कमजोर मोदी को सहारा देते कांग्रेस के नेता

कांग्रेस अपने ऐसे विश्वासघातियों के खिलाफ कोई एक्शन नहीं लेती है। केवल कहती रहती है। इससे इस तरह के लोगों के हौसले बढ़ते रहते हैं।

Update: 2026-04-05 21:50 GMT

शकील अख्तर

कांग्रेस अपने ऐसे विश्वासघातियों के खिलाफ कोई एक्शन नहीं लेती है। केवल कहती रहती है। इससे इस तरह के लोगों के हौसले बढ़ते रहते हैं। 2014 के बाद कितने ही नेता भाजपा में गए। मध्यप्रदेश में सरकार तोड़ी। कांग्रेस नरेटिव (धारणा) की लड़ाई का महत्व अभी भी नहीं समझ रही है। वह सत्य जितेगा के सिद्धांत पर डटी हुई है।

भारत की विदेश नीति जब पूरी तरह लड़खड़ा रही है तो उसे सहारा देने का काम भी कांग्रेस के नेता कर रहे हैं। पांच राज्यों में चुनाव का समय, एलपीजी की भंयकर कमी, लाक डाउन की तरह ही मजदूर, खाने-पीने का काम करने वाले छोटे दूकानदार, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे स्टूडेंटों का शहर छोड़ कर जाना, खाड़ी देशों सहित ईरान में फंसे भारतीय और मोदी सरकार की लंबी चुप्पी से पैदा घबराहट और अनिश्चितता जैसे बड़े सवालों पर बोलने के बजाय कांग्रेस के कुछ नेता अपनी ही पार्टी के खिलाफ बोलकर इस मौके का फायदा उठाने में लग गए हैं।

मोदी की विदेश नीति जो पूरी तरह अमेरिका और ईरान के प्रति झुकी हुई है और जिस की वजह से ईरान गैस और तेल लिए भारत के एक-एक जहाज को इस मैसेज के साथ हार्मुंज स्ट्रेट जलडमरूमध्य से निकलने दे रहा है कि भारत की जनता हमारे साथ है। भारत हमारा दो हजार साल पुराना दोस्त है। अहसान तो वह नहीं जता रहा मगर उलाहना तो है!

और ऐसे समय में कांग्रेस के पांच नेता भारतीय जनता की एलपीजी समस्याओं और अपनी पार्टी की ईरान की जनता के साथ एकजुटता को नजरअंदाज करके कह रहे हैं कि मोदी की विदेश नीति सही है। कौन सी नीति वह जिसकी वजह से भारत में एलपीजी और तेल की समस्या हो रही है? जिस व्यक्ति आधारित विदेश नीति की वजह से भारत दुनिया में अलग-थलग पड़ गया है। अभी आपरेशन सिंदूर के समय एक देश भी भारत के समर्थन में नहीं आया था। वह अमेरिका भी नहीं जिसके दबाव में प्रधानमंत्री मोदी आजकल सारे फैसले ले रहे हैं। जिस अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय सेना की निर्णायक हो रही जीत के समय सीज फायर करवा दिया। जैसे ईरान पर हमला किया वैसे ही गुंडागर्दी की भाषा बोलते हुए कि स्टाप इट!

भारत की जनता को बता रहे हैं तुम्हारा प्रधानमंत्री मुझे सर सर करके बोलता है। मैं उसका पोलिटिकल कैरियर तबाह कर सकता हूं। मगर वह मुझे प्यार करता है इसलिए करूंगा नहीं।

आश्चर्य की बात है कि ऐसे समय में जब भारत और भारत की जनता दोनों का अपमान लगातार ट्रंप कर रहा है और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी इसके खिलाफ आवाज उठा रहे हैं तो कांग्रेस के नेता मोदी और ट्रंप को बचाने के लिए राहुल और कांग्रेस पर ही सवाल उठा रहे हैं।

कौन हैं यह नेता। वे जो यूपीए के समय में मंत्री रहे। सत्ता सुख भोगा। और अब जब पार्टी को साथ खड़े होकर लड़ने वालों की जरूरत है तो यह पार्टी की पीठ में छूरा घोंपकर भागने की तैयारी में है। कमलनाथ तो भाग ही गए थे। मगर मोदी ने वापस भगा दिया। इन्हीं को मुख्यमंत्री बनाने के चक्कर में कांग्रेस ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को गंवाया था। केन्द्र में मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक क्या-क्या नहीं दिया।

आनंद शर्मा जिन्हें दस साल यूपीए सरकार में मंत्री बनाकर रखा उसके बाद राज्यसभा में पार्टी का उपनेता और अभी 2024 में हिमाचल से टिकट दिया वे। शशि थरुर ये न केवल मनमोहन सिंह सरकार में मंत्री रहे बल्कि उस समय कांग्रेस की नीति- आम नागरिक की तरह हवाई जहाज की सामान्य श्रेणी में चलो के खिलाफ यह कहने वाले कि मैं कैटल क्लास ( जानवरों की श्रेणी) में यात्रा नहीं कर सकता के बावजूद माफ कर दिए जाने वाले और 2024 में फिर लोकसभा में सांसद बनाए जाने वाले।

मणिशंकर अय्यर राजीव गांधी द्वारा अपने सहयोगियों की निकटतम टीम में शामिल किए जाने वाले, यूपीए में मंत्री बनाए जाने वाले, मोदी के खिलाफ उस लेवल की टिप्पणी करने वाले जैसी खुद मोदी करते हैं और कांग्रेस सख्त नापसंद करती है। याद रहे कि अय्यर की टिप्पणी के बाद पार्टी ने उन्हें सस्पेंड कर दिया था।

और अश्विनी कुमार जिनका किसी तरह का कोई आधार नहीं था वे मंत्री भी बने और पंजाब का होने का फायदा उठाकर मनमोहन सिंह के नजदीक भी पहुंचे वे। यह सब ऐसे समय में मोदी के समर्थन में आए हैं जब उनकी पार्टी और संघ में भी एपस्टीन फाइल, मधु किश्वर और सुब्रमण्यम स्वामी के आरोपों और अमेरिका से डील को लेकर बैचेनी है।

कांग्रेस अपने ऐसे विश्वासघातियों के खिलाफ कोई एक्शन नहीं लेती है। केवल कहती रहती है। इससे इस तरह के लोगों के हौसले बढ़ते रहते हैं। 2014 के बाद कितने ही नेता भाजपा में गए। मध्यप्रदेश में सरकार तोड़ी।

कांग्रेस नरेटिव (धारणा) की लड़ाई का महत्व अभी भी नहीं समझ रही है। वह सत्य जितेगा के सिद्धांत पर डटी हुई है। मगर इस व्यवहारिकता को नहीं समझ रही कि जब तक सत्य जितेगा तो वह हाल हो चुका होगा कि सत्य की जीत को सेलिब्रेट करने वाला भी कोई बचेगा या नहीं!

जब भी मोदी को जरूरत होती है कांग्रेस के ऐसे जयचंद उनके समर्थन में खड़े हो जाते हैं। मैसेज यह जाता है कि मोदी की लोकप्रियता कम नहीं हुई है। जबकि आज की तारीख में प्रधानमंत्री मोदी सबसे कमजोर विकेट पर हैं। घरेलू और बाहरी दोनों मोर्चों पर उनकी कमजोरियां सामने आ गई हैं। विश्वगुरु बन रहे थे मगर ईरान पर हमले के खिलाफ एक शब्द नहीं बोल सके।

विदेश नीति जिसकी तारीफ कांग्रेस के ये नेता कर रहे हैं इतनी भ्रमित हो चुकी है कि किसी भी देश को यह नहीं लग रहा कि भारत उसके साथ खड़ा है या उसका कोई स्टैंड है। यह तटस्थता या निष्पक्षता नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी के अपने व्यक्तिगत कारणों से जिसे राहुल कहते हैं आने वाले एपस्टीन फाइलों के खुलासों से भय की किंकर्तव्यविमूढ़ता है। क्या करूं क्या न करूं का भयाकुल भाव है। जिसका सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ कि जिस पाकिस्तान को मनमोहन सिंह सरकार ने दुनिया में अलग-थलग कर दिया था वह अपनी पैदाइश के बाद पहली बार अन्तरराष्ट्रीय रूप से एक भूमिका में दिखने लगा है।

उसने ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की हत्या की निंदा की। स्कूली बच्चियों को मारने की निंदा की। और दूसरी तरफ अपने यहां कई देशों के कूटनीतिज्ञों को जोड़कर युद्ध खतम करने के लिए समझौता वार्ता का माहौल भी बनाता रहा। अमेरिका से भी संबंध मजबूत रखे। और भारत के लिए उसी की तरह शत्रुतापूर्ण रवैया रखने वाले चीन से उसके संबंध मजबूत है हीं।

मोदी की भारी कूटनीतिक असफलता। पाकिस्तान का प्रभाव बढ़ना। अमेरिका हर मौके पर साफ कर चुका है कि उसका साफ्ट कार्नर पाकिस्तान के साथ है। 1971 से लेकर जब पाकिस्तान के साथ युद्ध में वह सीधी अपनी नौसेना ( सातंवा बेड़ा) उस की मदद के लिए पहुंचा रहा था से लेकर अभी आपरेशन सिंदूर तक।

पाकिस्तान के आर्मी चीफ मुनीर को राष्ट्रपति ट्रंप व्हाइट हाउस बुलाकर लंच खिला रहे थे। काहे के लिए? पहलगाम में निरीह नागरिकों पर आतंकवादी हमले के लिए? हालांकि ट्रंप का किया उसके सामने फौरन आ गया। भारत को बार-बार बता रहे थे कि आपरेशन सिंदूर में इतने जहाज गिरे और अब उनके फाइटर जेट गिरने की गिनती सामने आने लगी है। अमेरिकी फौज में और वहां की जनता में ट्रंप के अकारण ईरान पर हमले पर सवाल खड़े होना शुरू हो गए हैं।

दबाव इतना है कि जब हम यह लिख रहे हैं तब अमेरिका में उनके स्वास्थ्य को लेकर कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। पिछले चौबीस घंटे से उनके सारे सार्वजनिक प्रोग्राम कैंसिल बताए जा रहे हैं। दो महीने बाद वे 80 के होने वाले हैं।

यह उम्र थी दुनिया में शांति के लिए काम करने की। मगर वे दुनिया में युद्ध की आग भड़का रहे हैं। असर सब तरफ है। भारत पर बहुत ज्यादा। राहुल इस सवाल को उठा रहे हैं। उनकी बात को कमजोर करने के लिए भाजपा तो कामयाब हो नहीं रही है मगर कांग्रेस के अंदर से लोग खड़े हो गए हैं कि राहुल गलत हैं। अगर कांग्रेस गलत है तो छोड़ दो। मगर मालूम है कि वहां कुछ मिलेगा नहीं। क्योंकि अनुपयोगी लोग हैं। सब कोशिश कर चुके हैं। कमलनाथ, शशि थरूर, आनंद शर्मा। अश्विनी तो किसी गिनती में ही नहीं हैं। ऐसे बेकार के लोगों को कांग्रेस ही महत्व देती रही है। अब भी उनसे कोई कहने वाला नहीं है कि बाहर जाने का रास्ता इधर से है!

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)

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