ललित सुरजन की कलम से अडवानी या मोदी : फर्क क्या है?

अगर अटल बिहारी वाजपेयी की बात सुनी गई होती तो 2002 में ही नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री के पद से हट जाना चाहिए था।;

Update: 2026-05-25 21:46 GMT

'भाजपा की इस ताजा अर्न्तकलह के दूसरे मुख्य पात्र हैं गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी। इस पद पर कार्य करते हुए पिछले बारह साल में उनकी जो उपलब्धियां रही हैं उन्हें देखते हुए ऐसा कोई भी व्यक्ति उन्हें अपना वोट नहीं दे सकता, जो जनतंत्र, समाजवाद व धर्मनिरपेक्षता के बुनियादी उसूलों में विश्वास रखता हो। अगर अटल बिहारी वाजपेयी की बात सुनी गई होती तो 2002 में ही नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री के पद से हट जाना चाहिए था। यह विडंबना है कि जिन अडवानी ने मोदी का बचाव किया था वे ही आज अपने आपको ठगा महसूस कर रहे हैं। इस प्रसंग से यह जाहिर होता है कि श्री मोदी और श्री अडवानी दोनों राजधर्म की कसौटी पर खरे नहीं उतरे। इसलिए इन पर से किसी पर भी विश्वास करना देश के संविधान के साथ धोखा करना है।'

'नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल में गुजरात में 2002 का नरसंहार ही नहीं हुआ, उसके बाद का घटनाचक्र भी उनकी कोई बेहतर छवि पेश नहीं करता। आज उन्होंने अडवानीजी को किनारे लगाया है, लेकिन इसके बहुत पहले वे गुजरात में भाजपा की नींव मजबूत करने वाले केशुभाई पटेल व सुरेश मेहता जैसे नेताओं को दरकिनार कर चुके हैं।'

(देशबन्धु में 13 जून 2013 को प्रकाशित)

https://lalitsurjan.blogspot.com/2012/05/17.html

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