धरोहर या बोझः यूनेस्को के दर्जे पर उलझन में फंसा गांव
यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल होना दुनिया भर के गांवों का सपना होता है. लेकिन स्लोवाकिया के वकोइन्य गांव में कुछ लोग इस दर्जे से छुटकारा चाहते हैं. आखिर विश्व धरोहर का टैग यहां गर्व नहीं, बोझ क्यों बन रहा है;
यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल होना दुनिया भर के गांवों का सपना होता है. लेकिन स्लोवाकिया के वकोइन्य गांव में कुछ लोग इस दर्जे से छुटकारा चाहते हैं. आखिर विश्व धरोहर का टैग यहां गर्व नहीं, बोझ क्यों बन रहा है.
स्लोवाकिया का एक छोटा-सा गांव, जो यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है, पर्यटकों की बढ़ती भीड़ से तंग आकर अपना नाम सूची से हटवाना चाहता था. खबरों की सुर्खियों में यह कहानी जितनी सीधी लगती है उतनी है नहीं.
मध्य स्लोवाकिया के वकोइन्य की हकीकत कहीं अधिक पेचीदा है. स्थानीय निवासियों, अधिकारियों और सैलानियों से बातचीत से पता चलता है कि यह बहस वास्तव में यूनेस्को के बारे में कम और पर्यटन के बढ़ते दबाव के बीच गांव के सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने की रक्षा के बारे में अधिक थी.
बदलाव के तेज होते कदम
68 वर्षीय एंटोन साबूचा कहते हैं, "जो लोग विनम्रता के साथ यहां आते हैं, गांव की सुंदरता की सराहना करते हैं और यह समझना चाहते हैं कि यहां के लोग कैसे रहते थे, उनका हमेशा स्वागत है. वे मुझे परेशान नहीं करते. परेशानी तो उन लोगों से है जो सम्मान करना नहीं जानते."
लकड़ी के अपने घर के बाहर छज्जे के नीचे बैठे साबुचा गांव के इतिहास से जुड़ी एक किताब के पन्ने पलट रहे थे. वे उसमें अपने पड़ोसियों और रिश्तेदारों की तस्वीरें दिखाते हुए उनके बारे में बताते जा रहे थे. इसी बीच उनकी पत्नी तली हुई पारंपरिक मिठाइयों की एक ट्रे लेकर आ गईं.
वह याद करते हुए बताते हैं की वकोइन्य में लगभग 200 लोग रहा करते थे. अब केवल 17 ऐसे लोग बचे हैं, जो साल भर यहां रहते हैं.
वकोइन्य की आज की पर्यटन से जुड़ीं चुनौतियों के लिए यूनेस्को को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. इस गांव की सांस्कृतिक और स्थापत्य विरासत को 1977 में ही, कम्युनिस्ट शासन के दौर में, विशेष संरक्षण का दर्जा मिल गया था.
हालांकि साबुचा की दलील है कि 1993 में यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किए जाने के बाद गांव में बदलाव की रफ्तार तेज हो गई. इससे बड़ी संख्या में पर्यटक आने लगे, जिनमें से कई यह भूल जाते हैं कि सदियों पुराने इन लकड़ी के घरों में आज भी लोग रहते हैं.
सैलानियों के शोर में गुम होती प्राईवेसी
साबुचा ने डीडब्ल्यू से कहा, "आप अपने आंगन में बैठकर दोस्तों के साथ शांति से कॉफी पीना चाहते हैं. तभी पहला पर्यटक आता है और पूछता है, 'आप कैसे हैं? यहां रहना कैसा लगता है?' फिर दूसरा आ जाता है, फिर तीसरा."
साबुचा ने अपने घर के बाहर "नो ट्रेसपासिंग" और "नो फोटोस" के बोर्ड लगा रखे हैं. उनका कहना है कि कुछ पर्यटक इसके बाद भी निजी बगीचों में पहुंच जाते हैं, फूलों को नुकसान पहुंचाते हैं और यह भूल जाते हैं कि यह कोई खुला संग्रहालय नहीं, बल्कि लोगों का घर और समुदाय है.
"सामने 'नो फोटो' लिखा होता है, लेकिन कुछ लोगों को फिर भी फोटो लेनी ही होती है. उन्हें दूसरों की प्राइवेसी का कोई खयाल नहीं रहता."
खो रहा है पारंपरिक ग्रामीण जीवन
साबुचा के मुताबिक, सबसे चिंताजनक बदलाव यह है कि सदियों पुरानी ग्रामीण जीवनशैली धीरे-धीरे गायब होती जा रही है.
घास के मैदानों की नियमित कटाई बंद हो चुकी है, पारंपरिक कृषि की पुरानी सीढ़ियां और खेत झाड़ियों से भर गए हैं. वे लोग भी अब नहीं रहे जिन्होंने अपनी मेहनत से इस धरती को उसका स्वरूप दिया था.
उनके मुताबिक, पर्यटन से आने वाला पैसा भी उस खोई हुई जीवनशैली और बदलते ग्रामीण परिवेश को वापस नहीं ला सका है.
उन्होंने बताया कि गांव के निवासियों को टिकट बिक्री से प्रति वर्ष लगभग 400 यूरो यानी भारतीय रुपयों में करीब 44 हजार रुपये प्राप्त होते हैं. उनके अनुसार यह राशि सर्दियों के ईंधन का खर्च निकालने के लिए भी पर्याप्त नहीं है. विडंबना यह है कि पर्यटन से सबसे अधिक कमाने वाले कई लोग अब गांव का हिस्सा ही नहीं हैं.
साबुचा कहते हैं, "सामान्य पर्यटकों की नजर में ये महज लकड़ी के मकान हैं. मगर हमारे लिए इनमें लोगों की जिंदगी और इतिहास बसता है. हमें याद है कि किस घर में कौन रहा करता था."
एक जीवंत गांव
फ्रांस से आई पर्यटक जस्टिन बताती हैं कि इस गांव की सबसे बड़ी खासियत यही है कि यहां आज भी लोग रहते हैं.
उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "आमतौर पर ऐसी जगहें संग्रहालय बन चुकी होती हैं. लेकिन यहां आज भी लोग रहते हैं. यही इसकी सबसे अनोखी बात है."
यह सुनकर कि कुछ निवासी पर्यटन के प्रभाव से इतने परेशान हैं कि वे यूनेस्को सूची से बाहर निकलना चाहते हैं, उन्होंने कहा कि उनकी नाराजगी बिल्कुल स्वाभाविक है और उसे समझा जा सकता है.
उन्होंने कहा, "जब रोजाना बड़ी संख्या में लोग आपके गांव में आते-जाते हैं, तो यह स्थानीय निवासियों के लिए असहज हो सकता है. हालांकि, पर्यटन इस इलाके के लिए आर्थिक लाभ भी लेकर आता है. ऐसे में यह कहना मुश्किल है कि सबसे बेहतर समाधान क्या होगा.
यूनेस्को का दर्जा, संरक्षण की गारंटी
हालांकि, हर कोई इस बात से सहमत नहीं है कि समस्या की जड़ यूनेस्को ही है.
वकोइन्य का प्रशासन संभालने वाले रुजोम्बेरोक शहर के पर्यटन अधिकारी मिरो पारोबेक ने स्वीकार किया कि पर्यटन के कारण कुछ समस्याएं पैदा हुई हैं. हालांकि, उनके अनुसार इन चुनौतियों का जवाब यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची से बाहर निकलना नहीं, बल्कि पर्यटन का बेहतर प्रबंधन है.
डीडब्ल्यू से बातचीत में पारोबेक ने कहा, "हम केवल इमारतों को बचाना नहीं चाहते, बल्कि उस जीवन को भी संजोकर रखना चाहते हैं जो इन इमारतों के भीतर बसता है. हमारा सपना है कि यह गांव अपनी विरासत के साथ-साथ खुद को जीवंत भी बनाए रखे."
उनके अनुसार, स्थानीय लोगों की शिकायतों के जवाब में शहर प्रशासन ने बड़े-बड़े त्योहारों और आयोजनों को सीमित कर छोटे सांस्कृतिक कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया है. वहीं, गांव के निवासी अब एक विशेष कार्य समूह के जरिए नियमित रूप से अधिकारियों के साथ अपनी समस्याओं और सुझावों पर चर्चा करते हैं.
इसके अलावा, नगरपालिका ने ऐतिहासिक इमारतों की मरम्मत और संरक्षण के लिए मकान मालिकों को अनुदान के आवेदन में सहायता प्रदान की. वरिष्ठ नागरिकों की सुविधा के लिए पास के शहर रुजोम्बेरोक तक सप्ताह में दो बार परिवहन सेवा की व्यवस्था भी की गई.
उन्होंने बताया कि पर्यटकों को शुरुआत से ही याद दिलाया जाता है कि यह केवल एक ऐतिहासिक स्थल नहीं है. हर टिकट पर लिखा होता है, "वकोइन्य कोई ओपन-एयर म्यूजियम नहीं है. कृपया यहां रहने वाले लोगों की निजता और जीवनशैली का सम्मान करें."
पर्यटन और स्थानीय जीवन के बीच संतुलन की तलाश
पारोबेक ने स्वीकार किया कि स्थानीय निवासियों की सुरक्षा और सुविधाओं को बनाए रखते हुए पर्यटकों का स्वागत करना हमेशा आसान नहीं होता.
लेकिन उनकी उम्मीदें काफी हद तक उन प्रस्तावित योजनाओं पर टिकी थीं, जिन्हें अभी अमल में लाया जाना बाकी है.
गांव पर पर्यटन के दबाव को कम करने के उद्देश्य से रुजोम्बेरोक नॉर्वे से आर्थिक सहायता मांग रहा है. योजना के तहत गांव के नीचे पार्क-एंड-राइड सुविधा विकसित की जानी थी, पैदल मार्गों और जल निकासी व्यवस्था को सुधारा जाना था, पारंपरिक खलिहानों और कृषि क्षेत्रों को सुधारा जाना था, और बंद पड़े पुराने स्कूल को एक जीवंत सामुदायिक एवं सांस्कृतिक केंद्र में बदला जाना था.
पारोबेक के अनुसार, इस योजना का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा करना भी है, खासकर पर्यटन गाइड और विरासत संरक्षण से जुड़े कार्यों में.
क्या विश्व धरोहर का दर्जा छोड़ा जा सकता है?
हालांकि, साबुचा की राय गांव के अधिकांश लोगों से अलग है. और भले ही उनकी मांग को समर्थन मिल जाए, वकोइन्य को विश्व धरोहर सूची से हटाने की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि उसे लगभग असंभव माना जाता है.
विश्व धरोहर सूची में शामिल होना जितना कठिन है, उससे कहीं अधिक दुर्लभ है उससे बाहर होना. 1978 के बाद केवल तीन स्थलों से यह दर्जा छीना गया है. इनमें जर्मनी की ड्रेसडेन एल्बे घाटी, ब्रिटेन के लिवरपूल का ऐतिहासिक वाटरफ्रंट और ओमान का अरबियन ओरिक्स अभयारण्य शामिल हैं. इन सभी मामलों में विरासत स्थल के मूल स्वरूप या संरक्षण व्यवस्था में बड़े बदलाव हुए थे.
हर मामले में विश्व धरोहर का दर्जा तब समाप्त किया गया, जब उन स्थानों ने अपनी वह अनूठी पहचान खो दी, जिसने कभी उन्हें वैश्विक महत्व की विरासत के रूप में स्थापित किया था.
अब तक किसी भी समुदाय ने स्वयं विश्व धरोहर का दर्जा छोड़ने की इच्छा जाहिर नहीं की है. इसलिए वकोइन्य जैसी मांग एक असाधारण और अभूतपूर्व स्थिति मानी जाएगी.
इतिहास में पहली बार ऐसा अनुरोध किए जाने के बावजूद, अभी तक इस बात के कोई संकेत नहीं हैं कि स्लोवाकिया का यह छोटा-सा गांव अपनी मांग में सफल होगा.