2029 को लेकर अभी से डरे हुए हैं मोदी
कांग्रेस की ओर से पार्टी के संचार विभाग के प्रभारी महासचिव जयराम रमेश ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके परिसीमन के प्रस्ताव पर सवाल उठाया।
अनिल जैन
कांग्रेस की ओर से पार्टी के संचार विभाग के प्रभारी महासचिव जयराम रमेश ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके परिसीमन के प्रस्ताव पर सवाल उठाया। रमेश ने कहा कि महिला आरक्षण और परिसीमन का मामला व्यापक रूप से ध्यान भटकाने की योजना का हिस्सा है। रमेश ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि कैसे सरकार कह रही है कि परिसीमन के बाद उत्तर भारत के राज्यों का दबदबा नहीं बढ़ेगा और दक्षिण के राज्यों का असर कम नहीं होगा?
लोकसभा चुनाव- 2024 के नतीजों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी पार्टी का आत्मविश्वास बुरी तरह हिला रखा है। यद्यपि चुनाव आयोग बिल्कुल उनके मनमाफिक काम कर रहा है और ऐसा करते हुए वह निष्पक्ष रहना तो दूर, निष्पक्ष होने का दिखावा तक नहीं कर रहा है। उसकी तमाम असंवैधानिक और अनैतिक कारगुजारियों को न्यायपालिका का भी पूरा-पूरा संरक्षण मिला हुआ है। कॉरपोरेट नियंत्रित मीडिया भी पूरी तरह से सरकार और भाजपा के प्रचार तंत्र का हिस्सा बना हुआ है। इसी सबके चलते भाजपा ने 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली और बिहार के विधानसभा चुनाव में अप्रत्याशित जीतें हासिल की हैं। इसके बावजूद 2029 के लोकसभा चुनाव को लेकर मोदी बेहद डरे हुए हैं। उनका यह डर लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण 2029 से ही लागू कराने और 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन कराने को लेकर उनकी हड़बड़ी में साफ देखा जा सकता है।
दरअसल तमाम मोर्चों पर अपनी सरकार की नाकामियों के बावजूद 2019 के लोकसभा चुनाव और उसके बाद हुए कई विधानसभा चुनावों में भाजपा की जीत ने मोदी में इतना आत्मविश्वास भर दिया था कि उन्होंने 2024 के चुनाव में 'अबकी बार 400 पार' का नारा दे दिया था। वे मानकर चल रहे थे उन्हें 400 सीटों का बहुमत मिल ही जाएगा। उनके इसी आत्मविश्वास के बूते वे खुद तो नहीं लेकिन उनकी पार्टी के दूसरे कई वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री खुलेआम संविधान बदलने और भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करने की बातें करने लगे थे, जिसे मोदी भी नकार नहीं रहे थे। मगर उनकी तमाम तिकड़मों और चुनाव आयोग द्वारा की गई गड़बड़ियों के बावजूद चुनावी परिणाम उनकी उम्मीदों के विपरीत आए।
लोकसभा चुनाव 2014 में मिली 282 और 2019 में मिली 303 सीटों के मुकाबले 2024 में भाजपा जैसे-तैसे 240 सीटें ही जीतने में कामयाब रही। यानी बहुमत से बहुत दूर। मोदी खुद वाराणसी में जैसे-तैसे जीत पाए। करीब दो दर्जन पार्टियों के बने उनके गठबंधन (एनडीए) को भी कुल मिलाकर 292 सीटें ही हासिल हो सकीं, जो कि स्पष्ट बहुमत के आंकड़े से महज 20 सीटें अधिक रहीं। कुल मिला कर जैसे-तैसे सरकार चलाने लायक बहुमत मिला। ऐसे में संविधान बदलने या उसमें कोई भी मनमाना संशोधन करने का उनका मंसूबा धरा रह गया। बस, यही स्थिति मोदी के लिए भविष्य में होने वाले चुनावों और खास कर 2029 के लोकसभा चुनाव को लेकर चिंता का सबब बन गई। यही नहीं, उन्हें विभाजनकारी और धार्मिक नारों की सीमाएं भी समझ में आ गईं कि अब इनका और ज्यादा दोहन नहीं किया जा सकता।
कई छोटे-छोटे दलों के समर्थन रूपी बैसाखियों के सहारे तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद मोदी ने भविष्य में होने वाले चुनावों को जीतने की योजना पर काम करना शुरू किया। इस योजना के तहत चुनाव से ठीक पहले कल्याणकारी योजनाओं के नाम पर मतदाताओं के खाते में सरकारी खजाने से नकद राशि ट्रांसफर करने की योजनाएं घोषित हुईं और जिनकी किस्तें चुनाव के दौरान जारी हुईं। ऐसा करना आदर्श चुनाव आचार संहिता के सरासर खिलाफ था, लेकिन चुनाव आयोग मूकदर्शक बना रहा। इस योजना को हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई लेकिन न्यायपालिका ने भी इस अनैतिक हथकंडे पर रोक लगाने से इंकार कर दिया। इसके अलावा महाराष्ट्र और हरियाणा में मतदान और मतगणना में भी चुनाव आयोग ने बड़े पैमाने पर गड़बड़ियों को अंजाम देकर भाजपा की जीत का रास्ता साफ किया था।
महाराष्ट्र और हरियाणा का चुनाव जीतने के बाद मतदाताओं के खाते में नकद राशि ट्रांसफर करने की योजना बिहार में भी लागू की गई। इसके अलावा चुनाव आयोग के माध्यम से मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के नाम पर जीत सुनिश्चित करने वाली एक नई योजना भी शुरू की गई, जिसकी शुरुआत दिल्ली से हुई और बाद में बिहार में भी लागू की गई। दोनों राज्यों में चुनाव आयोग ने एसआईआर के बहाने मनमाने तरीके से लोगों के नाम मतदाता सूचियों से हटाए, जिससे दोनों राज्यों में भाजपा और उसके गठबंधन को आसानी से जीत हासिल हो गई। बिहार और दिल्ली में कामयाबी के बाद एसआईआर के हथियार को अभी हो रहे चुनाव वाले राज्यों- तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल और पुड्डुचेरी सहित नौ राज्यों में भी आजमाया गया और हर राज्य में चुनाव आयोग ने मनमाने तरीके से लाखों लोगों के नाम मतदाता सूचियों से हटा दिए हैं। अलबत्ता असम को इस योजना से मुक्त रखा गया। जाने-माने अर्थशास्त्री डॉ. पराकला प्रभाकर ने, जो वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के पति हैं, क्षेत्र विशेष और वर्ग विशेष के मतदाताओं के नाम मतदाता सूचियों से हटाने की चुनाव आयोग की रातों-रात 'नाम मिटाओ, नाम चढ़ाओ और चुनाव जिताओ परियोजना' को दुनिया का सबसे बड़ा रक्तहीन राजनीतिक जनसंहार करार दिया है।
बहरहाल, प्रधानमंत्री को इतने से भी संतोष नहीं है। वे 2029 के चुनाव को लेकर कोई कसर छोड़ना नहीं चाहते हैं। इसलिए वे 2029 के बाद लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने वाले नारी शक्ति वंदन कानून और लोकसभा व विधानसभा की सीटों के परिसीमन को भी 2029 के चुनाव से ही लागू करने की हड़बड़ी दिखा रहे हैं। हालांकि यह इतना आसान नहीं है, क्योंकि दोनों मामले संविधान संशोधन से जुड़े हुए हैं और संविधान संशोधन के लिए जरूरी दो तिहाई बहुमत सरकार के पास नहीं है।
पहले ऐसा लग रहा था कि महिला आरक्षण और परिसीमन को लेकर विपक्षी दल दुविधा में है और उनके लिए इसका विरोध करना आसान नहीं होगा। लेकिन अब धीरे-धीरे विपक्ष दलों ने अपना रुख स्पष्ट करना शुरू कर दिया है। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी यानी लोकसभा की क्रमश: दूसरी और तीसरी सबसे बड़ी पार्टियों ने अपना स्टैंड स्पष्ट कर दिया है। असल में विपक्ष के सामने दुविधा इस बात को लेकर थी कि अगर केंद्र सरकार की ओर से लाए जा रहे संविधान संशोधन विधेयक का विरोध किया जाता है तो विपक्षी पार्टियों को महिला आरक्षण का विरोधी बताया जाएगा। यह खतरा अब भी है लेकिन विपक्ष की ओर से अब यह बताने का प्रयास किया जा रहा है कि सभी पार्टियां महिला आरक्षण के तो पक्ष में हैं लेकिन परिसीमन का समर्थन नहीं कर रही हैं।
कांग्रेस की ओर से पार्टी के संचार विभाग के प्रभारी महासचिव जयराम रमेश ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके परिसीमन के प्रस्ताव पर सवाल उठाया। रमेश ने कहा कि महिला आरक्षण और परिसीमन का मामला व्यापक रूप से ध्यान भटकाने की योजना का हिस्सा है। रमेश ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि कैसे सरकार कह रही है कि परिसीमन के बाद उत्तर भारत के राज्यों का दबदबा नहीं बढ़ेगा और दक्षिण के राज्यों का असर कम नहीं होगा? उन्होंने इसके लिए केरल की मिसाल दी और कहा कि केरल व उत्तर प्रदेश के बीच अभी 60 लोकसभा सीटों का फर्क है, जो परिसीमन के बाद 90 सीटों का हो जाएगा। इसी तरह से हर उत्तर भारतीय राज्य में ज्यादा सीटें बढ़ेंगी और उस अनुपात में दक्षिण में कम सीटों का इज़ाफा होगा।
लगभग इसी लाइन पर समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने भी केंद्र सरकार के प्रस्ताव का विरोध किया है। अखिलेश ने कहा है कि जैसा पहले से प्रस्तावित है, कि 2026 के बाद होने वाली जनगणना के आधार पर ही परिसीमन होगा, वैसा ही होना चाहिए। अगर परिसीमन नहीं होता है तो महिला आरक्षण लागू करना संभव नहीं होगा। गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने 16 से 18 अप्रैल तक तीन दिन का संसद सत्र बुलाया है। इसके लिए ही बजट सत्र का सत्रावसान नहीं किया गया। तीन दिन के इस सत्र में महिला आरक्षण और परिसीमन को नारी शक्ति वंदन कानून से अलग करने का प्रस्ताव लाया जाएगा। सरकार का इरादा अगले लोकसभा चुनाव और उसके साथ होने वाले विधानसभा चुनावों से महिला आरक्षण लागू करने का है। प्रधानमंत्री मोदी ने केरल से लेकर असम तक अपनी चुनाव सभाओं में कहा है कि सरकार महिला आरक्षण लागू करने जा रही है। विपक्ष महिला आरक्षण का विरोध नहीं करेगा लेकिन परिसीमन का विरोध करेगा ही।
सरकार चाहती है कि 2011 की जनगणना के आधार पर ही परिसीमन का काम हो जाए और लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर 816 कर दी जाएं। इसमें से एक तिहाई यानी 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएं। इसके लिए संविधान में संशोधन का विधेयक लाना होगा और विशेष बहुमत यानी दो तिहाई बहुमत से पास कराना होगा। विपक्ष दलों के सहयोग के बगैर यह संभव नहीं हो सकेगा।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)