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कैम्ब्रिज स्टडी: लो-कैलोरी स्वीटनर्स से खराब हो सकते है गट बैक्टीरिया

नई दिल्ली, अक्सर लोग चीनी से बचने के लिए डाइट ड्रिंक, शुगर-फ्री मिठाइयों या कम कैलोरी वाले प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करते हैं। इन्हें सेहत के लिए बेहतर विकल्प माना जाता है, लेकिन अब यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज के वैज्ञानिकों की एक स्टडी बताती है कि ये स्वीटनर्स हमारी आंतों में रहने वाले अच्छे बैक्टीरिया पर असर डाल सकते हैं।

कैम्ब्रिज स्टडी: लो-कैलोरी स्वीटनर्स से खराब हो सकते है गट बैक्टीरिया
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नई दिल्ली, अक्सर लोग चीनी से बचने के लिए डाइट ड्रिंक, शुगर-फ्री मिठाइयों या कम कैलोरी वाले प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करते हैं। इन्हें सेहत के लिए बेहतर विकल्प माना जाता है, लेकिन अब यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज के वैज्ञानिकों की एक स्टडी बताती है कि ये स्वीटनर्स हमारी आंतों में रहने वाले अच्छे बैक्टीरिया पर असर डाल सकते हैं।

हमारी आंतों में करोड़ों सूक्ष्म जीव रहते हैं, जिन्हें मिलाकर 'गट माइक्रोबायोम' कहा जाता है। ये बैक्टीरिया सिर्फ खाना पचाने में ही मदद नहीं करते, बल्कि ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने, इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाने और शरीर की कई जरूरी प्रक्रियाओं में भी अहम भूमिका निभाते हैं। इसलिए अगर इन बैक्टीरिया का संतुलन बिगड़ता है, तो इसका असर हमारी सेहत पर भी पड़ सकता है।

कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के मेडिकल रिसर्च काउंसिल (एमआरसी) टॉक्सिकोलॉजी यूनिट के वैज्ञानिकों ने यह जानने की कोशिश की कि बाजार में इस्तेमाल होने वाले आम स्वीटनर्स सीधे गट बैक्टीरिया पर क्या असर डालते हैं। इसके लिए उन्होंने लैब में 25 तरह के गट बैक्टीरिया को अलग-अलग विकसित किया। इनमें कुछ फायदेमंद थे, कुछ सामान्य और कुछ ऐसे भी थे जो नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसके बाद इन बैक्टीरिया को 39 अलग-अलग आर्टिफिशियल और लो-कैलोरी स्वीटनर्स के संपर्क में लाया गया।

रिसर्च में सामने आया कि करीब 75 प्रतिशत स्वीटनर्स ने कम से कम एक तरह के बैक्टीरिया की ग्रोथ को प्रभावित किया। कुछ स्वीटनर्स ने ऐसे बैक्टीरिया की बढ़त को धीमा कर दिया जो स्वस्थ आंतों के लिए जरूरी माने जाते हैं।

वैज्ञानिकों ने यह भी देखा कि जब इन स्वीटनर्स को दूसरी चीजों जैसे कैफीन, वनीला एक्सट्रैक्ट, दूसरे स्वीटनर्स और कुछ आम दवाओं के साथ मिलाया जाता है, तब क्या होता है। इस दौरान उन्हें 100 से ज्यादा ऐसे मामले मिले, जहां स्वीटनर का असर अकेले इस्तेमाल करने की तुलना में बदल गया। कुछ मामलों में असर और ज्यादा बढ़ गया, जबकि कुछ में कम हो गया।

सबसे चौंकाने वाला नतीजा एक खास स्वीटनर आइसोस्टेवियोल और एंटीडिप्रेसेंट डुलोक्सेटीन से मिला। वैज्ञानिकों ने पाया कि जब दोनों को एक साथ इस्तेमाल किया गया, तो उन्होंने दो महत्वपूर्ण गट बैक्टीरिया रोजबुरिया इंटेस्टाइनलिस और पैराबैक्टेरॉइड्स मर्डे की ग्रोथ को काफी हद तक रोक दिया। ये दोनों बैक्टीरिया ब्लड शुगर को संतुलित रखने, पाचन तंत्र को स्वस्थ बनाए रखने और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

इसके बाद वैज्ञानिकों ने 25 बैक्टीरिया का एक कृत्रिम समूह तैयार किया ताकि यह समझा जा सके कि असली आंतों जैसी स्थिति में क्या बदलाव हो सकते हैं। इस मॉडल में भी आइसोस्टेवियोल और डुलोक्सेटीन का मिश्रण माइक्रोबायोम की विविधता यानी बैक्टीरिया की अलग-अलग प्रजातियों की संख्या को कम करता दिखाई दिया। आमतौर पर जितना विविध माइक्रोबायोम होता है, उसे उतना ही स्वस्थ माना जाता है। इसके अलावा इस मिश्रण ने कुछ कोशिकाओं पर विषैले प्रभाव भी दिखाए और शरीर की सूजन तथा इम्यून सिस्टम से जुड़ी प्रक्रियाओं को प्रभावित करने के संकेत मिले।

रिसर्च की प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. सोनजा ब्लाशे का कहना है कि स्वीटनर्स को अक्सर इस तरह प्रचारित किया जाता है जैसे उनका शरीर पर कोई खास असर नहीं पड़ता, लेकिन उनकी स्टडी इस धारणा को चुनौती देती है। उनके मुताबिक, जब ये पदार्थ दवाओं या दूसरे फूड एडिटिव्स के साथ मिलते हैं, तो इनके असर बदल सकते हैं और गट माइक्रोबायोम पर अनचाहा प्रभाव डाल सकते हैं।

वहीं, स्टडी के वरिष्ठ लेखक प्रोफेसर किरण पाटिल का कहना है कि यह रिसर्च इस दिशा में आगे के अध्ययन का रास्ता खोलती है। उनका कहना है कि आर्टिफिशियल स्वीटनर्स सिर्फ शरीर से बिना असर किए बाहर नहीं निकल जाते, बल्कि वे गट बैक्टीरिया के साथ प्रतिक्रिया कर सकते हैं और दूसरी चीजों के साथ मिलकर उनका प्रभाव और भी बदल सकता है।

हालांकि, वैज्ञानिकों ने यह भी साफ किया है कि यह रिसर्च फिलहाल सिर्फ लैब में की गई है और इससे सीधे इंसानों पर असर होने का दावा नहीं किया जा सकता।


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