भारत की विदेश नीति में बिखराव और दिशाहीनता का दौर
अमेरिका से ठंडे रिश्तों को देखते हुए भारत ने चीन की तरफ नए सिरे से पहल की है। वैसे, यहां भी दांव उल्टे साबित हो रहे हैं
- राजेश पांडेय
अमेरिका से ठंडे रिश्तों को देखते हुए भारत ने चीन की तरफ नए सिरे से पहल की है। वैसे, यहां भी दांव उल्टे साबित हो रहे हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था को धीरे-धीरे चीन के लिए खोलने पर विचार किया जा रहा है। चीनी कामगारों के लिए बिजनेस वीजा प्रक्रिया को सरल किया जा चुका है। निवेश से जुड़े कुछ प्रतिबंधों को हटाने की तैयारी है।
पिछले कुछ वर्षों से भारत की विदेश नीति दिशाहीनता और अनिर्णय के घेरे में है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हमारी आवाज पहले जैसी असरदार नहीं रही। बीते कुछ समय का घटनाक्रम अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की कमजोर तस्वीर पेश करता है। वर्तमान स्थिति को समझने के लिए अतीत पर गौर करना जरूरी है। कुछ उदाहरण बताते हैं कि पहले भारत को अमेरिका तक हल्के में नहीं ले सकता था। 1950 से 1990 के बीच आर्थिक रूप से बहुत ताकतवर नहीं होने के बावजूद भारत का महत्व था। दो महाशक्तियों-अमेरिका और सोवियत संघ के मध्यशीत युद्ध के दौर में देश की प्रासंगिकता बनी रही। पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की अगुआई में गुटनिरपेक्ष आंदोलन ने देशों के बीच तनाव खत्म करने में अहम भूमिका निभाई थी। निर्गुट देशों की पहल से अफ्रीका के कई देशों को आजादी मिली। दक्षिण अफ्रीका में रंगभेदी शासन खत्म करने में उसकी निर्णायक भूमिका रही। एशिया, अफ्रीका और लेटिन अमेरिका के कई देशों को शांति, अहिंसा और मानवता के भारतीय मूल्य प्रेरित करते थे। हालांकि, 1962 में चीन से अपमानजनक पराजय के बाद भारत की साख को आघात लगा था। लेकिन, 1971 में पाकिस्तान से युद्ध में निर्णायक विजय ने भारत का दबदबा बढ़ाया। इंदिरा गांधी के साहस और कूटनीतिक पहल से बांग्लादेश अस्तित्व में आया। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद वह पहला मौका था जब विश्व के नक्शे पर किसी नए देश का उदय हुआ था।
पाकिस्तान से युद्ध छिड़ने से पहले भारत ने हर मोर्चे पर दूरदर्शिता दिखाई थी। भारत का पक्ष रखने के लिए जबर्दस्त कूटनीतिक अभियान छेड़ा गया। खुद इंदिरा गांधी ने अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी सहित कई देशों की यात्रा की थी। उनके अलावा विदेश मंत्री स्वर्ण सिंह और अन्य राजनयिकों ने वैश्विक नेताओं को समझाया कि तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में पाक सेना के जनसंहार और अत्याचारों की वजह से लगभग एक करोड़ शरणार्थी भारत आ चुके हैं। इस बीच भारत ने सोवियत संघ (अब रूस)से सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण शांति संधि कर ली। इसमें प्रावधान था कि दोनों में से किसी भी देश पर हमले को एक-दूसरे पर हमला माना जाएगा। इस वजह से युद्ध में अमेरिका हस्तक्षेप नहीं कर सका था। उस वक्त इंदिरा गांधी की दृढ़ता ने अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को बेबस कर दिया था। अमेरिका ने भारत पर दबाव डालने के लिए नौसेना का सातवां बेड़ा बंगाल की खाड़ी में तैनात किया। युद्ध खत्म हो गया। बांग्लादेश बन गया। पाकिस्तान की अपमानजनक हार हो गई लेकिन अमेरिका की दखल देने की हिम्मत नहीं पड़ी थी।
नवंबर 1971 में निक्सन से मुलाकात में इंदिरा गांधी के सख्त तेवरों की झलक तब के अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी कीसिंजर के संस्मरणों में मिलती है। कीसिंजर लिखते हैं, इंदिरा गांधी के जाने के बाद जब मैं राष्ट्रपति से मिला तो उनका चेहरा पीला पड़ गया था। वे कुछ देर तक खामोश बैठे रहे।
इन घटनाओं पर नजर डालते हुए आज की स्थिति देखिए। अमेरिका ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी का अपहरण कर लिया। उन्हें न्यूयॉर्क की एक जेल में रखा गया है। इस मामले में भारत सरकार ने अपनी प्रतिक्रिया में अमेरिका का नाम तक लेने से परहेज किया है। विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा कि, हम घटनाओं पर नजर बनाए हुए हैं। सभी पक्षवार्ता से मसले को सुलझाने का प्रयास करें। भारत तो अमेरिका की मिजाज़पुर्सी कर रहा है लेकिन ट्रम्प पर अब तक कोई असर नहीं पड़ा है। वे लगातार भारत की अनदेखी कर रहे हैं।
ट्रम्प बार-बार पिछले साल ऑपरेशन सिंदूर के बीच हुए भारत-पाक टकराव को रोकने का श्रेय लेते हैं। जबकि भारत का कहना है कि किसी पक्ष की मध्यस्थता के कारण संघर्षविराम नहीं हुआ था। अमेरिकी टैरिफ के दबाव में भारत ने रूस से तेल की खरीद काफी कम कर दी है। 2019 में प्रतिबंधों की धमकी के बाद ईरान से भी तेल की खरीद बंद कर दी गई थी। वहीं चीन ने तेल की खरीद जारी रखी है। डोनाल्ड ट्रम्प प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना अच्छा दोस्त कहते नहीं थकते हैं। मोदी ने तो अमेरिका जाकर ट्रम्प के पक्ष में चुनाव प्रचार किया था। यह राजनीतिक और कूटनीतिक दृष्टि से वाजिब नहीं था। भारत के नीति-निर्माताओं ने नहीं सोचा कि कूटनीति के तकाजे में निजी रिश्तों के कोई मूल्य नहीं होते हैं। बहरहाल, ट्रम्प ने भारत को एक और झटका दिया है। खबर है कि भारत को अप्रैल तक ईरान के चाबहार बंदरगाह के काम से हाथ समेटना पड़ेगा। इस बंदरगाह से भारत को पश्चिम एशिया से होते हुए यूरोप तक आसान पहुंच मिल सकती है। चाबहार से हटने पर भारत के सामरिक और व्यावसायिक हितों को नुकसान होगा।
अमेरिका से ठंडे रिश्तों को देखते हुए भारत ने चीन की तरफ नए सिरे से पहल की है। वैसे, यहां भी दांव उल्टे साबित हो रहे हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था को धीरे-धीरे चीन के लिए खोलने पर विचार किया जा रहा है। चीनी कामगारों के लिए बिजनेस वीजा प्रक्रिया को सरल किया जा चुका है। निवेश से जुड़े कुछ प्रतिबंधों को हटाने की तैयारी है। चीन भारत के विशाल बाजार से फायदा उठाने के लिए थोड़ी रियायतें देता रहता है। हालांकि, वह सामरिक तौर पर अपनी नीतियों से पीछे नहीं हट रहा है। वह अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा दोहराता है। अभी हाल में उसने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में शक्सगाम घाटी पर भारत के दावे को नामंजूर कर दिया है। 1963 में पाक ने एक समझौते के तहत सियाचिन ग्लेशियर के पश्चिम में स्थित पांच हजार वर्ग किलोमीटर में फैली शक्सगाम घाटी चीन को दे दी थी। 9 जनवरी को भारत ने घाटी में चीन-पाकिस्तान इकानॉमिक कॉरिडोर के तहत चीन के निर्माण को अवैध बताया था। भारतीय प्रवक्ता ने कहा कि शक्सगाम भारत का अभिन्न अंग है। जवाब में चीनी विदेश मंत्रालय ने कहा कि यह इलाका हमारा है।
भारत और चीन के बीच सीमाओं को लेकर तनातनी वर्षोंं से जारी है। फिर भी कारोबार अंधाधुंध रफ्तार से दौड़ रहा है। नए आंकड़ों के मुताबिक 2025 में चीन से भारत का व्यापार घाटा 10 लाख करोड़ रुपए के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। यहां 11 जनवरी को भाजपा और आरएसएस के नेताओं से चीन की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी के प्रतिनिधि मंडल की मुलाकात पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। 2017 में कांग्रेस नेता राहुल गांधी से चीन के राजदूत की मुलाकात पर भाजपा ने जमकर एतराज जताया था। भाजपा ने इसे दोनों देशों के बीच संबंधों में सुधार का नतीजा बताया है। दो देशों के राजनीतिक दलों के बीच संवाद में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए। यह सामान्य गतिविधि है। इसलिए भाजपा का चीन के राजदूत से राहुल गांधी की मुलाकात पर आसमान सिर पर उठाना और अपने नेताओं से चर्चा को सामान्य बताना विरोधाभासी है।
एनडीए सरकार अमेरिका, चीन के दबाव को चुपचाप सहन करती है या कमजोर प्रतिक्रिया दिखाती है। लेकिन कमजोर देशों पर वह बरस पड़ती है। उसकी कूटनीतिक कमजोरी सामने रखने के लिए एक-दो उदाहरण काफी हैं। लंबे समय तक बांग्लादेश से भारत के मधुर रिश्ते रहे हैं। अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार का पतन होने के बाद वहां भारतविरोध की आग भड़क उठी है। हिंदुओं को निशाना बनाया जा रहा है। बांग्लादेश में इस वक्त कट्टरपंथी तत्वों का बोलबाला है। कुछ हिंदुओं की हत्या के बाद भारतीय क्रिकेट कं ट्रोल बोर्ड ने इंडियन प्रीमियर लीग की टीम कोलकाता नाइट राइडर्स में बांग्लादेश के खिलाड़ी मुस्तफिजुर रहमान के खेलने पर पाबंदी लगा दी। मुस्तफिजुर के खिलाफ सोशल मीडिया पर जमकर मुहिम छेड़ी गई। मुस्तफिजुर को हटाए जाने के बाद बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने जवाबी कार्रवाई की। उसने फरवरी में भारत में होने वाले टी-20 वर्ल्डकप मैचों के बायकॉट का ऐलान कर दिया। मुस्तफिजुर के खिलाफ भारत की कार्रवाई को सत्ताधारी दल की राजनीति का हिस्सा माना जा रहा है। पश्चिम बंगाल में विधानसभा के चुनाव इस साल हैं। लिहाजा, बांग्लादेश से भारत में घुसपैठ को मुख्य मुद्दा बनाने की पृष्ठभूमि तैयार हो चुकी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषणों में घुसपैठ का •िाक्रहोने लगा है।
इस हलचल के बीच 19 जनवरी को बांग्लादेश में चीन के राजदूत ने सामरिक रूप से महत्वपूर्ण सिलीगुड़ी कॉरिडोर में तीस्ता प्रोजेक्ट का दौरा किया। चीन इस प्रोजेक्ट में बांग्लादेश की मदद कर रहा है। भारत-बांग्लादेश के बीच तीस्ता नदी पानी के बंटवारे का मामला कई दशकों से अटका पड़ा है। पश्चिम बंगाल सरकार समझौते का विरोध कर रही है। बांग्लादेश ने चीनी राजदूत को तीस्ता प्रोजेक्ट की यात्रा कराकर अपने भारत विरोधी एजेंडा को धार देने की कोशिश की है। पोलैंड एक अन्य छोटा देश है जिसको भारत ने अभी हाल में सख्त मैसेज दिया है। पूर्व सोवियत संघ के समय पोलैंड सोवियत खेमे में था। अब वह अमेरिका का सहयोगी है। पोलैंड और पाकिस्तान के संबंध तेजी से बेहतर हो रहे हैं। पिछले साल अक्टूबर में पोलैंड के विदेश मंत्री रादोस्ला सिकोरस्की इस्लामा बाद गए थे। 19 जनवरी को जब सिकोरस्की नई दिल्ली में जयशंकर से मिले तो भारतीय विदेश मंत्री ने कहा कि उन्हें भारत के पड़ोस में आतंकवादी इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा देने की बजाय आतंकवाद के प्रति जीरो टॉलरेंस दिखाना चाहिए। जयशंकर पोलैंड जैसे छोटे देश को सख्त लहजे में समझा सकते हैं पर वे अमेरिका, चीन के मामले में कुछ नहीं बोलते हैं। इससे भारतीय विदेश नीति की कमजोरी सामने आती है। इन दिनों भारत को विश्वगुरू बनाने का जुमला अक्सर सुनाई पड़ता है। लेकिन थोथे बयानों, अपनी पीठ थपथपाने, विदेश यात्राओं मेंं नारे लगवा कर इमेज चमकाने से किसी देश की आवाज असरदार नहीं हो जाती है।