भारत-अमेरिका व्यापार समझौता भारत के किसानों के लिए सबसे बड़ा झटका साबित होगा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सरकार में उनके मंत्री और वफादार विशेषज्ञों को जनता को यह समझाने में बहुत दिक्कत हो रही है कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौते से भारत को क्या-क्या बड़े फायदे हो रहे हैं
- नित्य चक्रवर्ती
मैं यहां एक व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित किस्सा बताना चाहता हूं जो यह समझाने में मदद करेगा कि अमेरिकी कृषिलॉबी अपनी सरकार और वैश्विक कृषि व्यापार पर कितना ज़्यादा असर डालती है। दिसंबर 1999 मेंमैं भारत सरकार के मीडिया प्रतिनिधिमंडल के हिस्से के तौर पर अमेरिका के सिएटल में 30 नवंबर से 3 दिसंबर तक विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) की मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में शामिल हुआ था। उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन थे और उन्होंने सम्मेलन में यूरोपीय यूनियन के देशों से सब्सिडी पूरी तरह खत्म करने की मांग की थी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सरकार में उनके मंत्री और वफादार विशेषज्ञों को जनता को यह समझाने में बहुत दिक्कत हो रही है कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौते से भारत को क्या-क्या बड़े फायदे हो रहे हैं, खासकर कृषिक्षेत्र को, जो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के खास लक्षित क्षेत्रों में से एक है।
वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल एक बड़े विदूषक की तरह काम कर रहे हैं क्योंकि वे रोज़ाना मीडिया को दिए जाने वाले अपने प्रायोजित साक्षात्कारों में कह रहे हैं कि हमारे प्रधानमंत्री ने अड़ियल डोनाल्ड ट्रंप से ज़्यादा से ज़्यादा फायदे निकालने में बहुत अच्छा काम किया है। वे यह सब तब कह रहे हैं जब पूरे समझौते की बारीकियां इस साल मार्च के बीच तक ही पता चलेंगी और ट्रंप पहले ही कह चुके हैं कि अगर वे किसी भी समय इससे संतुष्ट नहीं होंगे तो अमेरिका को कभी भी बदलाव करने का हक है। यह ट्रंप के पहले के बयान 'मैं कानून हूं, मैं तय करता हूं कि क्या सही है और क्या गलत' जैसा ही है।
मैं यहां एक व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित किस्सा बताना चाहता हूं जो यह समझाने में मदद करेगा कि अमेरिकी कृषिलॉबी अपनी सरकार और वैश्विक कृषि व्यापार पर कितना ज़्यादा असर डालती है। दिसंबर 1999 मेंमैं भारत सरकार के मीडिया प्रतिनिधिमंडल के हिस्से के तौर पर अमेरिका के सिएटल में 30 नवंबर से 3 दिसंबर तक विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) की मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में शामिल हुआ था। उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन थे और उन्होंने सम्मेलन में यूरोपीय यूनियन के देशों से सब्सिडी पूरी तरह खत्म करने की मांग की थी। इसके उलट, यूरोपीय यूनियन ने मांग की थी कि अमेरिका अपनी कृषि सब्सिडी कम करे क्योंकि यह रकम अमेरिका के बजट का 50 प्रतिशत थी और 1999 में कुल अमेरिकी कृषि सब्सिडी वैश्विक कृषि सब्सिडी की कुल रकम का 85 प्रतिशत थी।
दोनों विरोधी पक्ष किसी समझौते पर नहीं पहुंच पाए और आखिर में डब्ल्यूटीओ सम्मेलन बिना किसी संयुक्त घोषणापत्र जारी हुए ही खत्म हो गई। मैंने अपने अमेरिकी पत्रकार दोस्त से पूछा कि अमेरिका अपनी सारी सब्सिडी बनाए रखने पर इतना अड़ा क्यों है? मेरे दोस्त ने जवाब दिया — अगला राष्ट्रपति चुनाव नवंबर 2000 में होने है। क्लिंटन ने कृषिलॉबी से वायदा किया है कि वह यूरोपीय यूनियन को अपनी सब्सिडी कम करने के लिए मजबूर करेंगे। लेकिन क्योंकि वह फेल हो गए, इसलिए 2000 के चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी पर इसका बुरा असर पड़ेगा। ठीक वैसा ही हुआ। रिपब्लिकन पार्टी ने अमेरिका के बड़े किसान समुदाय के बीच प्रचार अभियान चलाया कि क्लिंटन ने यूरोपीय यूनियन के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है और किसान हार रहे हैं। डेमोक्रेट्स नवंबर 2000 का चुनाव हार गए, जूनियर जॉर्ज बुश रिपब्लिकन पार्टी से नए राष्ट्रपति चुने गए।
ठीक 26 साल बाद, आज अमेरिका में स्थिति बहुत अलग नहीं है। राष्ट्रपति ट्रंप इस साल नवंबर में अपने मध्यावधि चुनाव का सामना कर रहे हैं। उनके लिए संकेत उतने अच्छे नहीं हैं। उन्हें अपनी नीति जारी रखने के लिए जीतना बहुत ज़रूरी है। मध्यावधि चुनाव में हार का मतलब है उनकी शक्ति पर बड़ी रोक, हालांकि वह दो और साल राष्ट्रपति बने रहेंगे। अमेरिका के किसान अमेरिका में किसी भी राजनीतिक पार्टी का सबसे बड़ा मतदाता आधार हैं। 2024 में, अमेरिका के किसानों को सरकारी भुगतान से 9.3 अरब डालर की सब्सिडी मिली, लेकिन ट्रंप के पहले साल में, यह 2025 में चार गुना से भी ज़्यादा बढ़कर 42.4 अरब डालर हो गई। कितनी बड़ी छलांग है यह?
अब इन भारी सब्सिडी के साथ, अमेरिकी किसान भारत में कृषि उत्पादनों के बढ़ते बाजार में उतरेंगे और भारतीय प्रतिस्पर्धियों को बाहर करने के लिए घरेलू बाजार को सस्ते सामान से भर देंगे। पीयूष गोयल अमेरिकी उत्पादकों को बड़े बाजार में प्रवेश दिलाने के बाद भारतीय किसानों के हितों की रक्षा करने की बात कर रहे हैं। यह पूरी तरह बकवास है। यह एक अमीर अमेरिकी शार्क और एक बेचारे भारतीय उत्पादक को एक ही मैदान में उतारकर बराबरी का मौका देने जैसा है। जैसा कि कुछ लैटिन अमेरिकी देशों में हुआ, अमेरिकी उत्पादक पहले चरण में सस्ता सामान देकर उपभोक्ताओं के चेहरे पर मुस्कान लाएंगे। फिर जब स्थानीय लोग बाहर हो जाएंगे, तो अमेरिकी उत्पादक कीमतें बढ़ा देंगे क्योंकि तबतक दूसरा विकल्प खत्म हो गया होगा। भारत में, हालात शायद इतने बुरे न हों, लेकिन गरीब और मध्यवर्गीय किसानों पर इसका असर पड़ेगा।
मंगलवार को व्हाइट हाउस ने भारत-अमेरिका समझौते पर जो तथ्य (फैक्ट शीट) जारी किये हैं, उसे बाद में थोड़ा बदला गया, लेकिन इससे समझौता का मुख्य केन्द्र नहीं बदला, जो पूरी तरह से अमेरिका के पक्ष में है और जिसके तहत भारत ट्रंप को जब चाहे समझौते के व्यापक विवरण में छेड़छाड़ करने का हक देता है। अगर यह रणनीतिगत स्वायत्तता का आत्मसमर्पण नहीं है, तो और क्या है? जैसा कि इस लेखक ने पहले एक अन्य आलेख में बताया था, ट्रंप-मोदी समझौता भू राजनीति पर, खासकर चीन से सुरक्षा खतरे से जुड़े मामलों में साझेदारी का हिस्सा है। ऐसा लगता है कि प्रधान मंत्री को अमेरिका की एशिया-प्रशांत सामरिक रणनीति चुनने के लिए मजबूर किया गया है।
इस तरह, संसद में विपक्ष के नेता राहुल गांधी गलत नहीं हैं जब वे प्रधान मंत्री पर भारत के 1.4 अरब लोगों के हितों का समर्पण करने का इल्ज़ाम लगाते हैं। हमारे प्रधान मंत्री के पास वैश्विक दक्षिण के असली नेता के तौर पर उभरने का एक बड़ा मौका था। बदकिस्मती से भारत राष्ट, के नेता के रूप में वह चूक गए हैं और अब फिर से राष्ट्रीय हितों की कीमत पर ट्रंप को लुभाने के पुराने रास्ते पर चल रहे हैं?