लैरी द कैट और प्रधानमंत्री मोदी
देश में मोदी सरकार से पहले भी अन्य सरकारों के खिलाफ धरना-प्रदर्शन-आंदोलन सब हुए;
देश में मोदी सरकार से पहले भी अन्य सरकारों के खिलाफ धरना-प्रदर्शन-आंदोलन सब हुए। जिंदा लोकतंत्र की पहचान यही है कि जनता अपने हक के लिए जागरुक दिखे और सरकार की जो बात उसे अपने हितों के खिलाफ लगे, उस पर आवाज़ उठाए। लेकिन 2014 से पहले की किसी सरकार ने आंदोलन शब्द और आंदोलनकारियों को इस तरह अपमानित नहीं किया।
ब्रिटेन में पिछले सात सालों में छह प्रधानमंत्री बदल चुके हैं। हाल ही में कीर स्टार्मर ने भी पद छोड़ दिया है। इस्तीफा देने के बाद प्रधानमंत्री आवास 10 डाउनिंग स्ट्रीट के बाहर राष्ट्र को संबोधित करते हुए स्टार्मर ने कहा कि लेबर पार्टी को नहीं लगता कि मैं अगले चुनाव में नेतृत्व करने के लिए सही व्यक्ति हूं। फिलहाल वे नए प्रधानमंत्री के चयन तक कार्यवाहक प्रधानमंत्री का पद संभालते रहेंगे। गौरतलब है कि स्टार्मर जुलाई 2024 के आम चुनाव में ऐतिहासिक जीत के साथ सत्ता में आए थे। उस समय लेबर पार्टी ने भारी बहुमत हासिल किया था और उनसे बड़े बदलावों की उम्मीद की जा रही थी। लेकिन जल्द ही उनकी सरकार कई विवादों और राजनीतिक चुनौतियों से घिर गई। सरकार की कर नीति, सामाजिक कल्याण योजनाओं में बदलाव, आर्थिक मोर्चे पर चुनौतियां और एपस्टीन फाइल्स में अमेरिका में ब्रिटेन के पूर्व राजदूत लॉर्ड पीटर मैंडेलसन का नाम आना, जैसे मुद्दों के कारण लगातार आलोचना का कारण बनीं। वैश्विक हालात में बढ़ती चुनौतियां और देश में सरकार की घटती लोकप्रियता ने सत्ता से उनकी विदाई का रास्ता बनाया। अब स्टार्मर के बाद फिलहाल एंडी बर्नहम का नाम प्रधानमंत्री पद की दौड़ में सबसे ऊपर है। बर्नहम अगर इस पद पर बैठते हैं तो देखना होगा कि तमाम चुनौतियों का सामना करते हुए क्या वे अपना कार्यकाल पूरा करेंगे। ब्रिटेन की शासन व्यवस्था में निचले सदन यानी हाउस ऑफ कॉमन्स के चुनाव पांच साल में होते हैं, और इसमें बहुमत पाने वाला दल ही सरकार बनाता है। इस दल के नेता यानी प्रधानमंत्री को यह अधिकार होता है कि वे 5 साल का कार्यकाल पूरा होने से पहले भी राजा को सलाह देकर संसद भंग करवा सकते हैं और नए चुनाव की घोषणा कर सकते हैं।
ब्रिटेन में एक के बाद एक प्रधानमंत्रियों के इस्तीफे का मजाक सोशल मीडिया पर खूब बनाया जा रहा है। कहा जा रहा है कि जिन लोगों ने दुनिया भर पर राज किया और कई बार दावा किया कि हमने इन्हें शासन करना सिखाया, उनसे आज अपनी ही सत्ता नहीं संभाली जा रही हैं। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री आवास में पिछले 15 साल से बनी हुई लैरी नाम की बिल्ली भी खूब चर्चा में है। लैरी वहां चूहों को पकड़ने वाली मुख्य बिल्ली के तौर पर तैनात है और उसने अपने रहते 6 प्रधानमंत्रियों—डेविड कैमरून, थेरेसा मे, बोरिस जॉनसन, लिज़ ट्रस, ऋषि सुनक और कीर स्टार्मर को देख लिया है। लैरी को लेकर कहा जा रहा है कि राजनीति में असली दबदबा तो इसी का है, जो प्रधानमंत्री आवास में बनी हुई है।
हंसी-मजाक से परे यह एक गंभीर चर्चा का विषय है कि ब्रिटेन में प्रधानमंत्रियों के इस्तीफे को सत्ता की अस्थिरता की तरह देखा जाए या लोकतंत्र की परिपक्वता और मजबूती की तरह। हाल-फिलहाल में किसी ब्रिटिश प्रधानमंत्री से यह गर्वोक्ति नहीं सुनी गई कि हमारा इतिहास ऐसा था, वैसा था और हम लोकतंत्र का कितना सम्मान करते हैं। इस बड़बोलेपन के बिना भी लोकतंत्र का सम्मान करते हुए प्रधानमंत्रियों के इस्तीफे हुए ताकि जनता की भावना उपेक्षित न हो। ब्रिटेन में न किसी को संविधान हाथ में लेकर घूमने की जरूरत पड़ती है कि वह लोगों को बताए कि इसे बचाना है, न वहां किसी चुनाव में मुद्दा यह रहा है कि हमें संविधान और लोकतंत्र बचाना है, न वहां के किसी प्रधानमंत्री ने यह दावा किया कि अब उसी की सत्ता कायम रहेगी। यह दावा तो राजशाही के लिए सुरक्षित है, द किंग इज़ डेड, लान्ग लिव द किंग, यानी राजा मर गया, राजा अमर रहे, यह वाक्य ही बताता है कि राजशाही कायम रहेगी। लेकिन लोकतंत्र तो ऐसे नहीं चल सकता कि जनता में आपके लिए रोष दिखे, नाराजगी दिखे, आपके फैसलों पर असहमति दिखे, तो उसे नजरंदाज करते हुए भी आप सत्ता पर न केवल बने रहें, बल्कि विरोध के लोकतांत्रिक अधिकार को हिकारत से देखें।
जब किसान आंदोलन देश में हुआ था, तब बहुत से तथाकथित सभ्य, संभ्रांत लोगों को यह तकलीफ हुई थी कि उनकी आवाजाही के रास्ते बाधित हो रहे हैं। ऐसे ही लोगों के समर्थन के कारण प्रधानमंत्री मोदी ने आंदोलनकारियों के लिए आंदोलनजीवी जैसा निकृष्ट शब्द बोलने का दुस्साहस सदन में किया था। क्योंकि तब तक नरेन्द्र मोदी को यह यकीन हो चुका था कि धर्म की अफीम और हिंदुत्व की खुराक इस देश के एक तबके को इतनी पिलाई जा चुकी है जो उनके फैसले पर सवाल करना भूल जाएगा। जिन लोगों ने इस खुराक को लेने से मना किया, उन्होंने सवाल उठाने जारी रखे। किसानों को खालिस्तानी, विदेशी ताकतों का एजेंट, एसी में बैठकर आंदोलन करने वाले जैसे तंज कसे गए, लेकिन किसान अपनी मांग से टस से मस नहीं हुए और तीन कृषि कानून वापस लिए गए। सरकार ने किसी दबाव में फैसला तो बदला लेकिन लोकतंत्र में आंदोलन और विरोध का स्वाभाविक अधिकार शायद अब भी उसकी समझ में नहीं आया है। इसलिए राहुल गांधी की कोटा में छात्रों की गूंज रैली के बाद धर्मेन्द्र प्रधान ने कहा कि ऐसे कार्यक्रमों में दहशतगर्द तैयार किए जाते हैं। बात यहीं तक नहीं रुकी, अब जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की जा रही है, इसके लिए सोनम वांगचुक चार दिनों से अनशन पर हैं, उनके अलावा कुछ और लोग भी अनशन कर रहे हैं, देश भर से लोग इस आंदोलन को अपना समर्थन देने और आंदोलनकारियों को मदद देने पहुंच रहे हैं, तो यह भी लोगों की सरकार से नाराजगी का इजहार ही है। लेकिन भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष इन आंदोलनकारियों को वायरस कह रहे हैं। हाल ही में नितिन नबीन ने कहा कि भाजपा का कार्यकर्ता ऐसे कॉकरोचों और वायरसों से निपटना जानता है।
अब नितिन नबीन और प्रधानमंत्री मोदी से सवाल यह है कि क्या उनकी नजर में इस देश के लोगों की हैसियत कॉकरोच और वायरस जैसी ही है। अगर आंदोलनकारी कुछ ऐसा करें जो गैरकानूनी है, तो उन पर कानूनी कार्रवाई की जगह क्या भाजपा के कार्यकर्ताओं को छोड़ दिया जाएगा कि जाओ निपट लो। कॉकरोच जनता पार्टी कोई राजनैतिक दल नहीं है, और फिलहाल उसका उद्देश्य केवल धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा ही है। क्या यह संगठन आगे जाकर किसी राजनैतिक दल का आकार लेगा, इसका उद्देश्य क्या होगा, विचारधारा कौन सी रहेगी, यह सब बाद के सवाल हैं। फिलहाल ऐसे नाम से संगठन बनाने की जरूरत ही इसलिए पड़ी क्योंकि मुख्य न्यायाधीश ने बेरोजगार युवकों के लिए कॉकरोच शब्द का इस्तेमाल किया था। भले उन्होंने उस समय इस पर सफाई दे दी, लेकिन बात तो निकल चुकी है और दूर तलक जा रही है। भाजपा ने उस समय भी देश के युवाओं के लिए कॉकरोच शब्द कहने पर कोई ऐतराज नहीं जताया था और अब खुद उसके अध्यक्ष आंदोलनकारियों को वायरस कह रहे हैं, केन्द्रीय मंत्री इन्हें आतंकवादी बता रहे हैं। इससे पहले जेएनयू से भाजपा को तकलीफ थी और वहां सत्ताविरोधी आवाज उठी तो उन्हें भी देश विरोधी और टुकड़े-टुकड़े गैंग जैसे शब्द कहे गए।
देश में मोदी सरकार से पहले भी अन्य सरकारों के खिलाफ धरना-प्रदर्शन-आंदोलन सब हुए। जिंदा लोकतंत्र की पहचान यही है कि जनता अपने हक के लिए जागरुक दिखे और सरकार की जो बात उसे अपने हितों के खिलाफ लगे, उस पर आवाज़ उठाए। लेकिन 2014 से पहले की किसी सरकार ने आंदोलन शब्द और आंदोलनकारियों को इस तरह अपमानित नहीं किया, जो असल में लोकतंत्र का अपमान है। कांग्रेस नेता शशि थरूर ने मनमोहन सिंह सरकार के किफायत बरतने वाले निर्देश पर जब हवाई जहाज की इकॉनामी क्लास के लिए कैटल क्लास यानी मवेशियों का वर्ग जैसा जुमला इस्तेमाल किया था, तो उनकी पर्याप्त आलोचना हुई थी। राजनीतिक दायरे से लेकर मीडिया तक शशि थरूर की अभिजात्य मानसिकता पर सवाल उठे थे। लेकिन अब छात्रों के भविष्य के लिए आवाज उठाने वाले लोगों को खुलेआम वायरस कहा जा रहा है और इस पर कोई हलचल नहीं हो रही है, यह दुखद है। हम प्रधानमंत्री मोदी से यह उम्मीद तो बिल्कुल ही नहीं कर सकते कि वे जनता के असंतोष को देखते हुए अपने पद से इस्तीफा देंगे, क्योंकि यह सब ब्रिटेन में होता है, हमारे यहां नहीं। मगर संसद की चौखट पर सिर झुकाया है, संविधान की किताब को सिर से लगाया है, तो थोड़ा अपनी एक्टिंग का ही मान रख लें और आंदोलनकारियों को इज्जत बख्शें।
वैसे सोचने वाली बात ये है कि क्या लैरी द कैट और प्रधानमंत्री मोदी के बीच कोई अघोषित मुकाबला है।