों की बिक्री प्रतिबंधित की जानी चाहिए। पर्याप्त जागरूकता फैलाने के लिए जरूरी कदम उठाने की योजना होनी चाहिए और किसानों को वैकल्पिक विधियां और रसायनों की जानकारी और उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए। सरकार का जैविक और जहरमुक्त कृषि का संकल्प इस दिशा में बहुत अच्छा कदम है, किंतु इसको मुख्यधारा कृषि तक पहुंचने में अभी बहुत प्रयास करने की जरूरत है। आशा की जानी चाहिए कि सरकारें नागरिकों के जीवन के मौलिक अधिकार की रक्षा करने की अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए जरूरी कदम उठाने की पहल करेंगी।
(स्वतंत्र लेखक हैं और 'हिमालय नीति अभियान' के अध्यक्ष हैं।)