मतदाताओं को सीधे कैश ट्रांसफर मामले की सुनवाई से सुप्रीम कोर्ट का इंकार

कोर्ट ने चुनावी हार, सीटों के नुकसान, या प्रचार पाने का •िाक्र करते हुए राजनीतिक टिप्पणी को कानूनी क्षेत्राधिकार के साथ मिलाकर गलती की है।

Update: 2026-02-08 21:00 GMT

— डॉ. ज्ञान पाठक

कोर्ट ने चुनावी हार, सीटों के नुकसान, या प्रचार पाने का •िाक्र करते हुए राजनीतिक टिप्पणी को कानूनी क्षेत्राधिकार के साथ मिलाकर गलती की है। अदालतों से उम्मीद की जाती है कि वे राजनीतिक लोकप्रियता को संवैधानिक न्याय से अलग रखें। 'व्यवस्थित प्रभाव डालने' की जांच किए बिना याचिका पर सुनवाई से इंकार करना भी गलत है

सर्वोच्च न्यायालय का चुनाव के दौरान चुनावी आदर्श आचार संहिता (एससीसी) लागू होने के बाद मतदाताओं को सत्ता प्रतिष्ठान द्वारा सीधे कैश ट्रांसफर, भारतीय चुनाव आयोग का इस तरह से चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन पर आंखें मूंद लेना, और मतदान के दिन लाभार्थियों को चुनाव ड्यूटी पर लगाने को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई से इंकार करना अनुचित है क्योंकि इसमें पहचानने योग्य कानूनी कमजोरियां हैं और साथ ही राजनीतिक रंग भी, जिसने एक याचिकाकर्ता राजनीतिक पार्टी को चुनाव में उसकी विफलता के लिए उपहासपूर्ण टिप्पणी की, जबकि आरोप के गुण-दोष में जाए बिना इसे न सुनने के लिए एक आधार बनाया भी बनाया।

शुक्रवार (6 फरवरी) को जाने-माने राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर द्वारा स्थापित जन सुराज पार्टी (जेएसपी) द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई से इंकार करते हुए, भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने याचिकाकर्ता को पटना उच्च न्यायालय जाने का निर्देश दिया। याचिकाकर्ता ने 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव को रद्द करने और सत्तारूढ़ प्रतिष्ठानों द्वारा चुनाव जीतने के लिए अपनाई गई भ्रष्ट प्रथा को रोककर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए उचित दिशानिर्देश बनाने और समुचित निर्देश देने की मांग की थी।

सबसे परेशान करने वाली बात मुख्य न्यायाधीश की राजनीतिक टिप्पणी थी, 'आपकी राजनीतिक पार्टी को कितने वोट मिले? लोग आपको खारिज करते हैं और आप लोकप्रियता पाने के लिए न्यायिक मंच का इस्तेमाल करते हैं। ... हम पूरे राज्य के लिए एक साथ निर्देश जारी नहीं कर सकते, वह भी किसी राजनीतिक पार्टी की पहल पर।'

जेएसपी ने याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि बिहार सरकार ने मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत महिला लाभार्थियों को 10,000 रुपये हस्तांतरित करके चुनावी आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन किया, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्चुअली लॉन्च किया था। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि कर्ज में डूबे राज्य ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 324 और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 123 का उल्लंघन करते हुए मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए 15,600 करोड़ रुपये बांटे।

हम जानते हैं कि जेएसपी एक भी सीट नहीं जीत पाई और उसके ज़्यादातर उम्मीदवारों की ज़मानत ज़ब्त हो गई, लेकिन यह भी सच है कि जेएसपी को 16 लाख से ज़्यादा वोट मिले, जो कुल डाले गए वैध मतों का 3.34 प्रतिशत था। इसका मतलब है कि जेएसपी राज्य के इतने सारे लोगों की आवाज़ है, और इसलिए इसे यूं ही खारिज नहीं किया जा सकता।

याचिकाकर्ता की चुनावी विफलता और पब्लिसिटी की कथित तलाश के बारे में कोर्ट की बात में और भी कमियां हैं, जैसे कि संवैधानिक न्यायशास्त्र चुनावी सफलता को कानूनी हैसियत के लिए एक मानदंड के रूप में नहीं मानता, या विफलता को न्याय मांगने के अधिकार की ज़ब्ती के रूप में भी नहीं मानता। ऐतिहासिक रूप से, कई बड़े संवैधानिक मामले उन लोगों द्वारा लाए गए थे जो राजनीतिक रूप से हाशिये पर थे।

इसलिए, किसी कानूनी याचिका की स्वीकार्यता तय करते समय याचिकाकर्ता की चुनावी लोकप्रियता को तौलना, संवैधानिक न्यायनिर्णय में एक व्यक्तिपरक और गैर-कानूनी मानक लाने का जोखिम है। न्यायपालिका से उम्मीद की जाती है कि वह दावों पर फैसला करे, न कि इरादों पर। कोर्ट मामले का गुणदोष सुने बिना इरादे के बारे में कैसे फैसला कर सकता है? राजनीतिक रूप से असफल पार्टियों को भी चुनाव के दौरान आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन जैसे मुद्दे उठाने का अधिकार है, क्योंकि वे निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव को नष्ट करते हैं और जिससे सभी राजनीतिक पार्टियों को चुनाव मैदान में समान अवसर नहीं मिलता और वे इस गड़बड़ी के शिकार होते हैं।

कोर्ट की दूसरी टिप्पणियों के बारे में आलोचकों ने एक और टिप्पणी पर सवाल उठाया है जैसे कि 'किसी को तो उस योजना को ही चुनौती देनी चाहिए थी। वह हमारी प्रार्थना नहीं है। आप बस चुनाव को रद्द घोषित करवाना चाहते हैं,' मुख्य न्यायाधीश ने कह यह भी जोड़ते हुए, 'हम मुफ्त की ची•ाों के मुद्दे पर विचार करेंगे। लेकिन हमें नेक इरादे भी देखने होंगे... हम किसी ऐसी पार्टी के कहने पर ऐसा नहीं कर सकते जो अभी-अभी चुनाव हारी है। जब आप सत्ता में आएंगे, तो आप भी ठीक वैसा ही करेंगे।Ó

आखिरी टिप्पणी को पहले लेते हैं। किसी राजनीतिक पार्टी से यह कहना कि जब आप सत्ता में आएंगे, तो आप भी ठीक वैसा ही करेंगे, यह सिर्फ कोर्ट की कल्पना है, और यह एक ज्योतिषीय भविष्यवाणी की तरह है, न कि कोई ठोस कानूनी विचार। कोर्ट को ऐसी अटकलबाज़ी वाली भाषा का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। यह किसी के कुछ गलत करने से पहले ही उसे नीचा दिखाना है।

एक राजनीतिक पार्टी लोकतंत्र में एक स्टेक होल्डर होती है, और शायद मुख्य न्यायाधीश का यह कहना सही नहीं हो सकता कि 'हम उस पार्टी के कहने पर (फ्री बीज़ के मुद्दे को) नहीं देख सकते जो अभी-अभी चुनाव हारी है।Ó कोर्ट ने कहा कि फिर हमें नेक इरादे भी देखने होंगे। यह समझना मुश्किल है कि चुनाव हारने वाली राजनीतिक पार्टी द्वारा आदर्श आचार संहिता के साफ तौर पर उल्लंघन वाले मुद्दे को उठाना नेक इरादा क्यों नहीं है। देश का कोई भी नागरिक नेक इरादे वाला होता है, जब तक यह सिद्ध न हो कि उसके इरादे गलत हैं, और इसलिए उसकी बात सुनी जानी चाहिए, वैसी स्थिति में भी जब वह अपने प्रयासों में पूरी तरह विफल रहे।

यह याचिका भारत के संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर की गई थी, जो मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए सीधे सर्वोच्च न्यायालय में जाने की अनुमति देता है, लेकिन कोर्ट ने कहा कि सही उपाय हाई कोर्ट में याचिका दायर करना था क्योंकि यह 'राज्य-विशिष्ट' था। हालांकि, सिर्फ राज्य-विशिष्ट होने से अनुच्छेद 32 अपने आप अनुपलब्ध नहीं हो जाता, खासकर जहां अनुच्छेद 324 के तहत स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव और अनुच्छेद 14 के तहत समानता जैसे संवैधानिक अधिकारों का कथित तौर पर उल्लंघन किया गया हो।

कोर्ट ने इस बात की जांच ही नहीं की कि चुनावी आदर्श आचार संहिता के कथित उल्लंघन को भ्रष्ट आचरण माना जा सकता है या नहीं। ठीक इसी कारण से, याचिका पर सुनवाई से इनकार करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को राजनीतिक विचारों पर आधारित माना जा रहा है, यानी पार्टी की चुनावी सफलता की कमी, और आरोपों की कानूनी खूबियों के आकलन के बजाय क्षेत्राधिकार जैसी प्रक्रियात्मक तकनीकी बातों के आधार पर।

सर्वोच्च न्यायालय का यह विचार कि यह एक चुनावी विवाद जैसा लग रहा था और इसलिए इसे हाई कोर्ट द्वारा तय किया जाना चाहिए, केवल आंशिक रूप से सही है, और सिद्धांत रूप में गलत नहीं हो सकता है। हालांकि, जब स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के व्यवस्थित उल्लंघन, सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग, मतदाताओं को बड़े पैमाने पर प्रलोभन या रिश्वत, अनुच्छेद 14 के तहत समानता का उल्लंघन, और अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत चुनावी पसंद में विकृति जैसे आरोप शामिल होते हैं, तो सर्वोच्च न्यायालय का इंकार सही नहीं है। यह खासकर तब है जब सर्वोच्च न्यायालय पहले ही यह तय कर चुका है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव भारत के संविधान की मूल संरचना का हिस्सा हैं।

कोर्ट ने चुनावी हार, सीटों के नुकसान, या प्रचार पाने का •िाक्र करते हुए राजनीतिक टिप्पणी को कानूनी क्षेत्राधिकार के साथ मिलाकर गलती की है। अदालतों से उम्मीद की जाती है कि वे राजनीतिक लोकप्रियता को संवैधानिक न्याय से अलग रखें। 'व्यवस्थित प्रभाव डालने' की जांच किए बिना याचिका पर सुनवाई से इंकार करना भी गलत है क्योंकि याचिकाकर्ता ने चुनावी पसंद में व्यवस्थित विकृति का मुद्दा उठाया था जो एक संवैधानिक मुद्दा है, और यह व्यक्तिगत भ्रष्ट आचरण नहीं है जिसे चुनाव याचिकाओं द्वारा निपटाया जाना चाहिए। कोर्ट का इंकार अपने ही संवैधानिक मिसालों और फैसलों के अनुरूप नहीं है। कमजोर या अलोकप्रिय याचिकाकर्ता भी संवैधानिक कमियों को उजागर कर सकते हैं। उन कमियों की शुरुआत में ही जांच करने से इंकार करके, कोर्ट ने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के संरक्षक के रूप में अपनी भूमिका से पीछे हटने के बजाय उसे मजबूत करने का अवसर खो दिया है।

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