किसानों की टिकाऊ आजीविका की रक्षा को जलवायु बदलाव नियंत्रण से जोड़ रहा एक सार्थक प्रयास
इस तरह जो रचनात्मक उपलब्धियां बढ़ रही हैं, वे जलवायु बदलाव पर नियंत्रण के संदर्भ में भी सार्थक है।
भारत डोगरा
किसानों की टिकाऊ, आजीविका, रक्षा को जलवायु बदलाव नियंत्रण से जोड़ रहा एक सार्थक प्रयासA meaningful initiative linking the sustainable livelihoods and protection of farmers with climate change mitigation.,इस तरह जो रचनात्मक उपलब्धियां बढ़ रही हैं, वे जलवायु बदलाव पर नियंत्रण के संदर्भ में भी सार्थक है। जो किसान अपना खर्च कम कर रहे हैं, मिश्रित खेती अपना रहे हैं, जिनके गांवों में जल व मिट्टी संरक्षण हो रहा है वे सब जलवायु बदलाव के उतार-चढ़ाव का सामना करने में भी अधिक सक्षम हो रहे हैं। इन गांवों में रासायनिक खाद व कीटनाशक दवाओं का उपयोग भी कम हो रहा है।
देश के अधिकतम किसान छोटे किसान हैं जो अन्य समस्याओं के साथ मौसम में आ रहे अप्रत्याशित बदलावों को भी झेल रहे हैं। यदि उनकी टिकाऊ आजीविका की रक्षा को जलवायु बदलाव के नियंत्रण से भी जोड़ा जा सके, तो यह एक बहुत सार्थक पहल होगी। महोबा जिले (उत्तर प्रदेश) के जैतपुर प्रखंड के 50 गांवों में ऐसा ही एक प्रयास लगभग दो वर्षों से सृजन संस्था द्वारा हो रहा है जिसे एच.एफ.डी.सी. के 'परिवर्तन' प्रयास से सहयोग मिल रहा है।
इस प्रयास की बुनियाद में दो प्रमुख सोच हैं। पहली सोच यह है कि यदि जल व मिट्टी संरक्षण, वृक्षारोपण आदि के पर्यावरण रक्षा के प्रयास से ग्रामीण पर्यावरण में बेहतर सुधार कर लिया जाए तो इससे किसानों की टिकाऊ आजीविका की पृष्ठभूमि तैयार हो जाती है। तिस पर यदि प्राकृतिक खेती को फल व सब्जी के छोटे-छोटे बगीचों व आत्म-निर्भरता के तौर-तरीकों से आगे बढ़ाया जाए, तो किसानों का खर्च कम करने व स्वस्थ व अच्छी गुणवत्ता के उत्पाद प्राप्त करने के उद्देश्य भी साथ-साथ प्राप्त हो जाते हैं।
इस सोच को व्यवहारिक रूप देते हुए पिछले दो वर्षों में इस 'स्वावलंबन' प्रोजेक्ट के अन्तर्गत लगभग 24000 वृक्ष मानव-निर्मित सघन वनों में लगाए गए हैं, 210 फलों के बगीचे व 110 सब्जियों के बहु-स्तरीय बगीचे तैयार किए गए हैं। जल-संरक्षण के लिए वर्षा जल के प्राकृतिक निकासी नालों में मानवीकृत गड्ढे बनाए गए हैं जिन्हें दोहा कहा जाता है व जिनमें पानी वर्षा के महीनों बाद बचा रहता है। ऐसे 406 दोहे बनाए गए हैं, 11 चैक डैमों व 5 तालाबों की मरम्मत की गई है, 24 गेबियन व चैक डैम बनाए गए हैं, 220 कुंओं का पुनरुद्धार किया गया है। 528 एकड़ भूमि पर मेढ़बंदी व समतलीकरण कार्य पूरा किया गया है। बेहतर सिंचाई के लिए 214 स्प्रिंकलर सेट व 14 सौर ऊर्जा लिफ्ट सिंचाई के सेट उपलब्ध करवाए गए हैं। इसके अतिरिक्त गांवों में विशेषकर महिलाओं को संगठित कर विकास समितियां व किसान समूह बनाए गए हैं व महिला किसानों की महत्वपूर्ण भूमिका को प्रतिष्ठित किया गया है। इन समितियों में छोटे किसानों व कमजोर वर्गों को अधिक महत्व दिया गया है।
इन विभिन्न प्रयासों का सम्मिलित असर यह हुआ है कि अनेक गांवों के प्रतिभाशाली किसानों ने अनुकूल स्थितियों का लाभ उठाते हुए बहुत रचनात्मक संभावनाओं को आगे बढ़ाया है। सलैया माफ गांव में संतोष कुमार और वीना देवी ने आगे बढ़ कर प्राकृतिक खेती को अपनाया और साथ में अपना खर्च कम करते हुए उत्पादन को बढ़ा कर दिखाया। इसी गांव में श्याम सुंदर तेजी से इसी राह पर बढ़ रहे हैं। बेनीबाई ने बताया कि चैक डैम बनने से अब उस भूमि पर भी खेती हो रही है जो पहले बंजर थी। संजीव कुमार बहुत उत्साह से प्राकृतिक खेती का प्रचार कर रहे हैं। यही स्थिति नगारा डांग व बुधवारा गांवों की भी है। सुगीरा गांव में एक एकड़ भूमि पर सब्जी उगाते हुए अशोक कुशवाहा व हिमलेश देवी ने नई परिस्थितियों में अपनी इस भूमि से होने वाली आय को चार गुणा तक बढ़ा दिया। अशोक ने यह बताते हुए आंकड़े प्रस्तुत किया।
लमौरा गांव में स्वामी प्रसाद व कस्तूरी देवी के खेत में बने बहु-स्तरीय सब्जी के बगीचे को देखने आसपास के कई किसान आ रहे हैं। स्प्रिकंलर खेती व प्राकृतिक खेती के बल पर उनके रचनात्मक प्रयास आगे बढ़ रहे हैं व 8 बीघे में वे फ ल, सब्जी सहित लगभग 50 उत्पाद एक ही वर्ष में उगा रहे हैं। मिश्रित खेती, कीड़ों व बीमारियों को दूर रखने, उचित फसल-चक्र को अपनाने की उनकी गहरी समझ है। उनकी तरह कामता प्रसाद व मुन्नी का खेत भी किसानों के लिए एक प्रशिक्षण केन्द्र की तरह है। कामता प्रसाद व मुन्नी को तथा उनके संयुक्त परिवार के अन्य सदस्यों को इस परियोजना के अन्तर्गत जंगली जानवरों से रक्षा के लिए मजबूत लोहे की फेनसिंग मिली। इस तरह प्रतिकूल स्थितियों में भी उन्होंने अच्छे उत्पादन की प्राकृतिक खेती को आगे बढ़ाया। लखन लाल व विमला देवी ने अपने खेत पर ही जैविक खाद तैयार की व इसे अन्य किसानों को भी उपलब्ध करवाया।
इस तरह जो रचनात्मक उपलब्धियां बढ़ रही हैं, वे जलवायु बदलाव पर नियंत्रण के संदर्भ में भी सार्थक है। जो किसान अपना खर्च कम कर रहे हैं, मिश्रित खेती अपना रहे हैं, जिनके गांवों में जल व मिट्टी संरक्षण हो रहा है वे सब जलवायु बदलाव के उतार-चढ़ाव का सामना करने में भी अधिक सक्षम हो रहे हैं। इन गांवों में रासायनिक खाद व कीटनाशक दवाओं का उपयोग भी कम हो रहा है जिससे फॉसिल फ्यूल यानि जीवाश्म ईंधन का बोझ भी कम हो रहा है।
लाडपुर जैसे जिन गांवों में सौर लिफ्ट सिंचाई की व्यवस्था की गई है वहां भी किसानों का खर्च बहुत कम होने व सिंचाई में सुधार के साथ डीजल के रूप में फॉसिल फ्यूल का बोझ कम हुआ है। छोटे किसानों के लिए सस्ते उपकरणों जैसे पावर टिलर उपलब्ध करवाने के केन्द्र खोल गए हैं। पावर टिलर में ट्रैक्टर से कहीं कम डीजल का उपयोग होता है व इस तरह फॉसिल फ्यूल का बोझ और कम होता है। पेड़ों की संख्या बहुत बढ़ने के साथ मिट्टी की गुणवत्ता सुधरने से भी कार्बन सोखने की क्षमता बढ़ी है।
इस तरह किसानों की आजीविका की रक्षा व जलवायु बदलाव का सामना करने की क्षमता बढ़ाने के कार्य इस प्रोजेक्ट में साथ-साथ आगे बढ़ सके हैं जो उत्साहवर्धक है।