पटाखों का प्रदूषण
दीपावली पर पटाखों के इस्तेमाल से वायु-प्रदूषण बढ़ने की चिंता नई नहीं है;
- सुदर्शन सोलंकी
पटाखे से शहर की हवा तक-पटाखा जलने पर रासायनिक अभिक्रियाओं से ऊर्जा निकलती है। यही ऊर्जा प्रकाश, रंग और ध्वनि पैदा करती है। इस प्रक्रिया के दौरान पटाखे में इस्तेमाल पदार्थों के आधार पर सूक्ष्म कण, गैसीय-प्रदूषक और धातुओं वाले कण भी निकलते हैं। इनकी मात्रा उत्पाद की संरचना और दहन की परिस्थितियों के अनुसार बदलती है। वायु-प्रदूषण मापने में 'पीएम-10' (पार्टीकुलेट मैटर) और 'पीएम 2.5' महत्वपूर्ण संकेतक हैं।
दीपावली पर पटाखों के इस्तेमाल से वायु-प्रदूषण बढ़ने की चिंता नई नहीं है। इस समस्या से निपटने के लिए कम उत्सर्जन वाले हरित पटाखे भी विकसित किए गए हैं, लेकिन एक सवाल अब भी महत्वपूर्ण है: यदि किसी पटाखे से पहले की तुलना में कम प्रदूषक निकलते हैं, तो क्या इससे शहर की हवा भी स्वच्छ रहती है? इसका जवाब केवल पटाखे की रासायनिक संरचना में नहीं, बल्कि उत्सर्जन की कुल मात्रा, मौसम, दूसरे प्रदूषण स्रोतों और हवा की निगरानी के आंकड़ों में छिपा है। यही अंतर दीपावली के प्रदूषण को समझने की कुंजी है।
पटाखे से शहर की हवा तक-पटाखा जलने पर रासायनिक अभिक्रियाओं से ऊर्जा निकलती है। यही ऊर्जा प्रकाश, रंग और ध्वनि पैदा करती है। इस प्रक्रिया के दौरान पटाखे में इस्तेमाल पदार्थों के आधार पर सूक्ष्म कण, गैसीय-प्रदूषक और धातुओं वाले कण भी निकलते हैं। इनकी मात्रा उत्पाद की संरचना और दहन की परिस्थितियों के अनुसार बदलती है। वायु-प्रदूषण मापने में 'पीएम-10' (पार्टीकुलेट मैटर) और 'पीएम 2.5' महत्वपूर्ण संकेतक हैं। 'पीएम-10' में 10 माइक्रोमीटर या उससे कम व्यास वाले कण शामिल होते हैं, जबकि 'पीएम 2.5' में 2.5 माइक्रोमीटर या उससे कम व्यास वाले कण आते हैं। इतने छोटे कण श्वसनतंत्र में गहराई तक पहुंच सकते हैं जिससे हृदय और फेफड़ों से जुड़ी कई स्वास्थ्य समस्याएं खड़ी हो सकती हैं।
पटाखों से निकले कण हवा में पहले से मौजूद वाहन-उत्सर्जन, उद्योगों के धुएं और धूल के साथ मिल सकते हैं। ऐसे में वायु-गुणवत्ता पर एक साथ कई स्रोतों का प्रभाव पड़ता है। दीपावली के समय आतिशबाजी प्रदूषण में अतिरिक्त योगदान दे सकती है, लेकिन उस समय मापे गए कुल प्रदूषण को केवल पटाखों के खाते में डालना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा। इस अंतर को समझना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि प्रदूषण के अलग-अलग स्रोतों को नियंत्रित करने के उपाय भी अलग होते हैं। पटाखों के उत्सर्जन में कमी उपयोगी हो सकती है, लेकिन उससे वाहन, उद्योग या खुले में जलने वाली जैविक सामग्री से होने वाला प्रदूषण अपने आप समाप्त नहीं हो जाता।
हवा कब और क्यों प्रदूषित बनी रहती है-प्रदूषक हवा में पहुंचने के बाद कितनी देर तक किसी क्षेत्र में बने रहेंगे, यह मौसम और स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है। हवा की गति, तापमान, आर्द्रता, वातावरण की स्थिरता और वर्षा प्रदूषकों के फैलाव को प्रभावित करते हैं। तेज हवा कई परिस्थितियों में प्रदूषकों को फैलाकर किसी स्थान पर उनकी सघनता कम कर सकती है। इसके विपरीत, हवा की गति कम होने पर प्रदूषकों का फैलाव सीमित हो सकता है। जमीन के पास की ठंडी हवा के ऊपर गर्म हवा की परत होने से ऊर्ध्वाधर मिश्रण कमजोर पड़ सकता है। इससे प्रदूषक निचली वायुमंडलीय परत में अधिक समय तक बने रह सकते हैं।
2026 का शोध क्या बताता है-दीपावली और वायु-प्रदूषण के संबंध पर जून 2026 में 'साइंटिफिक रिपोर्ट्स' में प्रकाशित एक अध्ययन ने व्यापक क्षेत्रीय दृष्टिकोण से देखा। शोधकर्ताओं ने सिंधु-गंगा के मैदानी क्षेत्र के 14 शहरों में 2024 की दीपावली से पहले, उसके दौरान और बाद के वायु-गुणवत्ता आंकड़ों का विश्लेषण किया। अध्ययन में जमीन पर स्थित निगरानी केंद्रों के आंकड़ों के साथ उपग्रह-आधारित जानकारी और मौसम संबंधी संकेतकों का भी उपयोग किया गया। शोध में विभिन्न शहरों में 'पीएम2.5,' 'पीएम10' और कुछ गैसीय प्रदूषकों के स्तर में अलग-अलग बदलाव पाए गए। दिल्ली में अध्ययन की अवधि के दौरान दीपावली पर 'पीएम-2.5' में पहले की तुलना में वृद्धि दर्ज की गई। कुछ स्थानों पर प्रदूषण त्योहार के बाद भी ऊंचा बना रहा। शोधकर्ताओं ने हवा की गति, तापमान और अन्य स्थानीय स्रोतों को प्रदूषकों के टिके रहने की संभावित वजहों में शामिल किया।
हरित पटाखे: बेहतर विकल्प, लेकिन पूरी मंजिल नहीं-कम उत्सर्जन वाले पटाखे विकसित करने का उद्देश्य पारंपरिक पटाखों से निकलने वाले प्रदूषकों को घटाना है। 'वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद' (सीएसआईआर) के 'राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान' (एनईईआरआई) ने ऐसी संरचनाएं विकसित की हैं जिनमें पारंपरिक पटाखों की तुलना में कणीय पदार्थ का उत्सर्जन घटाने का प्रयास किया गया है। 'सीएसआईआर' की दिसंबर 2025 की आधिकारिक विज्ञप्ति के अनुसार, विकसित हरित पटाखों की कुछ संरचनाओं में कणीय पदार्थ के उत्सर्जन में लगभग 30-40 प्रतिशत कमी बताई गई है। यह प्रगति उपयोगी है, लेकिन इसे समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि तुलना किस उत्पाद से की गई है, किस प्रकार के उत्सर्जन को मापा गया है और परीक्षण किन परिस्थितियों में हुआ है। किसी उत्पाद से कणीय उत्सर्जन में कमी का अर्थ यह नहीं कि उससे सभी प्रकार के प्रदूषकों में उतनी ही कमी होगी।
प्रमाणन और निगरानी क्यों जरूरी हैं-कम उत्सर्जन वाले पटाखों का वास्तविक लाभ तभी मिल सकता है जब बाजार में उपलब्ध उत्पाद निर्धारित मानकों के अनुरूप हों। केवल किसी पैकेट पर 'हरित' लिखा होना पर्याप्त नहीं है। 'सीएसआईआर-एनईईआरआई' हरित पटाखों से संबंधित परीक्षण और प्रमाणन का काम करता है तथा अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर निर्माताओं और प्रमाणपत्रों से जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराता है। नियामक संस्थाओं के लिए यह भी जरूरी है कि नियमों का पालन सुनिश्चित किया जाए और गलत दावों या अनधिकृत उत्पादों के विरुद्ध कार्रवाई हो।
सितंबर 2026 में सर्वोच्च न्यायालय के एक आदेश में निर्धारित शर्तों के अधीन नई पीढ़ी के हरित पटाखों को लेकर अनुमति संबंधी प्रावधान स्वीकार किए गए हैं। इनमें परीक्षण, प्रमाणन, लाइसेंसधारी निर्माताओं, उत्सर्जन तथा सुरक्षा मानकों और प्रतिबंधित रसायनों से संबंधित शर्तें शामिल थीं। यह बताता है कि इस विषय में वैज्ञानिक परीक्षण और नियामक व्यवस्था की भूमिका महत्वपूर्ण है।
प्रदूषण के आंकड़ों को कैसे समझें-दीपावली के आसपास वायु-गुणवत्ता की निगरानी केवल प्रदूषण का स्तर जानने के लिए नहीं, बल्कि उसके कारणों और अवधि को समझने के लिए भी जरूरी है। त्योहार से पहले, उसके दौरान और बाद के आंकड़ों की तुलना करने से पता चलता है कि प्रदूषण कब बढ़ा और कितनी देर तक बना रहा, लेकिन किसी एक दिन के आंकड़े से पूरी कहानी स्पष्ट नहीं होती। यदि किसी शहर में दीपावली के अगले दिन 'पीएम-2.5' बढ़ा हुआ मिलता है, तो यह देखना भी जरूरी है कि त्योहार से पहले उसका स्तर कितना था, उस दौरान हवा की गति कैसी रही और आसपास अन्य प्रदूषणकारी गतिविधियां कितनी थीं।
स्वच्छ हवा के लिए क्या किया जा सकता है-दीपावली के दौरान प्रदूषण कम करने के लिए एक ही उपाय पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। कम उत्सर्जन वाली तकनीक, प्रमाणित उत्पाद, लागू नियमों का पालन और अनावश्यक आतिशबाजी में कमी - इन सबकी अपनी भूमिका है। सामूहिक उत्सवों में सीमित आतिशबाजी और रोशनी के दूसरे विकल्प अपनाने से उत्सव का सामाजिक पक्ष बनाए रखते हुए प्रदूषणकारी गतिविधियां घटाई जा सकती हैं।
( विज्ञान संबंधी विषयों के लेखक एवं ब्लॉगर हैं।)