ललित सुरजन की कलम से प्रभाकर चौबे: खत्म न होने वाली यादें
1970 में जब हम विवेकानंद नगर छोड़ चौबे कॉलोनी में दूसरे किराए के घर में रहने पहुंचे तो सबसे पहले प्रभाकर और भाभी से ही मिलने गए;
1970 में जब हम विवेकानंद नगर छोड़ चौबे कॉलोनी में दूसरे किराए के घर में रहने पहुंचे तो सबसे पहले प्रभाकर और भाभी से ही मिलने गए, जो हमसे कुछ पहले वहीं रहने आ गए थे।
आज बाबूजी के नाम पर जो मायाराम सुरजन शास. उच्च. माध्यमिक विद्यालय चौबे कॉलोनी में है, उसका नाम तब शास. प्राथमिक शाला डंगनिया (ब) था। हम दोनों मित्रों ने अपने बच्चों को चार टूटे-फूटे कमरों वाली उसी शाला में दाखिल करवाया; और प्रधान पाठक बोधनलाल पांडे तथा छविराम वर्मा के साथ कॉलोनी के अलावा आसपास के इलाके में घर-घर जाकर चंदा मांगा कि इस शाला को एक आदर्श स्कूल बनाने के लिए साधन जुटाए जा सकें।
प्रभाकर और मैंने पच्चीस साल से अधिक समय तक शाला विकास समिति का काम संभाला, नागरिकों का सहयोग लिया, शिक्षकों की हौसला अफजाई की और एक सरकारी स्कूल को ऐसा रूप देने में सहायक बने कि शिक्षा जगत में उसकी धूम मच गई। यह प्रभाकर चौबे की समाज सक्रियता की एक मिसाल है।
(देशबन्धु में 28 जून 2018 को प्रकाशित)
https://lalitsurjan.blogspot.com/2018/06/blog-post_27.html