बारह साल बेमिसाल की गठरी खुल गई

प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया पर इस समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सत्ता पर 12 साल पूरे करने की खुशियां उमड़ी जा रही हैं।;

Update: 2026-06-10 21:40 GMT
1947 में नेहरूजी के साथ सरदार पटेल, डॉ. अंबेडकर, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, सी. राजगोपालाचारी और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद जैसे दिग्गजों ने सत्ता संभाली थी। हरेक की अपनी अलग हस्ती, अलग पहचान, अलग रूतबा। कोई किसी से कम नहीं और किसी ने किसी से तुलना नहीं की। यहां तक इनमें से किसी को नेहरू के नाम की टेक लगाने की जरूरत भी नहीं पड़ी।

प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया पर इस समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सत्ता पर 12 साल पूरे करने की खुशियां उमड़ी जा रही हैं। एक पुराने गीत की पंक्तियां हैं, मुझे खुशी मिली इतनी कि मन में न समाए, पलक बंद कर लूं, कहीं छलक ही न जाए, बस इसी कृतज्ञ भाव से कई टीवी पत्रकार बारह साल, बेमिसाल के इर्द-गिर्द कार्यक्रम कर रहे हैं। भले ही बारह सालों की उपलब्धियों को तलाशना भूसे के ढेर में सुई तलाशने जैसा कठिन काम हो, फिर भी मालिक को खुश करने के लिए सारी तकलीफें उठाई जा रही हैं। कलाकारों को भी इसी काम में जोत दिया गया है। शो मैन कहे जाने वाले सुभाष घई बता रहे हैं कि 2014 से पहले देश के हालात कितने बुरे थे और अब मोदीजी के आने से लोगों का यकीन काफी बढ़ चुका है। उनके जैसे कई और राष्ट्रवादी कलाकारों ने ऐसी ही स्क्रिप्ट पढ़कर सोशल मीडिया पर संवाद अदायगी की है। देश भर के मंदिरों में भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों, पदाधिकारियों ने पूजा की, पता नहीं एक साथ सबको कैसे एक जैसे काम सूझते हैं, या फिर ये लोग भी स्क्रिप्ट पर ही काम करते हैं। मोदी मंत्रिमंडल के लोग तो बारह सालों के कसीदे काढ़ते हुए लेख लिख ही रहे हैं, चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार के लेख भी अखबार में आ गए। चिराग पासवान, एकनाथ शिंदे, प्रफुल्ल पटेल न जाने क्यों पीछे रह गए। इन लोगों की लेखनी भी नरेन्द्र मोदी की बारह साला उपलब्धियों पर प्रकाश डालती तो एनडीए की एकजुटता पर पूरा ठप्पा लग जाता और मंत्रिमंडल में हिस्सेदारी बढ़ाने की चापलूसी भी पूरी हो जाती। बस अब एक बात की कसर रह गई है कि बारह साल के लिए कोई नयी उपमा गढ़ ली जाए। अब तक रजत, स्वर्ण, हीरक जयंती ही सुना करते थे। इन महंगी धातुओं के समान बेशकीमती साल का बखान हुआ करता था। इस समय तो सोना-चांदी तो दूर की बात पेट्रोल भी बेशकीमती हो चुका है और गेहूं, दाल, चावल भी। तो अब मोदीजी ही तय कर लें कि अब से किसी भी चीज के बारह साल पूरे हों तो उसे पेट्रोल जयंती के तौर पर मनाया जाए या गेहूं, चावल के तौर पर। वो चाहें तो इसे मशरूम या मखाना जयंती भी कह सकते हैं।

असल में मोदीजी के प्रचारक एक चूक कर गए। अगर वे बारह साल के लिए पहले ही कोई उपमा गढ़ लेते तो फिर नेहरूजी का नाम लेने की जरूरत ही नहीं पड़ती। सोचिए कितनी बेचारगी है नरेन्द्र मोदी की, कि कुछ भी कर लें नेहरूजी के नाम से पीछा ही नहीं छूटता। अभी बारह साल का जश्न भी तो इसीलिए मनाया जा रहा है क्योंकि नेहरूजी से ज्यादा दिनों तक शासन करने का रिकार्ड बना लिया। यानी कितना भी नेहरू को कोस लें, पैमाना वही रहेंगे। लेकिन केवल सत्ता पर बैठने का पैमाना क्यों तय करना है। 12 साल तक क्या किया, इसका भी हिसाब तो होना चाहिए। फकीर को इस बात से फर्क क्यों पड़ना चाहिए कि उसने कितने दिनों शासन संभाला। मोदीजी के राज्य गुजरात से ही आने वाले कथावाचक मोरारी बापू की सुनाई एक कथा याद आती है। खुद को संत मानने वाले एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी को भी भगवद भक्ति की राह पर चलाना चाहा। इसके लिए सारी मोह-माया का त्याग करना जरूरी था। संत घर-द्वार छुड़वाकर अपनी पत्नी को संग लेकर वन की तरफ चल पड़े, रास्ते में उन्हें एक स्वर्ण मुद्रा गिरी हुई दिखी। उन्होंने फौरन उस पर मिट्टी डाल दी कि पत्नी कहीं इस के मोह में न पड़ जाए। लेकिन संत को स्वर्ण मुद्रा पर मिट्टी डालते देख पत्नी ने पूछा कि स्वामी आपने मिट्टी पर मिट्टी किस प्रयोजन से डाली। पत्नी की इस बात को सुनते ही संत को अपने ओछेपन का अहसास हुआ कि दूसरों को मोह-माया से निकालने का दावा करने वाले वे खुद अब तक इस जाल में फंसे हुए हैं। जबकि उनकी पत्नी जिसने सांसारिक सुखों से मुंह मोड़ने का कभी दावा नहीं किया, वो गृहस्थी के अपने सारे कर्तव्य निभाते हुए भी लोभ-मोह से मुक्त थी।

हमें नहीं मालूम कि मोदीजी ने कभी ऐसी कोई कथा मोरारी बापू से सुनी या नहीं, लेकिन क्या वो अपनी फकीरी के दावे पर खरे उतर रहे हैं, यह अब जनता ही तय करे। वैसे राजनीति में नया चलन आ गया है कि सत्ता पर बैठने के सौ दिनों का जश्न मनाया जाए, साल भर पूरा हो जाए तो उसमें भी डंका पीटा जाए और पांच साल पूरे होने के बाद जनता दोबारा मौका दे, तब तो बात ही क्या है। इस लिहाज से देखें तो मोदीजी दो कार्यकाल पूरा करने के बाद तीसरी बार सत्ता पर बैठे तो 2024 में इसका जश्न मनाना सही था। लेकिन फिर अगले जश्न की बारी तो 2029 में आती, अगर जनता फिर से उन्हें चुनती। लेकिन 15 साल पूरे होने से पहले 12 साल में ही जश्न मनाया जा रहा है, क्योंकि नेहरूजी से आगे निकल गए हैं। मगर जैसे मोदीजी की शिक्षा, स्टेशन पर चाय बेचने और वैवाहिक स्थिति से लेकर काला धन वापिस लाने, हर खाते में 15 लाख रूपए डालने, अर्थव्यवस्था में लंबी छलांग लगाने जैसे कई वादों और दावों में भारी गफलत है, वैसी ही बड़ी गड़बड़ 12 साल तक सत्ता पर काबिज रहने के रिकॉर्ड में भी दिख रही है। पं.नेहरू स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री थे और उन्होंने 14-15 अगस्त की अर्द्धरात्रि को भाषण इसी हैसियत से दिया था। 15 अगस्त 1947 से लेकर अपनी मृत्यु 27 मई 1964 तक उन्होंने देश के प्रधानमंत्री का पद संभाला। कुल 16 बरस 286 दिन यानी 6,130 दिन तक वे प्रधानमंत्री बने रहे। तो फिर भाजपा नेहरूजी की सत्ता के कम से कम 4 बरसों को खारिज क्यों कर रही है। क्या केवल इसलिए कि पहले आम चुनाव 1952 में हुए और भाजपा की गिनती तभी से शुरु हुई है। क्या इस तरह भाजपा 1952 के पहले के आजाद भारत के वर्षों को मान्यता नहीं देती है। और सबसे बड़ा सवाल क्या भाजपा यह जानती है कि नरेन्द्र मोदी ले देकर 15 साल सत्ता के पूरे कर भी लें, तो 16वें साल में उनकी विदाई हो जाएगी। 2024 का डर क्या अब तक भाजपा में कायम है, जब 240 सीटों पर इंडिया ब्लॉक ने उसे रोक दिया, जबकि दावा 4 सौ पार का था। किस हड़बड़ी में भाजपा संसदीय दल की बैठक बुलाए बिना एनडीए के सहयोगियों की मदद से नरेन्द्र मोदी ने खुद को प्रधानमंत्री घोषित करवाया, यह सबने देखा है। नेहरूजी को तो ऐसा करने की कभी कोई जरूरत नहीं पड़ी। 1952, 57 और 62 में उन्हें पूर्ण बहुमत मिला। केबिनेट के मामले में भी मोदी नेहरूजी से कभी मुकाबला कर ही नहीं पाएंगे। 1947 में नेहरूजी के साथ सरदार पटेल, डॉ. अंबेडकर, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, सी. राजगोपालाचारी और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद जैसे दिग्गजों ने सत्ता संभाली थी।

हरेक की अपनी अलग हस्ती, अलग पहचान, अलग रूतबा। कोई किसी से कम नहीं और किसी ने किसी से तुलना नहीं की। यहां तक इनमें से किसी को नेहरू के नाम की टेक लगाने की जरूरत भी नहीं पड़ी। नेहरूजी समेत इन सबकी देशभक्ति, कर्तव्यनिष्ठा, ईमानदारी, बौद्धिकता बेमिसाल थी। तभी आजादी के महज पांच बरसों में भारत ने वैश्विक मानचित्र पर अपना अलग स्थान बना लिया था। दो साल की गुलामी के बाद जिस हाल में भारत नेहरूजी और उनके साथियों को मिला था, उसकी आज कल्पना ही नहीं की जा सकती। फिर भी 560 से ज़्यादा रियासतों का शांतिपूर्ण ढंग से भारतीय संघ में विलय हुआ, संविधान सभा बनी, संविधान के ड्राफ्ट पर लंबी-सार्थक बहसें हुई और फिर 26 जनवरी 1950 को संविधान अपनाया गया, ज़मींदारी प्रथा खत्म की गई, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण लागू हुआ, पुलों, कारखानों, सड़कों, स्टेशनों का निर्माण हुआ। सिंचाई और बिजली परियोजनाएं शुरू की गईं, विज्ञान और तकनीक के लिए बुनियादी ढांचा तैयार किया गया और जल्द ही अंतरिक्ष को नापने के लिए इसरो का गठन हुआ। आईआईटी, आईआईएम, एम्स, सेल, भेल, ओएनजीसी, सीआईएसआर, एचएएल, आईओसी, एफसीआई, एनएमडीसी जैसे कई संस्थानों और सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों बन कर खड़ी हुईं, जिनसे सही मायनों में भारत आत्मनिर्भर बना। आज उन्हीं सब को बेच-बेच कर अनाप-शनाप खर्च सरकार कर रही है और ढोल आत्मनिर्भरता का पीटा जा रहा है।

नेहरूजी के वक्त की उपलब्धियों में लोकतंत्र के लिहाज से तो सबसे शानदार काम यही रहा कि वयस्क मताधिकार हरेक नागरिक को दिया गया। आज एसआईआर के जरिए उस पर कैंची चलाई जा रही है। लेकिन नेहरूकाल में 17 करोड़ रजिस्टर्ड वोटरों वाली मतदाता सूची तैयार की गई, जिसके बाद आज़ाद भारत के पहले आम चुनाव अक्टूबर 1951 से फरवरी 1952 के बीच हुए। अगर ऐसा ही मौका मान लें कि नरेन्द्र मोदी के पास होता तो 1947 से 57 आ जाता और चुनाव न करवाने के बहाने ही भाजपा ढूंढती रहती ताकि मोदी की कुर्सी बरकरार रहे। नेहरूजी तो बेखौफ एक नहीं तीन-तीन बार चुनावों में उतरे और बिना हिंदू-मुसलमान किए जीत भी गए। क्या नरेन्द्र मोदी को यह चुनौती दी जा सकती है कि अपने किसी एक चुनावी भाषण में हिंदू-मुसलमान का जिक्र किए बगैर रहें, तय मानिए कि मोदी इस चुनौती को स्वीकार नहीं कर पाएंगे। नेहरूजी ने देश ही नहीं कई विदेशी पत्रकारों को भी खुलकर इंटरव्यू दिया और कई प्रेस कांफ्रेंस कीं। क्या मोदी ऐसी हिम्मत दिखाएंगे।

मोदीजी के चाटुकारों ने उन्हें खुश करने के लिए बारह साल का जश्न मनाना तो शुरु कर दिया, लेकिन इसमें असल में इससे मोदीजी बुरी तरह फंस गए हैं। क्योंकि नेहरूजी से तुलना शुरु हो जाए, तो आजादी के लिए कई तरह की कुर्बानी देने से लेकर, किताबें लिखने, विदेश समकक्षों से हीही खीखी किए बिना, गले पड़े बिना मजबूत संबंध बनाने और सत्ता को देशसेवा का जरिया बनाने जैसे कई मोर्चों पर नेहरू बनाम मोदी होने लगेगा और इसमें तथाकथित महामानव कहां ठहरेंगे, सब जानते हैं। अच्छा होता कि इस समय को चुपचाप निकल जाने दिया होता, लेकिन अब तो गठरी खुल चुकी है।

Tags:    

Similar News