ललित सुरजन की कलम से - जातिसूचक रैलियों पर प्रतिबंध
'आईआईटी और आईआईएम से पढ़कर निकलने वाले बच्चे भी अपनी रूढ़िवादी मानसिकता के चलते स्वयं को जातिवाद से मुक्त नहींकर पाते हैं
'आईआईटी और आईआईएम से पढ़कर निकलने वाले बच्चे भी अपनी रूढ़िवादी मानसिकता के चलते स्वयं को जातिवाद से मुक्त नहींकर पाते हैं। सच तो यह है कि जो लोग जाति प्रथा अप्रासंगिक हो जाने की बात करते हैं, वे तथाकथित निचली जातियों के राजनीतिक या आर्थिक सशक्तिकरण से घबराए हुए लोग हैं।'
'देश के बड़े-बड़े शिक्षा संस्थानों में जहां आरक्षण के कारण दलित, आदिवासी और पिछड़े समुदायों के बच्चों को प्रवेश मिल जाता है, वहां आए दिन उनके साथ उच्च वर्ण के विद्यार्थियों द्वारा जो दुर्व्यवहार और उत्पीड़न किया जाता है, वह एक कड़वी सच्चाई है। यही स्थिति सरकारी दफ्तरों में भी है। निजी क्षेत्र की बात करें तो वहां सरकार की मंशा और अनुरोधों के बावजूद इनके लिए कोई व्यवस्था अभी तक नहींबनने दी गई है।'
(देशबन्धु में 18 जुलाई 2013 को प्रकाशित)
https://lalitsurjan.blogspot.com/2013/07/blog-post_18.html