How safe is the digital world for children?

भारत में बच्चों की दुनिया तेजी से डिजिटल हो रही है।;

By :  DB Desk
Update: 2026-09-02 21:10 GMT
  • राजु कुमार

बच्चों को सुरक्षित रखने का समाधान न तो उन्हें डिजिटल दुनिया से पूरी तरह दूर करने में है और न ही सारी जिम्मेदारी बच्चों और उनके माता-पिता पर डाल देने में। इंटरनेट अब शिक्षा, सूचना, रचनात्मकता और सामाजिक भागीदारी का महत्वपूर्ण माध्यम है। जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जिसमें सरकार स्पष्ट और प्रभावी नियम बनाए, तकनीकी कंपनियां अपने ऑनलाइन मंचों को बच्चों के लिए सुरक्षित बनाने की जिम्मेदारी लें।

भारत में बच्चों की दुनिया तेजी से डिजिटल हो रही है। पढ़ाई, मनोरंजन और दोस्तों से बातचीत से लेकर अपनी बात कहने तक इंटरनेट अब बच्चों के रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बन चुका है। लेकिन इंटरनेट पर बच्चों की बढ़ती मौजूदगी के साथ उनके सामने खतरे भी बढ़े हैं। साइबर बुलिंग, ऑनलाइन ग्रूमिंग, ब्लैकमेलिंग, तस्वीरों के दुरुपयोग, निजता के उल्लंघन और ऑनलाइन यौन शोषण जैसे अपराध बच्चों की सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन रहे हैं।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी के आंकड़ों के क्राई द्वारा किए गए विश्लेषण के अनुसार, 2017 से 2024 के बीच बच्चों के खिलाफ दर्ज साइबर अपराधों में करीब 20 गुना बढ़ोतरी हुई है। इसी अवधि में बाल यौन शोषण सामग्री से जुड़े अपराधों में 157 गुना वृद्धि दर्ज की गई। यद्यपि 2023 के उच्चतम स्तर की तुलना में 2024 में बच्चों के खिलाफ दर्ज साइबर अपराधों में करीब आठ प्रतिशत की कमी आई है।

भारत में 18 साल से कम उम्र के करीब 11.3 करोड़ बच्चे इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं और देश के कुल इंटरनेट उपयोगकर्ताओं में उनकी हिस्सेदारी करीब 14 प्रतिशत है। वहीं, नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकानॉमिक रिसर्च की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, 13 से 16 वर्ष की उम्र के 65.3 प्रतिशत बच्चों की मोबाइल तक पहुंच है, 37.8 प्रतिशत इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं और 21.3 प्रतिशत सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं। महानगरों में 73.1 प्रतिशत बच्चों की मोबाइल तक पहुंच है और 49.3 प्रतिशत इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं, जबकि कम विकसित गांवों में ये आंकड़े क्रमश: 64.2 और 33.3 प्रतिशत हैं।

ऑनलाइन अपराधों के बढ़ते मामलों के बीच दुनिया के कई देशों ने बच्चों की डिजिटल सुरक्षा के लिए ऑनलाइन मंचों की जिम्मेदारी तय करने के सख्त कदम उठाए हैं। ऑस्ट्रेलिया में दिसंबर 2025 से प्रमुख सोशल मीडिया मंचों के लिए 16 साल से कम उम्र के बच्चों को खाता बनाने या रखने से रोकने के लिए उचित कदम उठाना कानूनी जिम्मेदारी बन गया है। इसकी जिम्मेदारी बच्चे या माता-पिता के बजाय ऑनलाइन मंचों पर डाली गई है।

ब्रिटेन के ऑनलाइन सुरक्षा अधिनियम में ऑनलाइन सेवाओं के लिए बच्चों के सामने मौजूद जोखिमों का आकलन और उनसे बचाव के उपाय जरूरी किए गए हैं। नुकसानदेह सामग्री तक बच्चों की पहुंच रोकने के लिए उम्र सत्यापन के उपाय भी किए गए हैं। इसी तरह यूरोपीय संघ के डिजिटल सेवा अधिनियम में बच्चों की निजता और सुरक्षा के लिए ऑनलाइन मंचों की जवाबदेही तय की गई है, जिसमें बच्चों के खातों को सामान्य रूप से निजी रखने और हानिकारक सामग्री की सिफारिश करने वाली स्वचालित प्रणालियों पर नियंत्रण जैसे उपाय शामिल हैं।

भारत में भी बच्चों को ऑनलाइन खतरों से बचाने के लिए कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 67बी बच्चों से जुड़ी यौन सामग्री के इलेक्ट्रॉनिक प्रकाशन या प्रसारण सहित कई गतिविधियों को दंडनीय बनाती है, जबकि सूचना प्रौद्योगिकी मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता नियम, 2021 ऑनलाइन मंचों पर कुछ जिम्मेदारियां डालते हैं। डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 में बच्चों के व्यक्तिगत डेटा की विशेष सुरक्षा के साथ उनकी ऑनलाइन गतिविधियों और व्यवहार की निगरानी तथा उन्हें लक्षित कर विज्ञापन दिखाने पर रोक का प्रावधान है। हालांकि इसके प्रमुख प्रावधान अभी पूरी तरह प्रभावी नहीं हुए हैं और बच्चों की डिजिटल सुरक्षा को लेकर व्यापक व्यवस्था अभी विकसित हो रही है।

कानून और तकनीकी उपाय जरूरी हैं, लेकिन बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा का सवाल केवल उम्र सत्यापन या किसी वेबसाइट को रोकने तक सीमित नहीं है। बच्चे इंटरनेट पर किससे बात कर रहे हैं, क्या साझा कर रहे हैं, किन संपर्क सूत्रों पर जा रहे हैं और परेशानी होने पर किससे मदद मांग सकते हैं, इसकी समझ भी उतनी ही जरूरी है। कई बार बच्चे किसी गलत ऑनलाइन अनुभव की जानकारी इसलिए नहीं देते क्योंकि उन्हें डर रहता है कि परिवार उन्हें ही दोषी ठहराएगा, उनका फोन छीन लिया जाएगा या उनकी बात पर विश्वास नहीं किया जाएगा। ऐसे में परिवारों और स्कूलों के सामने चुनौती निगरानी बढ़ाने के साथ ऐसा भरोसेमंद माहौल बनाने की भी है, जिसमें बच्चा किसी परेशानी के बारे में बिना डर के बता सके।

इन्हीं परिस्थितियों में बच्चों के मुद्दे पर कार्यरत चाइल्ड राइट्स एंड यू यानी क्राई ने बच्चों के लिए सुरक्षित डिजिटल स्पेस बनाने के लिए देशव्यापी 'टिंग टोंग' अभियान की शुरुआत की है। अभियान का मूल संदेश ऑनलाइन कुछ भी करने से पहले एक पल रुक कर सोचने की आदत विकसित करना है। क्राई की मुख्य कार्यकारी अधिकारी पूजा मारवाह ने कहा, 'आज बच्चे दो दुनियाओं में बड़े हो रहे हैं—एक भौतिक दुनिया और दूसरी डिजिटल दुनिया। जिस तरह हम अपने घरों, स्कूलों और आस-पड़ोस को सुरक्षित बनाने के लिए काम करते हैं, उसी तरह हमें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि बच्चे जिस डिजिटल स्पेस का हिस्सा हैं, वह सुरक्षित, समावेशी हो और उनके अधिकारों का सम्मान करता हो। ऑनलाइन सुरक्षा अब केवल तकनीक का मुद्दा नहीं रह गया है; यह मूलरूप से बाल सुरक्षा का मुद्दा है। इस अभियान के जरिए हम चाहते हैं कि हम सभी अपने व्यवहार में एक छोटा लेकिन बेहद महत्वपूर्ण बदलाव लाएं। ऑनलाइन कुछ भी क्लिक करने, किसी पर भरोसा करने, कुछ शेयर करने या पोस्ट करने से पहले बस एक पल रुकना बहुत बड़ा बदलाव ला सकता है।'

दरअसल, बच्चों को सुरक्षित रखने का समाधान न तो उन्हें डिजिटल दुनिया से पूरी तरह दूर करने में है और न ही सारी जिम्मेदारी बच्चों और उनके माता-पिता पर डाल देने में। इंटरनेट अब शिक्षा, सूचना, रचनात्मकता और सामाजिक भागीदारी का महत्वपूर्ण माध्यम है। जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जिसमें सरकार स्पष्ट और प्रभावी नियम बनाए, तकनीकी कंपनियां अपने ऑनलाइन मंचों को बच्चों के लिए सुरक्षित बनाने की जिम्मेदारी लें, स्कूल डिजिटल सुरक्षा को बच्चों की शिक्षा का हिस्सा बनाएं और परिवार बच्चों के साथ लगातार संवाद बनाए रखें। बच्चों को इंटरनेट इस्तेमाल करने की आजादी और डिजिटल दुनिया के खतरों से सुरक्षा—दोनों को साथ लेकर चलना ही आने वाले समय की बड़ी बाल अधिकार चुनौती है।

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