मोदी जी, कृपया कभी तो प्रधानमंत्री की तरह बोलिए

नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बने 12 साल पूरे होने जा रहे हैं, लेकिन इतने वर्षों के दौरान का उनका एक भी ऐसा भाषण याद नहीं आता जो उन्होंने इस विशाल देश के प्रधानमंत्री की तरह दिया हो।

Update: 2026-02-10 21:50 GMT

अनिल जैन

राज्यसभा में उन्होंने धन्यवाद प्रस्ताव पर हुई बहस का जवाब देते हुए जो भाषण दिया, उसमें भी न तो न्यूनतम संसदीय मर्यादा और शालीनता का समावेश था और न ही पद की गरिमा व लोकतांत्रिक परंपरा की कोई झलक थी। स्थापित संसदीय परंपरा यह है कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बहस का समापन करते हुए प्रधानमंत्री राष्ट्रपति के अभिभाषण में उल्लेखित मुद्दों पर अपनी सरकार का नज़रिया पेश करते हैं।

नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बने 12 साल पूरे होने जा रहे हैं, लेकिन इतने वर्षों के दौरान का उनका एक भी ऐसा भाषण याद नहीं आता जो उन्होंने इस विशाल देश के प्रधानमंत्री की तरह दिया हो। अधूरा सच, सफ़ेद झूठ, आधी-अधूरी जानकारी के आधार पर गलत बयानी, तथ्यों की मनमाने ढंग से तोड़-मरोड़, परनिंदा, पूर्व प्रधानमंत्रियों के प्रति हिकारत का भाव, नए-नए शिगू$फे, स्तरहीन मुहावरे, राजनीतिक विरोधियों पर छिछले कटाक्ष, नफ़रत भरी सांप्रदायिक तल्खी, धार्मिक व सांप्रदायिक प्रतीकों का इस्तेमाल और भरपूर आत्म प्रशंसा! यही सब प्रमुख तत्व होते हैं प्रधानमंत्री मोदी के भाषण में। मौका चाहे देश में हो या विदेश में, संसद में हो या किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर, चुनावी रैली हो या कोई और अवसर- हर जगह उनके भाषण में अहंकारयुक्त हाव-भाव के साथ यही सारे तत्व हावी रहते हैं। पिछले सप्ताह गुरूवार (5 फरवरी) को राज्यसभा में दिया गया भाषण भी इसका अपवाद नहीं रहा।

वैसे तो मोदी को संसद के दोनों ही सदनों में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर हुई बहस का जवाब देना था, लेकिन लोकसभा में 4 फरवरी को उन्होंने भाषण नहीं दिया। ऐसा उन्होंने 'लोकसभा स्पीकर के कहने पर' किया। स्पीकर ओम बिड़ला ने बेहद हास्यास्पद और शर्मनाक 'आशंका' जताई थी कि प्रधानमंत्री अगर सदन में भाषण देने आएंगे तो कांग्रेस की कुछ महिला सांसद उन पर हमला कर सकती हैं। स्पीकर की इस आशंका से वह प्रधानमंत्री डरकर सदन में नहीं आए, जिसने तीन साल पहले 10 फरवरी, 2023 को संसद में ही अपनी पीठ थपथपाते हुए बेहद फूहड़ अंदाज़ में कहा था, 'देश देख रहा है कि एक अकेला कितनों पर भारी पड़ रहा है।'

बहरहाल राज्यसभा में उन्होंने धन्यवाद प्रस्ताव पर हुई बहस का जवाब देते हुए जो भाषण दिया, उसमें भी न तो न्यूनतम संसदीय मर्यादा और शालीनता का समावेश था और न ही पद की गरिमा व लोकतांत्रिक परंपरा की कोई झलक थी। स्थापित संसदीय परंपरा यह है कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बहस का समापन करते हुए प्रधानमंत्री राष्ट्रपति के अभिभाषण में उल्लेखित मुद्दों पर अपनी सरकार का नज़रिया पेश करते हैं। इसी क्रम में वे बहस के दौरान विपक्ष के आरोपों और आलोचनाओं का भी जवाब देते हैं। मोदी ने बतौर प्रधानमंत्री ऐसा कुछ नहीं किया। अपने स्वभाव के अनुरूप उन्होंने इस गंभीर मौके पर भी एक मोहल्ला स्तर के नेता की तरह चुनावी भाषण दिया।

कुछ साल पहले फिल्म अभिनेत्री कंगना रनौत ने एक टीवी इंटरव्यू में कहा था कि 'देश को असली आजादी तो 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद ही मिली है।' कंगना की इस बात पर खुश होकर मोदी ने उन्हें सांसद बनवा दिया और गुरूवार को राज्यसभा में कंगना द्वारा कही बात की तज़र् पर ही यह जताने की कोशिश की कि देश ने जो कुछ तरक्की की है, वह उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद की ही है। उन्होंने कहा कि उनसे पहले जितने प्रधानमंत्री हुए उनमें किसी के पास देश को लेकर न तो कोई सोच थी, न कोई दृष्टि और न ही इच्छाशक्ति। उन्होंने देश को बर्बाद करके रखा हुआ था। उन्होंने कहा, 'मैं देशवासियों का आभारी हूं कि उन्होंने हमें सेवा का अवसर दिया।

हमारी काफी शक्ति उनकी (पूर्व प्रधानमंत्रियों की) गलतियों को ठीक करने में लग रही है। उनके समय जो देश की छवि बनी थी, उसे धोने में मेरी ताकत लग रही है।'

देश के पहले पीएम जवाहरलाल नेहरू की आलोचना व निंदा करने का तो मोदी पर मानो जुनून सवार रहता है और इस सिलसिले में जो मुंह में आता है वह बोल जाते हैं। ऐसा करने में वे इस बात की भी परवाह नहीं करते कि उनकी अशोभनीय गलतबयानी से देश-दुनिया में उनकी खिल्ली उड़ेगी और लोग उनकी पढ़ाई-लिखाई व उनकी मानसिक स्थिति पर सवाल उठाएंगे। राज्यसभा में दिए अपने भाषण में भी मोदी ऐसा करना नहीं भूले। इस सिलसिले में उन्होंने इंदिरा गांधी के ईरान में दिए गए एक भाषण के हवाले से कहा कि, 'जवाहरलाल नेहरू के समय देश की जनसंख्या 35 करोड़ थी और नेहरू कहते थे कि मेरे सामने 35 करोड़ समस्याएं हैं।' इसी तरह इंदिरा गांधी के समय देश की जनसंख्या 57 करोड़ थी और इंदिरा जी ने कहा था कि, 'मेरे सामने 57 करोड़ समस्याएं हैं।' मोदी का यह बताना या तो उनकी क्षुद्रता का परिचायक है या फिर उनकी नासमझी का। यह उनके भाषण के नोट्स बनाने वाले नौकरशाहों की शरारत भी हो सकती है कि उन्होंने मोदी को गलत नोट्स बनाकर थमा दिए हों जिन्हें मोदी ने संसद में पढ़ दिए। दरअसल नेहरू से जब किसी विदेशी पत्रकार ने पूछा था कि 'आपके सामने कितनी समस्याएं हैं', तो नेहरू ने कहा था कि देश के 35 करोड़ लोगों की समस्याएं मेरी समस्या है; और इसी तरह इंदिरा गांधी ने कहा था कि देश के 57 करोड़ लोगों की समस्याओं को मैं अपनी समस्या मानती हूं।

प्रधानमंत्री अपने भाषण का स्तर गिराने में यहीं नहीं ठहरे। इससे भी नीचे उतरते हुए उन्होंने कहा कि 'चोरी करना नेहरू-गांधी परिवार का पुश्तैनी धंधा है, जिन्होंने एक गुजराती महात्मा गांधी का सरनेम तक चुरा लिया।' वैसे अव्वल तो कोई क्या सरनेम लगाता है, यह बहस का विषय नहीं हो सकता और संसद में तो कतई नहीं, फिर भी अगर मोदी को इसका शौक है तो उन्हें इस बारे में बोलने से पहले यह जान लेना चाहिए कि गांधी सरनेम किसी जाति या संप्रदाय विशेष में नहीं होता है बल्कि यह इत्र-फुलेल से जुड़े व्यवसाय से ताल्लुक रखता है। यह सरनेम सिर्फ वैश्य वर्ग में ही नहीं बल्कि मुस्लिम, सिख, पारसी आदि समुदायों में भी होता है।

मोदी ने यह सिलसिला सिर्फ चुनावी सभाओं तक ही सीमित नहीं रखा है। संसद में, संसद के बाहर विभिन्न मंचों पर और यहां तक कि विदेशों में भी वे विपक्षी नेताओं पर निजी हमले और अपमानजनक बातें करने से नहीं चूकते हैं। फिर, विपक्ष शासित राज्यों के प्रति उनकी सरकार के भेदभावपूर्ण व्यवहार ने भी केंद्र और राज्यों के बीच खटास पैदा कर दी है।

दरअसल विरोधी दलों और उनके नेताओं के प्रति मोदी की अपमानजनक बातें शुरू में जरूर अटपटी लगती थीं। चूंकि भाजपा और मोदी ने काफी बड़ी जीत हासिल की थी, इसलिए विपक्षी नेताओं ने उनकी ऐसी बातों को यह सोचकर बर्दाश्त किया कि जीत की खुमारी उतर जाने पर प्रधानमंत्री राजनीतिक विमर्श में सामान्य राजनीतिक शिष्टाचार और भाषायी शालीनता का पालन करने लगेंगे। जब ऐसा नहीं हुआ और लगने लगा कि यही मोदी की स्वाभाविक राजनीतिक शैली है और वे बदलने वाले नहीं हैं, तब विपक्षी नेताओं के सब्र का बांध टूटा और उसमें सारी राजनीतिक शालीनता और मर्यादा बहती चली गई।

देश में शायद ही कोई ऐसा विपक्षी मुख्यमंत्री या नेता होगा जिसके लिए पीएम ने सार्वजनिक रूप से अपमानजनक बातें या गाली-गलौज नहीं की होगी। मोदी उन्हें भ्रष्ट, परिवारवादी, लुटेरा, नक्सली, आतंकवादियों का समर्थक और देशद्रोही तक करार देने में कोई संकोच नहीं करते। इस सिलसिले में वे विपक्ष की महिला नेताओं को भी नहीं ब$ख्शते। वे उनके लिए बेहद अभद्र शब्दों का इस्तेमाल करते रहते हैं। विपक्षी नेताओं के प्रति मोदी के अपमानजनक बर्ताव का ही नतीजा है कि आज केन्द्र-राज्य संबंध किसी भी समय के मुकाबले सबसे बदतर स्थिति में हैं। हाल के वर्षों में ऐसे कई मौके आए हैं जब मोदी किसी विपक्ष शासित राज्य के दौरे पर गए तब वहां के मुख्यमंत्री उनकी आगवानी करने नहीं पहुंचे।

प्रधानमंत्री ने तमाम विपक्षी दलों को अपने, अपनी पार्टी और देश के दुश्मन के तौर पर प्रचारित करते हुए उन्हें खत्म करने का खुला ऐलान किया है। वे हर जगह डबल इंजन की सरकार का ऐसा प्रचार करते हैं, जैसे विपक्ष की सारी सरकारें जनविरोधी, देश-विरोधी और विकास-विरोधी हैं। मोदी की इस राजनीति ने विपक्षी पार्टियों को सोचने पर मजबूर किया है। इसलिए आज अगर प्रधानमंत्री पद की गरिमा पर आंच आ रही है और उनकी बेअदबी हो रही है तो इसके लिए प्रधानमंत्री का अंदाज़-ए-हुकूमत और अंदाज-ए-सियासत ही जिम्मेदार है।

कितना अच्छा होता कि मोदी भाषा और संवाद के मामले में भी उतने ही नफासत पसंद या सुरुचिपूर्ण होते, जितने वे पहनने-ओढ़ने और सजने-संवरने के मामले में हैं। एक देश अपने प्रधानमंत्री से इतनी सामान्य और जायज अपेक्षा तो रख ही सकता है। उनका बाकी अंदाज-ए-हुकूमत चाहे जैसा भी हो।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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