विपक्ष की एकजुट चुनौती और जवाबदेही के सवाल

चुनाव प्रक्रिया की स्वच्छता बहाल करने के लिए देश में पहली बार बड़े पैमाने पर विरोध के स्वर लगातार उठे हैं। राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस लंबे समय से चुनावों में धांधली का मुद्दा उछाल रही है;

By :  Deshbandhu
Update: 2026-11-06 02:12 GMT
  •  राजेश पांडेय

राहुल हमेशा जनता से जुड़े मुद्दे उठाते हैं। वे समाज के वंचित वर्ग के हितों की पैरवी करते हैं। उन्होंने कांग्रेस पार्टी के संगठन में ऐसे वर्गों के लोगों को आगे बढ़ाने की कोशिश की है। संवैधानिक मूल्यों की रक्षा और लोकतंत्र की हिफाजत पर जोर दिया है। वे संसद और सड़क दोनों जगह विपक्ष के नेता की असली भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने विपक्ष को एकजुट रखने के लिए आगे आकर प्रयास किए हैं।

चुनाव प्रक्रिया की स्वच्छता बहाल करने के लिए देश में पहली बार बड़े पैमाने पर विरोध के स्वर लगातार उठे हैं। राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस लंबे समय से चुनावों में धांधली का मुद्दा उछाल रही है। अदालतों में भी मुकदमे दायर हुए हैं। 1 नवंबर को नई दिल्ली के रामलीला मैदान में विपक्ष की एकजुट रैली ने चुनावी गड़बड़ी के खिलाफ असरदार संदेश दिया है। इस बीच चुनाव आयोग की कुछ और अनियमितताएं सामने आ रही हैं। लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने चुप्पी साध रखी है। उनके बचाव की जिम्मेदारी सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने संभाल रखी है। हालांकि, मतदाता सूचियों के विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) की प्रक्रिया में खामियों के बारे में वह कुछ नहीं बोलती है।

यहां हम दो अहम मुद्दों पर गौर करते हैं- पहला विपक्षी दलों की एकता और दूसरा लोकतंत्र के सामने मौजूद खतरे। एसआईआर में गड़बड़ी के खिलाफ विपक्ष का संयुक्त प्रदर्शन और उसमें छात्रों, एक्टिविस्ट, कुछ अन्य संगठनों की सक्रियता बताती है कि जनता का एक वर्ग इस मुद्दे की गंभीरता से चिंतित है। वह चुनाव आयोग सहित अन्य संस्थाओं की विश्वसनीयता बनाए रखना चाहता है। धांधली के साये में होने वाले चुनाव लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद के लिए खतरा हैं। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में इससे पहले कभी समूची चुनाव प्रणाली की पवित्रता पर इतना अधिक संदेह नहीं जताया गया था। इसलिए भी विपक्ष की एकजुटता मायने रखती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के 12 वर्षों के शासनकाल में लंबे समय तक विपक्षी दल अलग-अलग स्वर में बोलते रहे हैं। संसद में जरूर कुछ मुद्दों पर उनके बीच तालमेल नजर आता था। इसका सबसे बड़ा उदाहरण इस साल अप्रैल में संसद के बजट सत्र में 131 वें संविधान संशोधन विधेयक के पारित न होने का है। विधेयक में महिलाओं के लिए संसद और राज्य विधानसभाओं की 33प्रतिशत सीटों के आरक्षण और लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाकर 850 करने के प्रावधान थे। बहरहाल, राज्यों में अपने-अपने हितों की वजह से विपक्षी दल सड़क पर एकजुट नजर नहीं आते थे। लेकिन, सत्ताधारी दल की मिलीभगत से चुनाव आयोग की मनमानी ने बिखरे विपक्ष को एक-दूसरे के साथ खड़ा कर दिया है।

रामलीला मैदान के प्रदर्शन में अधिकतर विपक्षी पार्टियों की मौजूदगी दिखाती है कि उन्होंने राहुल गांधी के नेतृत्व को स्वीकार कर लिया है। कई बार अपने अटपटे कथनों के लिए चर्चित रहे राहुल ने मोदी सरकार को कई सामयिक मुद्दों पर कटघरे में खड़ा किया है। गांधी परिवार की विरासत को राहुल के खिलाफ बड़ा मुद्दा बनाया जाता है। वैसे, इस मामले में राहुल कुछ कर भी नहीं सकते हैं। भाजपा के सभी नेता और गोदी मीडिया की उपमा से विभूषित मीडिया का एक वर्ग हमेशा उनकी विशिष्ट विरासत को उछालता रहा है। उन्हें आम आदमी के सरोकारों से बेखबर एक राजपरिवार के वंशज के बतौर पेश किया जाता था। लेकिन राहुल ने लगातार सक्रियता से अपनी इमेज बदली है।

राहुल हमेशा जनता से जुड़े मुद्दे उठाते हैं। वे समाज के वंचित वर्ग के हितों की पैरवी करते हैं। उन्होंने कांग्रेस पार्टी के संगठन में ऐसे वर्गों के लोगों को आगे बढ़ाने की कोशिश की है। संवैधानिक मूल्यों की रक्षा और लोकतंत्र की हिफाजत पर जोर दिया है। वे संसद और सड़क दोनों जगह विपक्ष के नेता की असली भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने विपक्ष को एकजुट रखने के लिए आगे आकर प्रयास किए हैं। पहले कई प्रमुख विपक्षी नेता राहुल का नेतृत्व स्वीकार करने में हिचकिचाते थे। वह हिचक अब बहुत हद तक दूर हो गई है। राज्यों में एक-दूसरे का विरोध करने वालों की एकता व्यावहारिक राजनीति का हिस्सा है। राहुल के राजनीतिक सफर में भारत जोड़ो यात्रा के बाद विपक्ष को एक मंच पर लाने का घटनाक्रम महत्वपूर्ण माना जाएगा।

सवाल है, क्या विपक्ष की एकता आगे भी बनी रहेगी। कुछ राज्यों में चुनावी राजनीति के कारण उनके रास्ते जुदा हो जाते हैं। यों भी, भारत में बहुत कम मौकों पर विपक्षी दल एकजुट रहे हैं। सोशलिस्ट नेता राममनोहर लोहिया ने विपक्ष को जोड़ने का नारा उछाला था। 1960 के दशक में कांग्रेस विरोध की राजनीति ने विपक्ष को एक धरातल पर खड़ा किया। राज्यों में कई दलों की संविद सरकारें बनीं। लेकिन ये बेहद अल्पकालिक और अस्थिर साबित हुई थीं। लोहिया का सपना टूट गया। 1977 में इंदिरा गांधी सरकार की इमरजेंसी ने विपक्ष को मिलाया। चार प्रमुख पार्टियों के मेल से जनता पार्टी अस्तित्व में आई। केंद्र में उसकी सरकार भी बनी लेकिन नेताओं की महत्वाकांक्षा और अंतरविरोधों के कारण मोरारजी देसाई की जनता सरकार 28 माह में डूब गई थी। 1989 में विश्वनाथ प्रतापसिंह की जनता दल सरकार भी ज्यादा नहीं टिक पाई थी।

1970-80 और 1990 के दशक की और वर्तमान स्थितियां पूरी तरह अलग हैं। पहले सत्ता से जुड़े सवाल थे तो अब हेरफेर से चुनाव जीतने और चुनाव आयोग के गलत फैसलों की जवाबदेही तय करने के प्रश्न हैं। संवैधानिक संस्थाओं की साख फिर से कायम करने के मामले में तो विपक्षी दल एकजुट हो सकते हैं। चुनाव आयोग ने मनमाने तरीके से एसआईआर के जरिये थोक में वोटरों के नाम काटे हैं। अब तक 13 करोड़ से अधिक वोटरों के नाम कट चुके हैं। प्रक्रिया की खामियों का भंडाफोड़ होने के बाद आयोग ने अपने कई फैसले वापस लिए हैं। इनमें फार्म-6 में किए गए विवादास्पद बदलाव, ईसीआईनेट के काम की समीक्षा के लिए विशेषज्ञों की कमेटी गठित करने सहित कई फैसले शामिल हैं। दो चुनाव आयुक्तों विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने जिन मुद्दों को उठाया था। उनमें से कुछ में आयोग ने सुधार किए हैं। फिर भी, आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में कहा है कि आयोग के प्रमुख फैसले आम राय से लिए गए हैं। जबकि संधू और जोशी ने मुख्य चुनाव आयुक्त से लिखित आपत्ति जताई है कि आयोग के नाम पर उनकी जानकारी के बिना फैसले लिए गए हैं।

सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग के फैसलों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के बीच विभिन्न स्त्तरों पर आयोग के कामकाज में गड़बड़ियों के मामले सामने आ रहे हैं। यहां दो राज्यों उत्तरप्रदेश और कर्नाटक का जिक्र करते हैं। देश की सत्ता की राह तय करने वाले उत्तरप्रदेश में फरवरी, मार्च में विधानसभा चुनाव होंगे। वहां मतदाताओं की संख्या पर विरोधाभास है। राज्य में 1 मार्च 2026 को वयस्कों की अनुमानित संख्या 16.2 करोड़ थी। 2025 में एसआईआर से पहले वोटरों की संख्या 15.4 करोड़ थी। 2026 में एसआईआर के बाद 13.4 वोटर बचे। वहीं स्थानीय संस्थाओं के चुनाव में वोटरों की संख्या 16.9 करोड़ बताई गई। वोटरों की संख्या में इतना अधिक अंतर समझ में नहीं आता है। पीलीभीत और आजमगढ़ में वोटर लिस्ट में अनियमिताओं की खबरों के बीच उप्र के मुख्य चुनाव अधिकारी नवदीप रिनवा ने पूरे राज्य में फार्म- 6, फार्म- 7 और फार्म- 8 में 10 अप्रैल के बाद कंप्यूटर असिस्टेंट द्वारा की गई प्रविष्टियों का ऑडिट करने के आदेश दिए हैं। पीलीभीत में बड़ी संख्या में वोटरों के नाम काटने की खबरें आई हैं। आयोग ने पीलीभीत विधानसभा की मतदाता सूचियों में कथित अनियमितताओं के लिए दो चुनाव रजिस्ट्रेशन अधिकारियों (ईआरओ) को निलंबित कर दिया है।

कर्नाटक मेंं एसआईआर के बाद 99.32 लाख वोटरों के नाम काट दिए गए हैं। अंग्रेजी अखबार हिन्दू में प्रकाशित एक अन्य खबर के अनुसार राज्य में मतदाता सूचियों से नाम काटने के लिए 61 हजार फार्म- 7 चुनाव अधिकारियों ने दाखिल किए हैं। किसी भी आवेदन में नाम हटाने के लिए एक भी कारण नहीं बताया गया है। मतदाता पंजीयन नियम 1960 के तहत नाम हटाने का कारण बताना अनिवार्य है। 23 सितंबर 2026 को दावे और आपत्तियां दाखिल करने की समय सीमा खत्म होने के बाद फार्म-7 आवेदनों की संख्या तेजी से बढ़ी। सबसे अधिक फार्म बेंगलुरू महानगर पालिका साउथ डिस्ट्रिक्ट में दाखिल किए गए हैं। यह पता नहीं लग सका है कि नाम हटाने के आवेदनों के बाद कितने नाम मतदाता सूची से काटे गए हैं। पहली नजर में यह अनियमितता है। लेकिन अब तक इसके लिए किसी को दंडित करने की खबरें सामने नहीं आई हैं।

कर्नाटक,उत्तरप्रदेश के अलावा पश्चिम बंगाल सहित कई अन्य राज्यों से भी अनियमतताओं की खबरेें आ रही हैं। लेकिन इनके लिए संबंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने के मामले में कुछ नहीं हुआ है। कई मामलों से समूची एसआईआर प्रक्रिया में अनियमितता साबित हो चुकी है। फिर भी, इसके लिए किसी की जवाबदेही तय नहीं की गई है। चुनाव आयोग ने अपनी कई गलतियों और प्रक्रियाओं में सुधार किया है। उसने अपनी गलती स्वीकार कर ली है। फिर भी, उसके लिए कौन दोषी है। उसके खिलाफ कौन कार्रवाई करेगा। लोकतंत्र में जवाबदेही का सिद्धांत उसके स्वस्थ रहने की प्रमुख शर्त है। यहां तो कोई जवाबदेही लेने के लिए तैयार नहीं है।

सत्तारूढ़ भाजपा तो एसआईआर और थोक में वोटरों के नाम काटने को सही ठहरा रही है। गृहमंत्री अमित शाह ने कहा है कि तीन करोड़ घुसपैठिये वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं। अगर देश में इतने घुसपैठिए मौजूद हैं तो सरकार उन्हें बाहर क्यों नहीं करती है। केंद्र,असम और उत्तर पूर्व के कई राज्यों में भाजपा की सरकार है। भाजपा ने घुसपैठ को अपने हर चुनाव का मुद्दा बनाया है। इसलिए तो उसे और तेजी से घुसपैठियों को बाहर करने की कार्रवाई करनी चाहिए। क्या घुसपैठ का मुद्दा केवल चुनाव में जीवित रखने के लिए है। चुनाव आयोग के मौजूदा रुख को देखते हुए चुनाव प्रणाली के साफ-सुथरे होने की उम्मीद नहीं की जा सकती है। इसलिए विपक्षी दलों को ही जनता के बीच यह मुद्दा लेकर जाना चाहिए। कुछ माह के अभियान और राज्यों की राजधानियों, बड़े शहरों में रैलियों, प्रदर्शनों के प्रभावी होने की कोई सीमा है। वोटरों के बड़े वर्ग तक यह मुद्दा पार्टियों के कार्यकर्ता पहुंचा सकते हैं और संगठन के मामले में प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस तो बहुत कमजोर है। बाकी अन्य दलों की स्थिति बहुत मजबूत नहीं है। कम्युनिस्ट पार्टियों के पास जरूर कैडर है। लिहाजा, निचले स्तर तक विपक्षी दलों को अपने तंत्र को सक्रिय बनाना पड़ेगा। संवैधानिक संस्थाएं जनता के दबाव में सही तरीके से काम करती हैं।

Similar News