युद्धविराम और हाशिए पर धकेल दिया गया भारत

यह युद्ध स्पष्ट रूप से नेतन्याहू की देन है और ट्रम्प इसके परिणामों के बारे में सोचे-समझे बिना ही इसमें फंस गए।

Update: 2026-04-10 22:00 GMT

— डॉ. मलय मिश्रा

यह युद्ध स्पष्ट रूप से नेतन्याहू की देन है और ट्रम्प इसके परिणामों के बारे में सोचे-समझे बिना ही इसमें फंस गए। अमेरिका के नाटो सहयोगियों द्वारा उनके हवाई क्षेत्र से उड़ान भरने या अमेरिकी ठिकानों के उपयोग करने की अनुमति देने से इंकार करना अंतिम झटका साबित हुआ जिसने ट्रम्प को इस क्षेत्र से पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। जलडमरूमध्य अभी भी ईरान के नियंत्रण में है।

पश्चिमी एशिया में चल रहे युद्ध में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा मंगलवार 8 अप्रैल को घोषित दो सप्ताह का विराम एक राहत की बात है लेकिन इससे अंतरराष्ट्रीय नियमों पर आधारित व्यवस्था के पतन से चिह्नित नई भू-राजनीतिक गतिशीलता में कोई बदलाव नहीं आएगा। यह अनिश्चित है कि युद्ध पूरी तरह से कब समाप्त होगा परन्तु यह निश्चित है कि क्षेत्र की संरचना फिर कभी पहले जैसी नहीं रहेगी। पश्चिमी एशिया में चल रहा युद्ध दूसरे महीने में भी आक्रामक और खतरनाक रूप ले चुका है। यह शायद दो दशकों में सबसे विनाशकारी संघर्ष है। इज़रायल-अमेरिका और ईरान सैन्य शक्ति के नजरिये से एक असमान और विषम युद्ध लड़ रहे हैं जिसके उद्देश्य तेजी से बदलते रहे हैं और उनमें कोई सामंजस्य नहीं है। इस विनाशकारी तबाही और नरसंहार में अब तक कई प्रवासी भारतीयों सहित 3000 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। विश्वविद्यालयों, परमाणु, बिजली और ऊर्जा केंद्रों को निशाना बनाया जा रहा है। युद्ध तेजी से बढ़ा है और क्षेत्रीय स्तर पर फैल गया है जिसके दूरगामी परिणाम खाड़ी क्षेत्र से परे हैं।

इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ईरान को 'आतंकवाद का स्रोत' एवं हमास, हिजबुल्लाह, हूथी विद्रोहियों तथा इराक एवं सीरिया के मिलिशिया जैसे गैर-सरकारी संगठनों का संरक्षक बताते हुए 'अस्तित्वगत खतरा' और 'विनाशकारी' कहा था। वेनेजुएला में अपने अभियान और ग्रीनलैंड पर कब्ज़ा करने की बेतुकी मांगें करने वाले अस्थिर अमेरिकी राष्ट्रपति ने इज़रायली प्रधानमंत्री द्वारा तैयार की गई युद्ध की योजना को तुरंत स्वीकार कर लिया। ईस्लामी शासन ने बड़े पैमाने पर चले जनांदोलन और जनवरी में एक महीने तक चले दंगों द्वारा क्रूरतापूर्वक कुचल दिया, फिर भी इसने एक आदर्श पृष्ठभूमि प्रदान की और सत्ता परिवर्तन आक्रमणकारियों का पहला घोषित युद्ध-लक्ष्य बन गया। युद्ध के पहले ही दिन 28 फरवरी को ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई, 40 शीर्ष सैन्य व सुरक्षा अधिकारियों और उनके परिवारों के करीबी सदस्यों की लक्षित हत्या कर दी गई। बंकर में जाने से इंकार करते हुए 86 वर्षीय अयातुल्ला ने सच्चे शिया इस्लामी परंपरा के अनुसार शहादत को गले लगाना उचित समझा। इसके तुरन्त बाद ईरान के तीसरे सर्वोच्च नेता के रूप में चुने जाने वाले मोजतबा खामेनेई गंभीर रूप से घायल हो गए लेकिन ईरानी क्रांतिकारी गार्ड कोर और मौलवियों के मजबूत समर्थन से युद्ध प्रयासों का नेतृत्व कर रहे हैं।

इज़रायल और अमेरिका द्वारा ईरान की जनता से विद्रोह करने तथा अपनी सरकार पर कब्ज़ा करने का आह्वान करने वाली योजना बुरी तरह विफल हो गई। इसके विपरीत इन जघन्य हत्याओं ने जनता को एकजुट कर दिया और वे क्रांति के 'शत्रुओं' से लड़ने में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) का समर्थन कर रहे हैं। ईरान के लिए यह अस्तित्व का युद्ध था; अपनी संप्रभुता पर हुए इस कपटपूर्ण, अवैध और पूरी तरह से अनुचित हमले से खुद को बचाना था। ईरान पिछले 20 वर्षों से ऐसी किसी भी तरह की स्थिति से निपटने की तैयारियां कर रहा था और पिछले जून में अमेरिका समर्थित इज़रायल द्वारा ईरानी परमाणु ठिकानों पर किए गए क्रूर हमलों के 12 दिवसीय युद्ध के अनुभव से उसने कई सबक सीखे थे।

ईरान की एकीकृत कमान प्रणाली एक विकेन्द्रीकृत कमान और नियंत्रण संरचना में बदल गई जिसमें सभी 30 प्रांतों ने अलग-अलग कमांडरों के अधीन अपनी-अपनी सेनाएं गठित कीं। ये कमांडर तेहरान स्थित केंद्रीय कमान में स्थित सर्वोच्च नेता के समग्र निर्देशन में स्वायत्त रूप से लड़ेंगे। इसके अलावा शीर्ष स्तर के समाप्त होने की स्थिति में सत्ता समूहों को कार्यभार संभालने के लिए तैयार किया गया था। दूसरे, फारस की खाड़ी के तट सहित पूरे देश में विस्तृत भूमिगत सुरंगों का निर्माण करके वे अपनी मिसाइल और ड्रोन उत्पादन क्षमता को बरकरार रख सके और समन्वित और आक्रामक तरीके से हमले कर सके। शुरुआत में वे दुश्मन के अवरोधक विमानों और वायु रक्षा प्रणालियों को कमजोर करने के लिए अपनी पुरानी मिसाइलों का उपयोग करते थे जबकि अपनी नवीनतम तथा तकनीकी रूप से उन्नत मिसाइलों और ड्रोनों को बाद के उपयोग के लिए सुरक्षित रखते थे। चीन और रूस जैसी दो महाशक्तियों के स्पष्ट समर्थन से शक्तिशाली अमेरिका के खिलाफ ईरान 21वीं सदी का युद्ध लड़ रहा है। ईरान जानता है कि वह अमेरिका-इज़रायल गठबंधन को हरा नहीं सकता लेकिन वह उन्हें और क्षेत्र में उनके सहयोगियों को भारी नुकसान पहुंचा सकता है। वह दर्द और बलिदान सह सकता है, लेकिन बदले में दर्द भी पहुंचा सकता है और अंत तक लड़ सकता है।

यह एक विवादास्पद मुद्दा है कि क्या यह युद्ध अमेरिकी कांग्रेस अथवा संयुक्त राष्ट्र की अनुमति के बिना शुरू हुआ था या राष्ट्रपति ट्रम्प ने नेतन्याहू के साथ पूरी तरह से गठबंधन द्वारा शक्ति प्रदर्शन के रूप में शुरू किया था जिसका उद्देश्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम और मिसाइल एवं ड्रोन उत्पादन क्षमता को नष्ट करना था। अमेरिका में शक्तिशाली यहूदी लॉबी ने इज़रायल के लिए वाशिंगटन का पूर्ण समर्थन हासिल करने के लिए अथक प्रयास किए थे।

युद्ध के दौरान भूगोल और ऊर्जा ईरान के सबसे बड़े हथियार रहे हैं। होर्मुज स्ट्रेट (जलडमरूमध्य) वैश्विक ऊर्जा की जीवनरेखा है जिससे होकर वैश्विक तेल और गैस का 20 प्रतिशत से अधिक परिवहन होता है। होर्मुज पर पूर्ण नियंत्रण के साथ इस क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों और इज़रायल के महत्वपूर्ण सैन्य, नागरिक व परमाणु लक्ष्यों पर सटीक हमले करके ईरान शक्ति का केंद्र बन गया है। चीन और रूस द्वारा दिए गए उपग्रह समर्थन से ईरान को हवाई श्रेष्ठता मिल गई है जिसके कारण उसे रणनीतिक और सामरिक दोनों स्तरों पर बढ़त हासिल है।

इस उद्देश्य को ध्यान में रखकर कि युद्ध किस तरह जारी रखा जाए, ट्रम्प नए विकल्प तलाशने के लिए बेताब हैं। इसके साथ ही वे इससे निकलने के रास्ते भी तलाश रहे हैं। मध्यस्थों के माध्यम से ईरान से बातचीत करने और ज़मीनी स्तर पर सैन्य कार्रवाई की मांग करने वाले उनके बयानों ने उन्हें अस्थिर और अपने ही बयानों का विरोधी दिखाया है। यह स्पष्ट है कि फारस की खाड़ी में ईरानी तटरेखा पर खार्ग तथा ग्रेटर और लेसर टम्ब्स द्वीपों को सुरक्षित करने के लिए जमीनी अभियान शुरू करने की राष्ट्रपति ट्रम्प की योजना, होर्मुज पर बलपूर्वक नियंत्रण हासिल करने का अंतिम प्रयास हो सकती थी जिससे तीव्र जवाबी कार्रवाई की आशंका थी। खार्ग एक जबर्दस्त किलेबंद द्वीप है जो ईरान के अधिकांश तेल निर्यात के लिए प्रमुख टर्मिनल के रूप में कार्य करता है। इसके अलावा ईरान समर्थित हूथी विद्रोहियों ने इज़राइल पर बैलिस्टिक मिसाइलें दागकर और लाल सागर और स्वेज़ नहर के बाब अल-मन्देब मार्ग को अवरुद्ध करने की धमकी देकर एक और मोर्चा खोल दिया था। इसलिए अमेरिका द्वारा 'आज रात एक पूरी सभ्यता का अंत हो जाएगा' वाली धमकी के मद्देनजर दो सप्ताह का युद्धविराम अंतिम समय में किया गया बदलाव है जो अचानक तो है ही, पूर्णतया अप्रत्याशित नहीं है।

यह युद्ध स्पष्ट रूप से नेतन्याहू की देन है और ट्रम्प इसके परिणामों के बारे में सोचे-समझे बिना ही इसमें फंस गए। अमेरिका के नाटो सहयोगियों द्वारा उनके हवाई क्षेत्र से उड़ान भरने या अमेरिकी ठिकानों के उपयोग करने की अनुमति देने से इंकार करना अंतिम झटका साबित हुआ जिसने ट्रम्प को इस क्षेत्र से पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। जलडमरूमध्य अभी भी ईरान के नियंत्रण में है। यह पीछे हटना निस्संदेह अमेरिका की घरेलू राजनीति में हलचल पैदा करेगा क्योंकि 'नो किंग्स' विरोध-प्रदर्शन में पूरे अमेरिका से 80 लाख से अधिक प्रदर्शनकारी शामिल हुए जो इमिग्रेशन एंड कस्टम इन्फोर्समेंट (आईसीई) एजेंटों द्वारा अवैध अप्रवासियों की पहचान करना, उन्हें हिरासत में लेना व देश से बाहर निकालने के लिए अत्यधिक बल प्रयोग और ईरान के साथ युद्ध के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं।

अपनी अर्थव्यवस्था और विकास की गति पर गंभीर प्रभावों का सामना करते हुए अमेरिका और इज़रायल दोनों के साथ अपने रणनीतिक संबंधों का पुनर्मूल्यांकन करने के बारे में भारत विचार कर सकता है। ऐसा तभी संभव है जब भारत न्यायसंगत और संतुलित विदेश नीति बनाने के प्रति गंभीर हो। इस वर्ष ब्रिक्स और क्वाड शिखर सम्मेलनों की मेजबानी करने के बाद एवं रूस के साथ नेताओं का शिखर सम्मेलन आयोजित करने के बावजूद नेतृत्व की तलाश में भारत अपने पड़ोसी देशों में हो रहे सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रमों के बीच विरोधाभासी रूप से हाशिए पर धकेल दिया गया है।

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