लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव और निष्पक्षता का खत्म होना

लोकसभा अध्यक्ष का पद सिर्फ बहुमत पर नहीं, बल्कि भरोसे पर चलता है। अगर विपक्ष को सुरक्षा के लिए खतरा माना जाता है, तो एक काम करने वाली विधायिका के लिए ज़रूरी 'पारस्परिक भरोसे' की बुनियाद ही खत्म हो जाती है।

By :  Deshbandhu
Update: 2026-02-13 21:40 GMT
  • टी एन अशोक

लोकसभा अध्यक्ष का पद सिर्फ बहुमत पर नहीं, बल्कि भरोसे पर चलता है। अगर विपक्ष को सुरक्षा के लिए खतरा माना जाता है, तो एक काम करने वाली विधायिका के लिए ज़रूरी 'पारस्परिक भरोसे' की बुनियाद ही खत्म हो जाती है। जब सदन दोबारा शुरू होता है, तो हथौड़ा अभी भी डेस्क पर लग सकता है, लेकिन उससे जो आवाज़ आती है वह और ज़्यादा खोखली होती जाती है।

भारत के संसद, जो लंबे समय से ज़ोरदार बहस और कभी-कभी हंगामे का मैदान रहा है, अब एक ऐसे युद्ध के मैदान में बदल गया है जहां 'निष्पक्ष अंपायर' की अवधारणा ही खतरे में है। हाल ही में लगभग 120 विपक्षी सांसदों द्वारा लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला के खिलाफ अविश्वास पेश करना सिर्फ एक प्रक्रिया से जुड़ी झड़प नहीं है, बल्कि यह एक ढांचागत दरार है। लोकसभा अध्यक्ष के इस दावे, जैसा पहले कभी नहीं हुआ,से शुरू हुए विवाद कि गुप्तचर सूचना से पता चला है कि विपक्षी सांसद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 'घेरने' की योजना बना रहे थे, स्वयं में एक ऐसी घटना है जो कार्यपालिका की सुरक्षा, विधायिका के विशेषाधिकार, और संसदीय स्वतंत्रता के क्रमबद्ध तरीके से खत्म होने के खतरनाक मेल को उजागर करती है।

इस 'संसदीय तूफान' के केन्द्र में एक ऐसा दावा है जो एक ऐसे परिकल्पित राज्य या समाज की ओर इंगित करता है जहां लोग अन्याय से पीड़ित हैं। लोकसभा अध्यक्ष बिड़ला का यह सार्वजनिक दावा कि चुने हुए प्रतिनिधियों की रुकावट डालने वाली चालों की वजह से प्रधानमंत्री का सदन से गैरहाजिर रहना ज़रूरी हो गया था, भारतीय विधायिका के इतिहास में एक अहम मोड़ है। परम्परा से लोकसभा अध्यक्ष सदन के अभिभावक होते हैं, जो कार्यपालिका के दखल से सांसदों के अधिकारों की रक्षा करते हैं। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर एक ज़रूरी बहस से प्रधानमंत्री के गैरहाजिर रहने को सही ठहराने के लिए गुप्तचर सूचना का हवाला देकर, लोकसभा अध्यक्ष ने असल में पटकथा को पलट दिया है। वह सांसदों के रक्षक से 'सरकार की ढाल' बन गए हैं।

नज़ारा कड़वा है: पीठासीन अधिकारी, जिसे सदन के अंदर आखिरी अधिकारी होना चाहिए, अब सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक बिचौलिए के तौर पर काम कर रहे हैं। इस कदम से पता चलता है कि स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप (एसपीजी) और इंटेलिजेंस ब्यूरो अब स्पीकर की कुर्सी पर एक प्रॉक्सी सीट रखते हैं। अगर प्रधानमंत्री, जो देश के सबसे ताकतवर आदमी हैं, देश के सबसे सुरक्षित भवन के अंदर लोगों के चुने हुए प्रतिनिधियों का सामना नहीं कर सकते, तो यह या तो सुरक्षा व्यवस्था की एक बड़ी नाकामी का इशारा है या एक आसान राजनीतिक पलायन की रणनीति का।

इस विवाद को और ज़्यादा ज़हरीला बनाया गुमनाम एप्सटीन फाइलों के वायरल होने ने, जिसमें विपक्ष के सांसदों को जोड़ा गया था, जो अजीब कपड़े फाड़ने की साज़िश थी। हालांकि सरकार ने इन्हें 'एआई से बनी चालें' कहकर खारिज कर दिया, लेकिन असली नुकसान संस्थागत ताने-बाने को हुआ। जब लोकसभा अध्यक्ष की आधिकारिक बातें इंटरनेट पर टांग खींचने वाले सनसनीखेज बातों जैसी होती हैं- यह इशारा करते हुए कि महिला सांसद सुरक्षा के लिए खतरा हैं- तो सदन की इज़्ज़त न सिर्फ़ कम होती है; बल्कि वह जलकर राख हो जाती है।

संसदीय विरोध को एक शारीरिक खतरे के तौर पर दिखाकर, सत्ताधारी सरकार, लोकसभा अध्यक्ष के कार्यालय के ज़रिए, विपक्ष के असली मतलब को ही गलत साबित करने की कोशिश कर रही है। लोकतंत्र में, 'घेराव', नारे लगाना और वॉकआउट उन लोगों के हथियार हैं जिन्हें वोट नहीं दिया जाता। इन पर 'कानून व्यवस्था के जोखिम' के तौर पर छाप लगाना संसद को साफ-सुथरा बनाने और इसे एक एकल संस्कृति की गूंज वाले सदन में बदलने की एक सोची-समझी चाल है, जहां कार्यपालिका को कभी असहजता महसूस न हो।

लोकसभा अध्यक्ष के कामों का तकनीकी बचाव अक्सर संविधान की चुप्पी में चला जाता है। जबकि अनुच्छेद 118 सदन को अपने नियम बनाने की इजाज़त देता है, ऐसा कोई साफ़ प्रावधान नहीं है जो लोकसभा अध्यक्ष को 'गुप्तचर सूचना' के आधार पर प्रधानमंत्री को सत्र छोड़ने की सलाह देने का अधिकार दे। यह एक अस्पष्ट संवैधानिक 'ग्रे ज़ोन' में आता है।

हालांकि, संवैधानिक नैतिकता सिर्फ़ लिखी हुई बातों के बारे में नहीं है, बल्कि जो व्यवहार में किया जाता है, उसके बारे में है। लोकसभा अध्यक्ष का अधिकार निष्पक्षता की सोच पर टिका होता है। जब उस सोच को पार्टी की सुविधा के लिए बदल दिया जाता है, तो यह पद अपना नैतिक वजन खो देता है। विपक्ष की शिकायत साफ़ है : अगर लोकसभा अध्यक्ष सार्वजनिक रूप से गुप्तचर कथा का इस्तेमाल करना शुरू कर देते हैं, तो वे रेफरी नहीं रह जाते और प्लेयर बन जाते हैं। 'कार्यपालिका से परहेज' का यह सामान्यीकरण यह पक्का करता है कि जिम्मेदारी विधायिका का मुख्य काम है, और वही सबसे पहले नुकसान में है।

कुल 120 सांसदों के समर्थन वाला यह प्रस्ताव संख्या के हिसाब से मजबूत नहीं है। भाजपा नेतृत्व वाला एनडीए आराम से 272 का आंकड़ा पार कर जाएगा, इसलिए प्रस्ताव हार जाएगा, और ओम बिड़ला पद पर बने रहेंगे। तब विपक्ष को कैसे परेशानी होगी, यह सवाल खड़ा होता है।

इसका जवाब 'भरोसे के बैरोमीटर' में है। यह प्रस्ताव टूटे हुए रिश्ते का एक औपचारिक रिकॉर्ड है। राहुल गांधी के हस्ताक्षर की रणनीतिगत गैरमौजूदगी भी- शायद टकराव को सीधे 'व्यक्तिगत' करने से बचने की एक चाल है- जो इस बात को नहीं छिपा सकती कि सदन का एक बड़ा हिस्सा अब अध्यक्ष को एक निष्पक्ष निर्णायक के तौर पर नहीं देखता। लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का इतिहास जो 1954 में जी.वी. मावलंकर से लेकर आज तक की है, एक रुझान दिखाती है: वह यह कि ये प्रस्ताव मोशन कभी भी वोट जीतने के बारे में नहीं होते; ये विश्वास के संकट को उजागर करने के बारे में होते हैं।

संसद के द्वार पर विरोध प्रदर्शन पर रोक लगाने का लोकसभा अध्यक्ष का फैसला एक 'किले जैसी विधानसभा' की छवि को और मजबूत करता है। असहमति के लिए वास्तविक जगहों को बंद करके और सांसदों के व्यवहार पर शक जताने के लिए कुर्सी का इस्तेमाल करके, मौजूदा नेतृत्व भारतीय संसदीय राजनीति के डीएनए को पूरी तरह से बदल रही है।

भाजपा का प्रति तर्क कि कांग्रेस ने पहले भी ऐसा ही बर्ताव किया था, अभी चल रही बढ़ती हुई बातों को नज़रंदाज़ करता है। अगर पिछले उदाहरण गलत थे, तो इसका हल पार्टीबाज़ी को दोगुना करना नहीं है, बल्कि उन 'ऊंचे मानकों' को फिर से स्थापित करना है जिनकी एक उभरती हुई सुपरपावर को ज़रूरत है।

2026 का अविश्वास प्रस्ताव वोटों के मामले में शायद एक धीमी आवाज़ के साथ खत्म होगा, लेकिन इसकी गूंज बहरी कर देने वाली होगी। यह वह पल था जब दुनिया की सबसे बड़े लोकतंत्र के 'रेफरी' पर न सिर्फ एक फ़ाउल मिस करने का आरोप लगा, बल्कि होम टीम की जर्सी पहनने का भी आरोप लगा।

लोकसभा अध्यक्ष का पद सिर्फ बहुमत पर नहीं, बल्कि भरोसे पर चलता है। अगर विपक्ष को सुरक्षा के लिए खतरा माना जाता है, तो एक काम करने वाली विधायिका के लिए ज़रूरी 'पारस्परिक भरोसे' की बुनियाद ही खत्म हो जाती है। जब सदन दोबारा शुरू होता है, तो हथौड़ा अभी भी डेस्क पर लग सकता है, लेकिन उससे जो आवाज़ आती है वह और ज़्यादा खोखली होती जाती है। भारत की संसद अब सिर्फ बहस का घर नहीं रही; यह शक का घर है, जहां कार्यपालिका की सुरक्षा व्यवस्था का इस्तेमाल लोगों की आवाज़ दबाने के लिए किया जाता है।

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