— बाबा मायाराम
परिवेश व पर्यावरण के प्रति जागरुकता तो इससे बढ़ती ही है, पक्षी प्रेम और उनके प्रति संवेदनशीलता भी बढ़ती है। इससे जैव विविधता व पर्यावरण का संरक्षण तो होता ही है, टिकाऊ विकास का नजरिया भी मजबूत होता है। मानसिक स्वास्थ्य में भी पक्षी संगीत मददगार है। विशेषकर, जलवायु बदलाव के दौर में यह पहल बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है, जब गर्मी पड़ने के कारण पक्षियों का जीवन संकट में है, पीने के लिए पानी का अभाव है, तब पक्षियों के प्रति जागरुकता सार्थक व उपयोगी है।
हाल ही मैंने ओडिशा के हीराकुंड बांध की यात्रा की। यह बांध संबलपुर के पास महानदी पर बना है। आजादी के पहले बांधों में से एक है। इस विशाल बांध में मैंने कई पक्षियों को खेलते देखा। इसके पहले भी मैंने राजस्थान के तालाबों पर रिपोर्टिंग की है। वहां के बहुत पुराने तालाबों में पक्षियों को देखा था और उनकी आवाजें सुनी थीं, यह बहुत ही अच्छा अनुभव था। आज के स्तंभ में मैं पक्षी और उनके महत्व पर बात करना चाहूंगा, जिससे हमारे आसपास की प्रकृति से हम परिचित हो सकें और उससे जुड़ सकें।
हीराकुंड जलाशय की यात्रा के दौरान हम पैदल घूमे। यहां बड़ी संख्या में पक्षी दिखाई दिए। हाल ही में खबर आई है कि यहां उनकी गणना हुई है। सर्दियों में विदेशी पक्षी बहुत आते हैं। जिसमें बताया गया है कि यहां १२८ प्रजातियां हैं, जिसमें ५ नई प्रजातियां भी शामिल हैं। यह पक्षी, सैलानियों के आकर्षण का केन्द्र बने हुए हैं। अब यह पर्यटक स्थल भी है। जिस दिन हम वहां गए थे, उस दिन स्कूली बच्चे भी आए हुए थे।
मैं कई दिनों से बरगढ़ शहर में हूं, वहां से हीराकुंड की नहर गुजरती है। प्राय: रोज ही मैं सुबह की करता हूं। नहर के किनारे घूमता हूं। नहर में पक्षियों को खेलते देखना अनोखा है। यहां के पेड़ों पर उनका बसेरा होता है। इन ठंड दिनों में सुबह और शाम उन्हें देखना सुखद है। वे झूला झूलते हैं, इधर-उधर फुदकते हैं, गीत गाते हैं और धूप सेंकते हैं।
विशेषकर, किंगफिशर यहां काफी दिखता है। उसे पेड़ों पर बैठे देखना, फिर पानी में डूबते उतरते देखना बहुत ही मनमोहक है। इसके साथ पेड़ों पर तरह-तरह की चिड़ियाओं की आवाजें सुनना, जैसे वे हमसे कुछ बात कर रही हों। कई साल बाद मुझे चिड़ियों की चहचहाहट सुनकर ही जागने का मौका मिला है। इससे मुझे बचपन की याद आती है। जब मैं गांव में रहता था और चिड़ियों की चहचहाहट से ही अक्सर जाग जाता था।
लेकिन बाद के वर्षों में शहरों व कस्बों में रहा तो ऐसा मौका कम आया। बरगढ़ में रहते हुए सुबह व शाम को ऐसे नजारे देखने को मिलते रहे। कुछ वर्षों से मैंने पक्षियों में विशेष दिलचस्पी ली है। मैंने राजस्थान के तालाबों पर रिपोर्टिंग के दौरान पक्षी दर्शन पर विशेष ध्यान दिया। इसके बाद कुछ पक्षियों की पहचान भी हो गई, अब इसमें और भी जुड़ाव महसूस होने लगा।
यहां दोपहर में भी जब मैं कोई किताब पढ़ता हूं, तब चिड़ियों की आवाजें अपनी ओर खींचती हैं। मैं किताब छोड़कर देखता हूं, वह कहां से बोल रही है। उसे पास से देखने का मन करता है और उनको खोजने निकल पड़ता हूं। मेरे एक पक्षी विशेषज्ञ मित्र कहते हैं, अगर प्रकृति और पक्षियों को पहचान जाओगे, जान जाओगे तो वे सदैव के लिए तुम्हारे मित्र बन जाएंगे।
मैं कुछ साल पहले छत्तीसगढ़ में जन स्वास्थ्य सहयोग नामक संस्था में लोकेश तमगीरे नामक डॉक्टर से मिला, उनकी भी पक्षियों में गहरी रुचि है। कुछ समय पहले उनसे लम्बी बात की और उनके अनुभव जाने। वे बतलाते हैं कि कुछ साल पहले जब वे छत्तीसगढ़ में जन स्वास्थ्य सहयोग संस्था में कार्यरत थे, तब से जंगल में घूमना, परिवेश से जुड़ना, पक्षी देखना शुरू हुआ। यह संस्था स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करती है और उसके उपकेन्द्र अचानकमार वन्यजीव अभयारण्य के पास शिवतराई व बम्हनी गांव में हैं। इन गांवों का रास्ता जंगल के बीच से होकर गुजरता है। बम्हनी जाते समय मनियारी नदी भी कल-कल बहती है। बिलासपुर जिले के अचानकमार अभयारण्य में घना जंगल तो है ही, रंग-बिरंगे पक्षी भी बहुत हैं।
वे आगे बतलाते हैं कि इसके बाद महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले में लोक बिरादरी प्रकल्प हेमलकसा में काम किया। यह संस्था प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. प्रकाश आमटे व उनकी पत्नी डॉ. मंदाकिनी आमटे की है। यह स्वास्थ्य के अलावा सामाजिक क्षेत्र के कई काम करती है।
उन्होंने बताया कि एक दिन जंगल में साइकिल से घूमते-घामते अचानक पीले रंग का पक्षी देखा, इसे अंग्रेजी में गोल्डन ओरिएल ( पीलक) कहते हैं। यह बहुत ही आकर्षक व सुंदर था। इससे उनकी पक्षी देखने में दिलचस्पी बढ़ी। रोज़ सुबह-शाम सैर करना। साइकिल और कैमरा लेकर निकल पड़ना, फोटो खींचना और पक्षियों की पहचान करना, यह सब दिनचर्या का हिस्सा बन गया।
लोकेश तमगीरे ने बताया कि वर्ष २०१९ में सेवाग्राम वर्धा आ गए। यह गांधीजी की कर्मस्थली है। गांधी के विचारों से प्रेरणा मिली। इस पहल में प्रकृति, पर्यावरण व जैव विविधता का संरक्षण भी जुड़ गया। इसके बाद कोविड-१९ का दौर आ गया। देशव्यापी तालाबंदी हो गई। इस दौरान 'भारत के बर्डमैनÓ विख्यात पक्षी विज्ञानी सालिम अली की किताबें पढ़ीं। यहां व्यवस्थित तरीके से वीडियो बनाना शुरू किया।
इस बीच उनकी बेटी ३ साल की हो गई, उसे भी साइकिल पर बिठाकर सैर कराने ले जाते थे। पक्षी देखना, आवाजें सुनना, उसे बहुत ही अच्छा लगता था। वह ३ साल की उम्र में ७-८ पक्षियों की आवाज पहचान लेती थी। बच्चों के विकास में भी पक्षी अवलोकन बहुत मददगार है, यह उन्होंने अनुभव किया। वह उन्हें संवेदनशील बनाता है। अब तक ५० पक्षियों की आवाज़ सुनकर उन्हें पहचानना सीख लिया था।
पक्षी भी हमारी तरह प्रकृति का हिस्सा हैं। पक्षी परागीकरण में, खाद्य श्रृंखला में, फसलों के कीट नियंत्रण में बहुत उपयोगी हैं। जंगल को बढ़ाने के लिए भी पक्षियों का योगदान है। कई पेड़ों के बीज पक्षी खाते हैं और उनकी विष्ठा के माध्यम से ये बीज मिट्टी में मिल जाते हैं, जब नमी मिलती है, तब अंकुरित हो जाते हैं। इस तरह नया पेड़ बनता है। पक्षियों की विष्ठा खेतों को उर्वर बनाती है। कौंआ, चील और गिद्ध अच्छे सफाईकर्मी की तरह काम करते हैं।
पंछियों की आवाज, पक्षी संगीत स्पष्ट रूप से किसी भी व्यक्ति की मनोदशा, मानसिक स्वास्थ्य और शरीर पर सकारात्मक प्रभाव डालता है। कई जगह यह देखा गया है कि इससे तनाव, चिंता और अवसाद काफी हद तक कम होता है। इस कारण आजकल मानसिक स्वास्थ्य के लिए 'बर्डस साऊंड थैरेपीÓ का इस्तेमाल किया जा रहा है।
कुल मिलाकर, पक्षी अवलोकन कई तरह से उपयोगी है। परिवेश व पर्यावरण के प्रति जागरुकता तो इससे बढ़ती ही है, पक्षी प्रेम और उनके प्रति संवेदनशीलता भी बढ़ती है। इससे जैव विविधता व पर्यावरण का संरक्षण तो होता ही है, टिकाऊ विकास का नजरिया भी मजबूत होता है। मानसिक स्वास्थ्य में भी पक्षी संगीत मददगार है। विशेषकर, जलवायु बदलाव के दौर में यह पहल बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है, जब गर्मी पड़ने के कारण पक्षियों का जीवन संकट में है, पीने के लिए पानी का अभाव है, तब पक्षियों के प्रति जागरुकता सार्थक व उपयोगी है। क्या हम उनसे जुड़ना चाहेंगे?