ललित सुरजन की कलम से - परिवर्तन या ईवीएम?
ऐसा नहीं कि भारतीय जनता पार्टी का वर्तमान नेतृत्व ही सत्तामोह से इस तरह ग्रस्त हो
ऐसा नहीं कि भारतीय जनता पार्टी का वर्तमान नेतृत्व ही सत्तामोह से इस तरह ग्रस्त हो। हम जिसे दुनिया का सबसे पुराना जनतांत्रिक देश मानते हैं और जिसके साथ अपने देश को सबसे बड़े जनतांत्रिक देश घोषित कर आत्मश्लाघा करते हैं उस संयुक्त राज्य अमेरिका ने भी समय-समय पर इस मनोभाव का परिचय दिया है।
1972 का चुनाव बहुत पुरानी बात नहीं है। राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने दुबारा चुनाव जीतने के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाए। उन्होंने विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी की जासूसी ही नहीं करवाई बल्कि उनके मुख्यालय में सेंधमारी भी करवाई।
वह शोचनीय प्रसंग वाटरगेट कांड के नाम से कुख्यात है। वाशिंगटन पोस्ट अखबार ने इसका खुलासा किया तो निक्सन को दूसरी पारी के बीच में ही इस्तीफा देना पड़ा और उपराष्ट्रपति स्पेरो एग्न्यू शेष अवधि के लिए कार्यवाहक राष्ट्रपति बने।
निक्सन किसी तरह महाभियोग से तो बच गए, लेकिन देश और दुनिया की जनता की निगाह से जो गिरे तो फिर गिरे ही रह गए।
(देशबन्धु में 06 दिसंबर 2018 को प्रकाशित)
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