विपक्ष शासित राज्यों में सरकारों के खिलाफ राज्यपालों का युद्ध
देश में पिछले कुछ सालों के दौरान तमाम संवैधानिक पदों में सबसे ज्यादा बदनाम अगर कोई हुआ है तो वह है राज्यपाल का ओहदा
- अनिल जैन
राज्य सरकारों और राज्यपालों के बीच टकराव पहले भी होते रहे हैं लेकिन अभिभाषण नहीं पढ़ने या आधा-अधूरा पढ़ने की यह परिपाटी बिल्कुल नई है। विधानसभा से पारित विधेयकों को रोके जाने की परंपरा भी पिछले 10-12 साल में ही विकसित हुई है। उससे पहले परंपरा यही रही कि राज्यपाल प्रदेश सरकार की ओर से तैयार किए गए अभिभाषण को शब्दश: पढ़ेंगे, संसद के संयुक्त अधिवेशन राष्ट्रपति केंद्र सरकार के तैयार किए गए भाषण को पढ़ते हैं।
देश में पिछले कुछ सालों के दौरान तमाम संवैधानिक पदों में सबसे ज्यादा बदनाम अगर कोई हुआ है तो वह है राज्यपाल का ओहदा। वैसे यही सबसे ज्यादा बेमतलब का पद भी है। इसीलिए भारी-भरकम खर्च वाले इस संवैधानिक पद को लंबे समय से सफेद हाथी माना जाता रहा है और इसकी उपयोगिता तथा प्रासंगिकता पर अक्सर सवाल उठते रहते हैं। सवाल उठाने का मौका और कोई नहीं बल्कि कई राज्यपाल खुद ही अपनी ऊटपटांग हरकतों से उपलब्ध कराते हैं। ऐसे राज्यपाल उन राज्यों के होते हैं, जहां केंद्र में सत्तारूढ़ दल के विरोधी दल की सरकारें होती हैं।
राज्यपाल का चयन और नियुक्ति केंद्र सरकार करती है। राज्यपाल के पद पर नियुक्ति पाने वालों में ज्यादातर वे लोग होते हैं, जो केंद्र में सत्ताधारी दल से जुड़े होते हैं। सत्ताधारी दल का नेतृत्व जिन लोगों को थका-हारा, बीमार, असंतुष्ट, नाकारा या अनुपयोगी मान लेता है, उन्हें वह किसी न किसी प्रदेश का राज्यपाल बना देता है। इसलिए ऐसे लोग राजभवनों में जाकर अपने सूबे की विपक्ष शासित सरकार को परेशान या अस्थिर करना अपनी अहम जिम्मेदारी समझते हैं। मानो ऐसा करना उनकी 'नौकरी की अनिवार्य सेवा शर्तों' में शामिल हो।
पंचतंत्र में चालाक बंदर और मूर्ख मगरमच्छ की एक कहानी है, जिसमें बंदर अपना कलेजा खाने को आतुर मगरमच्छ से अपनी जान बचाने के लिए कहता है कि 'मैं तो अपना कलेजा नदी किनारे जामुन के पेड़ पर संभालकर रखता हूं और वहां से लाकर ही तुम्हारी इच्छा पूरी कर सकता हूं।' हमारे तमाम राज्यपालों का हाल भी पंचतंत्र की कहानी के बंदर जैसा ही है। फर्क इतना ही है कि वह बंदर तो जान बचाने के लिए अपना कलेजा पेड़ पर रखे होने का बहाना बनाता है, लेकिन हमारे राज्यपाल सचमुच अपना विवेक दिल्ली में रखकर राज्यों के राजभवनों में रहते हैं। दिल्ली में उनके विवेक का इस्तेमाल वे लोग करते हैं जो व्यावहारिक तौर पर उनके 'नियोक्ता' होते हैं।
हमारे राज्यपालों की यह कहानी कोई आज-कल की नहीं, बल्कि बहुत पुरानी है, जिसे आए दिन कोई न कोई राज्यपाल देश को याद दिलाता रहता है। विपक्ष शासित राज्य सरकारों को राज्यपालों द्वारा परेशान या अस्थिर करने की हरकतें कांग्रेस के जमाने भी होती थीं, लेकिन कभी-कभार ही। मगर पिछले कुछ सालों से ऐसा होना सामान्य बात हो गई है।
इस सिलसिले में महाराष्ट्र, राजस्थान, छत्तीसगढ़, दिल्ली, गोवा, उत्तराखंड, आदि राज्यों में तो जब वहां भाजपा-विरोधी दलों की सरकारें थीं तब वहां के राज्यपालों ने एक तरह से युद्ध ही छेड़ रखा था। यही सिलसिला पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, पंजाब, झारखंड, तेलंगाना, कर्नाटक हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर आदि राज्यों में भी लंबे समय से चल रहा है। इन राज्यों के राज्यपाल नेता प्रतिपक्ष की भूमिका धारण किए हुए हैं और राजभवन भारतीय जनता पार्टी के कार्यालय के रूप में तब्दील हो गए हैं।
इस समय तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि, केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर और कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत खास तौर पर चर्चा में हैं। तीनों के चर्चा में रहने की वजह समान है। तमिलनाडु का नाम बदलने तक का प्रयास कर चुके राज्यपाल आरएन रवि वहां की विधानसभा की कार्यवाही का नियम बदलना चाहते हैं। तमिलनाडु विधानसभा के सत्र की कार्यवाही परंपरागत रूप से तमिलनाडु के प्रदेश गान से शुरू होती है और समापन राष्ट्रगान से होता है। पिछले चार साल से साल के पहले सत्र में राज्यपाल अभिभाषण नहीं पढ़ रहे हैं, क्योंकि वे चाहते हैं कि सत्र की शुरुआत राष्ट्रगान से हो। इस साल भी इसी वजह से वे अभिभाषण पढ़े बगैर वापस चले गए। अभिभाषण नहीं पढ़ने का एक कारण यह भी है कि तमिलनाडु सरकार के तैयार किए गए अभिभाषण में कई मुद्दों को लेकर केंद्र सरकार की आलोचना की गई थी।
कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने भी यही किया। उन्होंने विधानमंडल के इस साल के पहले सत्र की साझा कार्यवाही में अभिभाषण पढ़ने से इनकार कर दिया। राज्य के कानून और संसदीय कार्य मंत्री थीरु दुरईमुरुगन के मुताबिक राज्यपाल को अभिभाषण के कई हिस्सों को लेकर आपत्ति थी और वे चाहते थे कि उन हिस्सों को हटा दिया जाए, लेकिन सरकार ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। उधर केरल में राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने भी लगभग ऐसा ही किया है। उन्होंने अभिभाषण तो पढ़ा लेकिन उसके उन हिस्सों को छोड़ दिया जिनमें केंद्र सरकार पर संघवाद के संवैधानिक सिद्धांत के विपरीत काम करने और राज्य को आर्थिक स्तर पर परेशान करने का •िाक्र था। उन्होंने अभिभाषण के उस हिस्से को भी नहीं पढ़ा जिसमें राज्य विधानसभा में पारित विधेयकों को बेवजह रोके जाने पर अफसोस जताया गया था। अधूरा भाषण पढ़कर राज्यपाल के चले जाने के बाद सरकार की ओर से राज्यपाल द्वारा अभिभाषण के छोड़े गए हिस्सों को पढ़ा और उसे कार्यवाही में शामिल किया गया। गौरतलब है कि केरल में विधेयक रोके जाने को लेकर कई बार टकराव के हालात पैदा हुए हैं। इस सिलसिले में राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची है। पिछले राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने भी विधानसभा में पारित कई विधेयकों को महीनों तक बिना किसी उचित कारण के रोके रखा था। केरल सरकार का कहना है कि विधेयकों को लंबे समय तक रोके जाने से जन कल्याण के काम प्रभावित होते हैं।
राज्य सरकारों और राज्यपालों के बीच टकराव पहले भी होते रहे हैं लेकिन अभिभाषण नहीं पढ़ने या आधा-अधूरा पढ़ने की यह परिपाटी बिल्कुल नई है। विधानसभा से पारित विधेयकों को रोके जाने की परंपरा भी पिछले 10-12 साल में ही विकसित हुई है। उससे पहले परंपरा यही रही कि राज्यपाल प्रदेश सरकार की ओर से तैयार किए गए अभिभाषण को शब्दश: पढ़ेंगे, संसद के संयुक्त अधिवेशन राष्ट्रपति केंद्र सरकार के तैयार किए गए भाषण को पढ़ते हैं। यह भी स्थापित तथ्य है कि अभिभाषण चाहे राष्ट्रपति का हो या राज्यपालों का उसमें सरकारें अपनी उपलब्धियां ही बताती हैं। वे उपलब्धियां सही हैं या गलत, यह जांच करना राष्ट्रपति या राज्यपाल का काम नहीं होता है। पहले लंबे समय तक देश में कांग्रेस की सरकार रही और उस दौरान कई राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें रहीं लेकिन उन राज्यों में कहीं भी ऐसा देखने को नहीं मिला कि अभिभाषण पढ़ने से किसी राज्यपाल ने इनकार किया हो या उसमें संशोधन किया हो।
राज्य सरकारों से राज्यपालों के टकराव के इन ताजा मामलों के अलावा राज्य सरकारों को बिना वजह राजनीतिक कारणों से परेशान करने और सरकार गिराने के खेल में लिप्त रहने के तो ढेर सारे मामले पिछले 10-12 सालों में देखने को मिले हैं। इनमें जो राज्यपाल कुख्यात रहे हैं, उनमें जगदीप धनखड़, भगत सिंह कोश्यारी, राम नाईक, आनंदी बेन पटेल, मृदुला सिन्हा, कल्याण सिंह, कलराज मिश्र, डॉ. कृष्णकांत पॉल, तथागत रॉय, जेपी राजखोवा आदि नाम उल्लेखनीय हैं। इनमें से कई राज्यपालों ने चुनावों के दौरान अपने गृह राज्य में भाजपा का प्रचार भी किया है और कुछ ने तो महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे का महिमामंडन तक किया है।
वैसे राज्यपालों की यह कलंक कथा केंद्र में कांग्रेस की सरकार के समय शुरू हुई थी, लेकिन उस समय यदा-कदा ही कहीं दोहराई जाती थी। इस सिलसिले में हरियाणा का किस्सा उल्लेखनीय है। बात 1982 की है। हरियाणा विधानसभा के चुनाव हुए थे। लोकदल के नेता चौधरी देवीलाल के पास बहुमत था, लेकिन राज्यपाल जीडी (गणपतराव देवाजी) तपासे ने उनके बहुमत की अनदेखी कर कांग्रेस नेता भजनलाल को दिल्ली के हरियाणा भवन में ही मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी थी। जनादेश और संविधान से यह बलात्कार करने के बाद तपासे जब चंडीगढ़ पहुंचे तो देवीलाल अपने विधायकों को लेकर राज्यपाल के सामने उनकी परेड कराने राजभवन पहुंच गए। राज्यपाल तपासे ने अपने विवेकाधिकार का हवाला देते हुए थेथरई दिखाई तो देवीलाल से रहा नहीं गया और उनके सब्र का बांध टूट गया। करीब सवा छह फीट लंबे और भरे-पूरे शरीर वाले देवीलाल ने गुस्से में आकर राज्यपाल का कॉलर पकड़ लिया और गालियां देते हुए उन्हें एक जोरदार थप्पड़ भी रसीद कर दिया था। मौजूदा दौर में सारे राज्यपाल खुशकिस्मत है कि उनके सामने कोई देवीलाल नहीं हैं।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)