जो उचित है वही करो
नरेन्द्र मोदी सरकार में संसद सत्र के सुचारू रूप से न चलने के लिए विपक्ष को कई तरह से जिम्मेदार ठहराया जाता है
- सर्वमित्रा सुरजन
मंगलवार को सरकार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए नियम बनाए कि एआई-जनित सामग्री पर स्पष्ट रूप से लेबल (वाटरमार्क) लगाएं। ऐसी सामग्री में पहचान के लिए संकेत जरूर होने चाहिए। सरकार ने कहा कि एक बार एआई लेबल या मेटा डाटा लगाने के बाद उसे हटाया या दबाया नहीं जा सकता।
नरेन्द्र मोदी सरकार में संसद सत्र के सुचारू रूप से न चलने के लिए विपक्ष को कई तरह से जिम्मेदार ठहराया जाता है। कभी सदन में हंगामा करने, कभी संसदीय परंपराओं का पालन न करने या मुद्दों से भटकाने के आरोप कई बार विपक्षी सांसदों पर लगाए गए और उन्हें निलंबित भी किया गया। मोदी सरकार के पिछले कार्यकाल में ही कम से कम सौ सांसदों के निलंबन का रिकार्ड बना है। लेकिन अब केंद्रीय संसदीय मामलों के मंत्री किरण रिजीजू ने एक बेहद गंभीर आरोप कांग्रेस सांसदों पर लगाया है। श्री रिजीजू का कहना है कि 'कम से कम 20-25 कांग्रेस सांसद लोकसभा अध्यक्ष के कक्ष में घुस गए और उनके साथ गाली-गलौज की। जी हां, यही शब्द किरण रिजीजू ने इस्तेमाल किए। उनका कहना है कि मैं भी वहीं था और जो गालियां कांग्रेस सांसदों ने दी, वो मैं बता भी नहीं सकता। श्री रिजीजू ने यह भी कहा कि लोकसभा अध्यक्ष इससे बहुत आहत हैं। वे बहुत नरम इंसान हैं, नहीं तो सख्त कार्रवाई की जाती। इसके बाद किरण रिजीजू ने यह भी कहा कि हमारे कोई सांसद ऐसा व्यवहार करते तो हम उन्हें रोकते, लेकिन उस वक्त प्रियंका गांधी और केसी वेणुगोपाल समेत कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भी अंदर मौजूद थे, और वे उन्हें लड़ने के लिए उकसा रहे थे।'
पाठक जानते हैं कि पिछले बुधवार ओम बिड़ला ने आरोप लगाया था कि कांग्रेस की महिला सांसद लोकसभा में प्रधानमंत्री के बैठने की जगह को घेरे हुई थीं और वो उन पर हमला करने की तैयारी में थीं, इसलिए प्रधानमंत्री को लोकसभा में आने से मना किया गया। अब ये नया आरोप कांग्रेस सांसदों पर लगा है कि उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष के साथ ही दुर्व्यवहार किया। अगर इन आरोपों में सच्चाई है तो फिर भाजपा सरकार या ओम बिड़ला किस बात का इंतजार कर रहे हैं, अब तक कोई कठोर कार्रवाई क्यों नहीं की गई। क्या लोकसभा अध्यक्ष के कमरे में सीसीटीवी नहीं लगा है, जहां सब कुछ देखा जा सके। ओम बिड़ला को कांग्रेस सांसदों ने कथित तौर पर जो गालियां दीं, उस घटना को देश ने अब तक न देखा न सुना है। लेकिन संसद के भीतर जब भाजपा के तत्कालीन सांसद रमेश बिधूड़ी ने बसपा के तत्कालीन सांसद दानिश अली को अपशब्द कहे थे, उसे लोकसभा अध्यक्ष समेत पूरे देश ने देखा और सुना था। तब बिड़ला साहब आहत होने से कैसे चूक गए, इसका जवाब उन्हें देना चाहिए। जहां तक सवाल उनके नरम इंसान होने का है, तो वह व्यक्तिगत तौर पर चाहे जैसे हों, लेकिन लोकसभा अध्यक्ष की आसंदी पर केवल निष्पक्ष होने की जरूरत है, जो अक्सर वे नजर नहीं आते हैं। किरण रिजीजू ने लोकसभा अध्यक्ष के बचाव में यह भी कहा कि उन्होंने एक नियम बताया, जिसका पालन नहीं हुआ और फिर राहुल गांधी ने कहा कि उन्हें बोलने के लिए किसी की अनुमति की ज़रूरत नहीं है। वह अपनी मज़ीर् से बोलेंगे, बिना किसी नियम के...जबकि यह आधा सच है। राहुल गांधी ने सदन में कहा था कि आप यह नहीं कह सकते कि आपको बोलने की इजाज़त दी जा रही है। विपक्ष का नेता होने के नाते यह मेरा हक है। इसमें राहुल गांधी ने आसंदी की अवहेलना नहीं की थी, केवल निर्वाचित सांसद का अधिकार बताया था।
दरअसल पूरी मोदी सरकार इस समय बुरी तरह घिरी हुई है। अमेरिका से व्यापार सौदे का सच और एपस्टीन मामले में नाम उछलने के बाद जनता के सामने अपनी छवि बचाने की कोशिश भाजपा कर रही है और इसके लिए उसे यही तरीका समझ आ रहा है कि किसी भी तरह कांग्रेस की लकीर छोटी की जाए। इसलिए कभी प्रधानमंत्री पर हमले की साजिश, कभी लोकसभा अध्यक्ष को गालियों के आरोप लगाए जा रहे हैं। इधर मनोज नरवणे की किताब का सच भी सरकार सामने नहीं आने देना चाहती। इसलिए प्रकाशक से कहलवा दिया गया कि किताब प्रकाशित ही नहीं हुई है। मनोज नरवणे ने भी इसकी पुष्टि कर दी है। हालांकि श्री नरवणे को कायदे से यह बताना चाहिए कि जो कुछ राहुल गांधी ने उनके हवाले से कहा है, वो सही है या नहीं। अगर राहुल गांधी गलत हैं, तो फिर श्री नरवणे ने अब तक उन पर कुछ क्यों नहीं कहा, ये बड़ा सवाल है। वैसे राहुल गांधी संसद परिसर में फोर स्टार्स इन ए डेस्टिनी किताब ले आए, तो जवाब देने के लिए केन्द्रीय कपड़ा मंत्री गिरिराज सिंह नेहरूजी के कुछ पोस्टर्स ले कर आए। लेकिन उसमें भी भाजपा फंस गई।
मंगलवार को सरकार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए नियम बनाए कि एआई-जनित सामग्री पर स्पष्ट रूप से लेबल (वाटरमार्क) लगाएं। ऐसी सामग्री में पहचान के लिए संकेत जरूर होने चाहिए। सरकार ने कहा कि एक बार एआई लेबल या मेटा डाटा लगाने के बाद उसे हटाया या दबाया नहीं जा सकता। लेकिन सरकार के बनाए नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए गिरिराज सिंह एआई से बनाए गए पोस्टर्स ले आए। संघ और भाजपा ने नेहरूजी में कमियां ढूंढने की कोशिश में हताश होकर उनके चरित्र हनन का ही तरीका अपनाया है। नेहरूजी के कपड़े पेरिस धुलने जाते थे से लेकर उनके कितनी महिलाओं से संबंध थे और लेडी माउंटबेटन से उनका प्रेम प्रसंग था, जैसे ढेरों ऊटपटांग किस्से पहले पोस्टकार्डों पर और फिर सोशल मीडिया पर घूमते हैं। अब गिरिराज सिंह बाकायदा उन झूठों का पोस्टर छपवाकर ले आए। संसद परिसर में उन्होंने कम से कम पांच पोस्टर पत्रकारों को दिखाए। पहला पोस्टर ए आई से बना है, जिसमें नेहरू और लेडी माउंटबेटन को गलबहियां करते दिखाया गया है। इसमें पीछे राष्ट्रपति भवन दिख रहा है। जाहिर है बीच सड़क पर इस तरह की क्लोज फोटो उस समय तो नहीं खींची गई होगी, लेकिन इसे गिरिराज सिंह ने दिखाया है। दूसरे पोस्टर में तीन फोटो हैं, पहली तस्वीर नेहरूजी के साथ उनकी बहन विजयलक्ष्मी पंडित की है। यह तस्वीर अमेरिका की है। इसी पोस्टर में दूसरी तस्वीर भी विजयलक्ष्मी पंडित के साथ है, जो रूस में खींची गई है और इस पोस्टर की तीसरी फोटो में नेहरू विजयलक्ष्मी पंडित की बेटी मतलब अपनी भांजी नयनतारा सहगल के साथ लंदन में हैं। अब भाजपा नेता बताएं कि बहन और भांजी के साथ फोटो खिंचवाने में क्या गलत है। तीसरा पोस्टर फिर एआई से बना है और इसमें पहले पोस्टर की ही तस्वीर है। इस पर लिखा है अंग्रेज की बाहों में नेहरू का सरेंडर। चौथा पोस्टर फिर कश्मीर का सरेंडर के साथ लिखा हुआ है। इसमें दिखाई गई महिला के लिए लेडी माउंटबेटन लिखा है, हालांकि वे तत्कालीन ब्रिटिश डिप्टी हाईकमिश्नर की पत्नी श्रीमती सिमॉन हैं।
इन तमाम पोस्टर्स में जिस तरह सरेंडर शब्द लिखा गया है, उसमें भी भाजपा घिर गई है, क्योंकि यही शब्द राहुल गांधी नरेन्द्र मोदी के लिए इस्तेमाल करते हैं। भाजपा ने इसे इस्तेमाल कर कहीं न कहीं राहुल गांधी की बात पर मुहर ही लगाई है। बहरहाल, नेहरूजी पर बोला गया झूठ फौरन पकड़ाई में आ गया और ऐसा पहले भी कई बार हो चुका है। भाजपा को लगता है कि जनता उसकी कही हर बात पर पहले की तरह यकीन कर लेगी, तो ऐसा अब नहीं है। क्योंकि सोशल मीडिया का जो हथियार उसके पास है, वह कांग्रेस समेत तमाम विपक्ष के पास भी है। वैसे भी जनता रोजाना के ऐसे छिछले-उथले आरोपों की राजनीति से तंग आ चुकी है। उसे असल प्रश्नों के असल जवाब चाहिए। राहुल गांधी और समूचा विपक्ष इन्हीं सवालों को संसद में उठाने की लगातार कोशिश कर रहा है। लेकिन भाजपा नेहरू जी से आगे बढ़ ही नहीं पा रही है। निशिकांत दुबे और गिरिराज सिंह जैसे नेता तो इस तरह फिर भी कुछ सुर्खियां बटोर रहे हैं, लेकिन नरेन्द्र मोदी को नुकसान भी पहुंचा रहे हैं। बेहतर होगा कि मोदीजी अपनी इन छिद्रों वाली ढालों को परे करें और असली हिम्मत का परिचय देकर विपक्ष के उठाए सवालों के जवाब दें। जो उचित समझो वो करो, इस तरह का टालमटोल वाला रवैया देश के प्रधानमंत्री को नहीं अपनाना चाहिए। उचित क्या है, इसे समझाते हुए उन्हें जिम्मेदारी के साथ काम करना चाहिए। यानी जो उचित है वही करना चाहिए।