कई लड़ाइयों में लड़ने वाली ममता बनर्जी क्या बागियों से हार गई?

ममता बनर्जी अभी भी बहुत लोकप्रिय हैं। टीएमसी के बड़े हिस्से में, उनके नेतृत्व पर सीधे हमले से ज़मीनी स्तर के कार्यकर्ता दूर हो सकते हैं।;

Update: 2026-06-11 21:40 GMT
  • टी एन अशोक

ममता बनर्जी अभी भी बहुत लोकप्रिय हैं। टीएमसी के बड़े हिस्से में, उनके नेतृत्व पर सीधे हमले से ज़मीनी स्तर के कार्यकर्ता दूर हो सकते हैं। बगावत का भविष्य संख्या बल पर निर्भर करता है। तो, आगे क्या होगा? अगर काकोली घोष दस्तीदार संसदीय दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन दिखा पाती हैं, तो दल-बदल विरोधी कानूनों के तहत इस बंटवारे को कानूनी मान्यता मिल सकती है।

तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी), जिसे कभी भारत की सबसे मज़बूत क्षेत्रीय राजनीतिक मशीन माना जाता था, अपने 28 साल के इतिहास में सबसे बड़े संकट का सामना कर रही है। 2026 के पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनावों में पार्टी की ज़बरदस्त हार के बाद पार्टी के अन्दर जो नाराजग़ी की आवाज़ों के तौर पर शुरू हुई थी, वह तेज़ी से पश्चिम बंगाल विधान सभा से लेकर नई दिल्ली में संसद के गलियारों तक फैली एक बड़ी अंदरूनी बगावत में बदल गई है।

इस तूफ़ान के केंद्र में एक साथ दो बगावतें हैं—एक कोलकाता में पार्टी से निकाले गए विधायक ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में और दूसरी दिल्ली में पुरानी सांसद काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में। ये सब मिलकर ममता बनर्जी की लगभग तीन दशकों में मेहनत से बनाई गई राजनीतिक इमारत को गिराने का खतरा पैदा कर रहे हैं।

चुनाव के नतीजों ने ममता बनर्जी की अजेय होने की छवि को तोड़ दिया और उन छिपे हुए तनावों को सामने ला दिया जो तब तक छिपे रहे जब तक पार्टी ने राज्य की प्रशासनिक मशीनरी को नियंत्रित किया।

कुछ ही दिनों में, जो विधायक ममता के भतीजे और राजनीतिक वारिस अभिषेक बनर्जी के आस-पास सत्ता के जमावड़े के बारे में चुपचाप शिकायत कर रहे थे, उन्हें मौजूदा व्यवस्था को चुनौती देने का मौका मिल गया। पहला धमाका कोलकाता में हुआ। फिर विधान सभा में बगावत हुई। ऋतब्रत बनर्जी, जो पहले से ही पार्टी नेतृत्व से अनुशासनात्मक कार्रवाई का सामना कर रहे थे, नाराज़ विधायकों के लिए एक अप्रत्याशित केन्द्र बनकर उभरे। एक नाटकीय घटनाक्रम में टीएमसी के 80 में से 58 विधायकों ने बंगाल विधान सभा में विपक्ष के नेता के तौर पर उनके समर्थन में एक पत्र पर हस्ताक्षर किए।

इसके बाद विधान सभा अध्यक्ष ने बागी खेमे को मान्यता दे दी, जिससे ममता बनर्जी के वफादारों से विपक्ष की बेंचों का नियंत्रण हस्तांतरित हो गया। हालांकि बागी विधायकों ने पार्टी के सर्वोच्च नेता के तौर पर ममता बनर्जी के लिए अपने लगातार सम्मान का ऐलान किया, लेकिन उन्होंने अभिषेक बनर्जी के अधिकार को खुले तौर पर खारिज कर दिया। उनका संदेश साफ था: बगावत ममता के खिलाफ कम और उत्तराधिकार की उस योजना के खिलाफ ज्यादा थी जो आखिरकार पार्टी को उनके भतीजे के हाथों में सौंप देती।

अगर विधान सभा में बगावत से टीएमसी मुख्यालय हिल गया, तो संसद की घटनाओं से देश भर में राजनीतिक भूचाल आने का खतरा था। बगावत भारत की राजधानी तक पहुंच चुकी थी।

बगावत को काकोली घोष दस्तीदार के रूप में एक नया चेहरा मिला। काकोली ने दावा किया कि 20 टीएमसी सांसदों ने आधिकारिक तौर पर भाजपा के नेतृत्व वाले नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (एनडीए) को समर्थन देने की अपनी इच्छा बताई थी। इस संख्या का चयन यूं ही नहीं था। दलबदल विरोधी कानून के तहत अलग गुट बनाने के लिए दो-तिहाई सदस्यों की आवश्यकता थी।

इस दावे ने विपक्षी खेमे में झटके की लहर भेज दी। समय भी नाटकीय था। ममता बनर्जी ने दिल्ली में विपक्ष की एकता दिखाने के लिए इंडिया ब्लॉक की बैठक में हिस्सा लिया, वहीं नाराज़ सांसदों ने कथित तौर पर भाजपा के वरीय नेताओं और केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के साथ चर्चा की। वफ़ादारों ने तुरंत पलटवार किया। साफ़ आवाज़ थी कि पहले इस्तीफ़ा दो और फिर भाजपा में शामिल होने के बारे में सोचो।

कीर्ति आज़ाद ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को भेजे गए कथित पत्र के बारे में पारदर्शिता की मांग की। उन्होंने तर्क दिया कि अगर 20 सांसदों ने सच में एक अलग संसदीय समूह के समर्थन में किसी दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए थे, तो उन हस्ताक्षरों को सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया? वफ़ादारों का कहना था कि बागी नेता भाजपा के संरक्षण में काम करते हुए अपनी संख्या बढ़ा-चढ़ाकर दिखा रहे थे।

टीएमसी नेतृत्व के लिए, यह बगावत सिर्फ एक अंदरूनी झगड़ा नहीं है। यह एक बड़ी राजनीतिक साज़िश का हिस्सा है, जिसे कथित तौर पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह चला रहे हैं। पार्टी महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और दूसरे राज्यों का उदाहरण देती है, जहां भाजपा के दबाव में विपक्षी पार्टियों में बड़ी टूट हुई थी। वफ़ादारों के अनुसार, ईडी, सीबीआई, और आयकर विभाग जैसी केंद्रीय एजेंसियों ने ऐसा माहौल बना दिया है जिसमें कमज़ोर स्थिति वाले नेताओं को पाला बदलने के लिए उकसाया और विवश किया जाता है। भाजपा इन आरोपों को खारिज करती है। उसके नेताओं का तर्क है कि यह बगावत टीएमसी के अंदर फैली व्यापक नाराज़गी और चुनावी हार के बाद अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व को प्रक्षेपित करने की विफलता को दिखाती है।

रोज़ाना के इस नाटक के पीछे एक गहरी लड़ाई छिपी है। यह उत्तराधिकार का सवाल है। इसलिए बागियों ने एक सोच-समझकर तय किया गया रुख अपनाया है : ममता का सम्मान करो, अभिषेक को नकारो।

यह फ़र्क राजनीतिक रूप से अहम है क्योंकि ममता बनर्जी अभी भी बहुत लोकप्रिय हैं। टीएमसी के बड़े हिस्से में, उनके नेतृत्व पर सीधे हमले से ज़मीनी स्तर के कार्यकर्ता दूर हो सकते हैं। बगावत का भविष्य संख्या बल पर निर्भर करता है। तो, आगे क्या होगा? अगर काकोली घोष दस्तीदार संसदीय दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन दिखा पाती हैं, तो दल-बदल विरोधी कानूनों के तहत इस बंटवारे को कानूनी मान्यता मिल सकती है। अगर संख्या कम पड़ती है, तो बागी सांसदों के अयोग्य घोषित होने और राजनीतिक रूप से अलग-थलग पड़ने का खतरा हो सकता है।

ममता बनर्जी के लिए यह अस्तित्व की लड़ाई है। अपने पूरे राजनीतिक जीवन में उन्होंने कांग्रेस को हराया, वाम मोर्चे के दबदबे को खत्म किया और बार-बार भाजपा के आगे बढ़ने की कोशिशों को रोका। लेकिन आज, उन्हें किसी बाहरी प्रतिद्वंद्वी से भी ज़्यादा खतरनाक दुश्मन बागियों का सामना करना पड़ रहा है।

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