सरकारी स्कूलों में दाखिले के बाद की चुनौती?
पांच साल के बच्चे के हाथ में जब पहली किताब आती है, तो उसके साथ परिवार की उम्मीदें भी स्कूल पहुंचती हैं।;
- निमिषा सिंह
बच्चा जिस भाषा में घर पर बात करता है और अपने आसपास की दुनिया को समझता है, उसी भाषा के सहारे नई बातें सीखना उसके लिए आसान होता है। शुरुआती कक्षाओं में यदि बच्चों को अपनी बात कहने और सवाल पूछने का मौका मिले, तो वे पढ़ाई से बेहतर ढंग से जुड़ सकते हैं। शिक्षक का काम केवल पाठ पढ़ाना नहीं, बल्कि यह समझना भी है कि बच्चे उसे कितना समझ पा रहे हैं।
पांच साल के बच्चे के हाथ में जब पहली किताब आती है, तो उसके साथ परिवार की उम्मीदें भी स्कूल पहुंचती हैं। माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा पढ़े, आगे बढ़े और जीवन में बेहतर अवसर पाए, लेकिन क्या स्कूल में उसे ठीक से सीखने का मौका मिल रहा है? क्या वहां का माहौल उसकी उम्र और समझ के हिसाब से है? स्कूल में दाखिला मिलना एक बात है और वहां अच्छी शिक्षा मिलना दूसरी।
'यूनेस्कोÓ की तरफ से जारी 'ग्लोबल एजुकेशन मॉनिटरिंग' (जीईएम) रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में पांच साल के 51 प्रतिशत बच्चे पूर्व-प्राथमिक शिक्षा के बजाय प्राथमिक विद्यालयों में दाखिल हैं। यह आंकड़ा बताता है कि बड़ी संख्या में बच्चे कम उम्र में ही पहली कक्षा तक पहुंच रहे हैं। इसका यह मतलब नहीं कि इन सभी बच्चों ने पहले आंगनवाड़ी या किसी दूसरे केंद्र में पढ़ाई नहीं की। सवाल यह है कि पहली कक्षा में पहुंचने के बाद उन्हें किस तरह पढ़ाया जा रहा है।
पांच साल की उम्र में बच्चे खेलते हुए, कहानियां सुनते हुए और सवाल पूछते हुए बहुत कुछ सीखते हैं। इस उम्र में उनके लिए पढ़ाई का मतलब केवल किताबों से अक्षर सीखना नहीं है। यदि शुरुआत से ही उन पर जल्दी-जल्दी लिखने, अक्षर याद करने और किताबें पूरी करने का दबाव डाला जाए, तो पढ़ाई में उनकी रुचि कम भी हो सकती है। इसलिए यह देखना जरूरी है कि बच्चे स्कूल तो पहुंच रहे हैं, लेकिन वहां सीख भी पा रहे हैं या नहीं।
भारत में सरकारी स्कूलों की अहमियत इसी बात से समझी जा सकती है। गांवों, छोटे कस्बों और कम आमदनी वाले परिवारों के लिए सरकारी स्कूल ही शिक्षा का सबसे सुलभ साधन हैं। हर परिवार निजी स्कूल की फीस और दूसरे खर्च नहीं उठा सकता। ऐसे में सरकारी स्कूलों की हालत का असर उन बच्चों पर सबसे ज्यादा पड़ता है, जिनके पास दूसरे विकल्प नहीं हैं।
एक तरफ कुछ परिवार अपने बच्चों को अच्छी सुविधाओं वाले स्कूलों में पढ़ा सकते हैं, वहीं दूसरी तरफ कई बच्चों को कमरों, शिक्षकों और पढ़ाई के साधनों की कमी के बीच पढ़ना पड़ता है। ऐसे में शिक्षा सबको आगे बढ़ने का समान अवसर कैसे दे पाएगी? सरकारी स्कूलों में बच्चों का नामांकन बढ़ाना जरूरी है, लेकिन उतना ही जरूरी है कि उन्हें पढ़ने और समझने के लिए अच्छा माहौल भी मिले।
बिहार के रोहतास जिले के रूपिबांध प्राथमिक विद्यालय की एक खबर इस स्थिति को समझने में मदद करती है। अक्टूबर 2026 की खबर के मुताबिक, वहां कक्षा एक से पांच तक के 82 बच्चे लगभग 20 गुणा 15 फुट के एक कमरे में पढ़ते हैं। स्कूल में चार शिक्षक और एक ब्लैक बोर्ड है। इसी कमरे में प्रधानाध्यापक का कार्यालय भी है और मध्याह्न भोजन की सामग्री भी रखी जाती है।
यह बिहार के एक स्कूल का उदाहरण है, पूरे राज्य की तस्वीर नहीं, लेकिन इससे यह सवाल जरूर उठता है कि एक ही कमरे में पांच कक्षाओं के बच्चे पढ़ रहे हों, तो हर कक्षा पर कितना ध्यान दिया जा सकता है? पांच साल के बच्चों को खेल और गतिविधियों के जरिए पढ़ाने की बात करना आसान है, लेकिन इसके लिए जगह और जरूरी साधन भी तो होने चाहिए। केवल पाठ्यक्रम बदलने से स्कूलों की समस्याएं दूर नहीं होंगी।
शिक्षा मंत्रालय के 2025-26 के आंकड़ों के मुताबिक, देश में सरकारी और निजी सहित सभी तरह के 1,00,843 स्कूल ऐसे हैं, जहां केवल एक शिक्षक दर्ज है। इनमें महाराष्ट्र के 9,269, उत्तरप्रदेश के 7,874, राजस्थान के 7,200 और बिहार के 2,006 स्कूल शामिल हैं। ये आंकड़े खाली पदों के नहीं, बल्कि एक शिक्षक वाले स्कूलों के हैं।
अब सवाल यह है कि जहां एक शिक्षक को कई कक्षाओं के बच्चों को पढ़ाना पड़ता है, वहां हर बच्चे की जरूरत पर कितना ध्यान दिया जा सकता है? पहली कक्षा में आने वाले सभी बच्चों की समझ और सीखने की गति एक जैसी नहीं होती। कुछ बच्चे घर पर किताबों और कहानियों से परिचित होते हैं, तो कुछ के लिए स्कूल ही सीखने का पहला बड़ा अनुभव होता है। ऐसे में शिक्षक को हर बच्चे को समझने और उसके हिसाब से पढ़ाने का समय मिलना भी जरूरी है।
उत्तरप्रदेश में इस दिशा में एक पहल की गई है। शैक्षणिक सत्र 2026-27 में कक्षा एक के बच्चों के लिए 12 सप्ताह का 'विद्या प्रवेशÓ कार्यक्रम चलाने के निर्देश दिए गए हैं। इसमें खेल और दूसरी गतिविधियों के जरिए बच्चों को भाषा, शुरुआती गणित और आसपास की दुनिया के बारे में सिखाने का लक्ष्य है। ऐसी पहल का उद्देश्य बच्चों को पहली कक्षा की पढ़ाई के लिए तैयार करना है, लेकिन किसी योजना का असली असर तभी दिखता है, जब वह कक्षा में ठीक से लागू हो। इसके लिए शिक्षकों को प्रशिक्षण और जरूरी सामग्री मिलनी चाहिए। बच्चों को भी अपनी बात कहने, सवाल पूछने और दूसरे बच्चों के साथ मिलकर सीखने का मौका मिलना चाहिए।
उत्तरप्रदेश के 200 सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में किए गए एक अध्ययन के नतीजे इस ओर ध्यान दिलाते हैं। 'टीचिंग लर्निंग प्रैक्टिसेज सर्वे 2025' के मुताबिक, लगभग दो-तिहाई कक्षाओं में बच्चों को खुलकर बोलने, शिक्षक से बातचीत करने और एक-दूसरे से सीखने के सीमित अवसर मिले। अध्ययन में 73 प्रतिशत शिक्षकों को बच्चों की घरेलू भाषा की जानकारी थी, लेकिन लगभग 10 प्रतिशत शिक्षक ही उस भाषा का नियमित इस्तेमाल करते पाए गए।
बच्चा जिस भाषा में घर पर बात करता है और अपने आसपास की दुनिया को समझता है, उसी भाषा के सहारे नई बातें सीखना उसके लिए आसान होता है। शुरुआती कक्षाओं में यदि बच्चों को अपनी बात कहने और सवाल पूछने का मौका मिले, तो वे पढ़ाई से बेहतर ढंग से जुड़ सकते हैं। शिक्षक का काम केवल पाठ पढ़ाना नहीं, बल्कि यह समझना भी है कि बच्चे उसे कितना समझ पा रहे हैं।
इस पूरी चर्चा में आंगनवाड़ी की भूमिका को भी नहीं भूलना चाहिए। 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020' में तीन से छह साल के बच्चों की शुरुआती शिक्षा पर जोर दिया गया है। इस उम्र में खेल, गीत, कहानियां और बातचीत बच्चों को सीखने में मदद करते हैं। इसलिए आंगनवाड़ी से प्राथमिक विद्यालय तक बच्चे की पढ़ाई का सिलसिला बना रहना चाहिए।
बिहार में 'एएसईआर 2024Ó की रिपोर्ट के मुताबिक, पांच साल के बच्चों का आंगनवाड़ी में नामांकन 2018 के 36.4 प्रतिशत से बढ़कर 2024 में 48.3 प्रतिशत हो गया। यह अच्छी बात है कि आंगनवाड़ी तक पहुंचने वाले बच्चों की संख्या बढ़ी है, लेकिन इसके साथ यह भी देखना होगा कि वहां बच्चे जो सीखते हैं, उसे पहली कक्षा में आगे बढ़ाने की व्यवस्था है या नहीं। यदि दोनों के बीच तालमेल हो, तो बच्चे के लिए स्कूल में आगे की पढ़ाई समझना आसान हो सकता है।
'यूनेस्को' की रिपोर्ट ने शुरुआती शिक्षा पर चर्चा का एक जरूरी आधार दिया है। पांच साल के बच्चों का प्राथमिक विद्यालय में दाखिला अपने आप में गलत नहीं है। असली बात यह है कि स्कूल उनकी उम्र और जरूरतों के मुताबिक पढ़ाने के लिए तैयार हैं या नहीं। बच्चों को पर्याप्त शिक्षक, ठीक कक्षाएं और सीखने के अच्छे अवसर मिलें, तभी कम उम्र में स्कूल पहुंचना उनके लिए उपयोगी साबित होगा।
( लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं।)