होर्मुज का बैकअप प्लान तैयार करने के लिए बेचैन खाड़ी देश

होर्मुज से होकर गुजरने वाले तेल निर्यात का कुछ हिस्सा सऊदी अरब ने अब दूसरे रास्तों से भेजना शुरू कर दिया है. हालांकि खाड़ी देशों को अब तक होर्मुज का कोई भरोसेमंद विकल्प नहीं मिल पाया है;

Update: 2026-08-13 19:09 GMT

होर्मुज से होकर गुजरने वाले तेल निर्यात का कुछ हिस्सा सऊदी अरब ने अब दूसरे रास्तों से भेजना शुरू कर दिया है. हालांकि खाड़ी देशों को अब तक होर्मुज का कोई भरोसेमंद विकल्प नहीं मिल पाया है.

महीनों से चल रही नाकाबंदी और अनिश्चितता ने ऊर्जा निर्यातकों को का वैकल्पिक रास्ता तलाशने के लिए मजबूर कर दिया है.

ईरानी अधिकारियों ने कहा है कि होर्मुज जलडमरूमध्य बंद रहेगा और अमेरिका के साथ बातचीत तब तक शुरू नहीं होगी, जब तक अमेरिका जून में हुए समझौते का पालन नहीं करता और ईरान को कथित उल्लंघनों के लिए मुआवजे की पेशकश नहीं करता है.

हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने बयान दिया कि होर्मुज जलडमरूमध्य अमेरिकी नौसेना के नियंत्रण में है. उन्होंने व्हाइट हाउस में पत्रकारों से कहा, "हमने पूरे होर्मुज जलडमरूमध्य से बारूदी सुरंगें हटा दी हैं.”

होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे अहम तेल व्यापार मार्गों में से एक है. ईरान युद्ध शुरू होने से पहले दुनिया के कुल कच्चे तेल निर्यात का करीब 20 फीसदी हिस्सा इसी रास्ते से यूरोप, एशिया और उत्तरी अमेरिका के बाजारों तक पहुंचता था.

इस संकट के बीच सऊदी अरब ने साफ किया है कि उसके पास होर्मुज जलडमरूमध्य के विकल्प मौजूद हैं. हालांकि, संयुक्त अरब अमीरात के पास भी ऐसे बंदरगाह और तेल पाइपलाइन हैं, जिन्हें ऐसी स्थिति में इस्तेमाल किया जा सकता है. लेकिन वह उतने कारगर नहीं है.

तेल के लिए सऊदी अरब ने कौन सा रास्ता अपनाया?

अमेरिका-ईरान युद्ध की वजह से लाल सागर से होकर गुजरने वाला वैकल्पिक समुद्री रास्ते का महत्व बढ़ गया है.

सऊदी अरब तेल पाइपलाइन के जरिए अपने पूर्वी इलाकों से लाल सागर के यानबू बंदरगाह तक कच्चा तेल पहुंचा रहा है. इसका मतलब है कि होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरे बिना वह दुनिया के दूसरे देशों को अपना तेल आसानी से भेज पा रहा है.

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के पोर्टवॉच प्लेटफॉर्म के आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल और मई में सऊदी अरब के खाड़ी तट से जाने वाले मालवाहक जहाजों की आवाजाही काफी घट गई. एक साल पहले तक यह मात्रा 4.75 करोड़ टन थी, जो अब घटकर 63 लाख टन पर सिमट गई है.

दूसरी तरफ इसी अवधि में लाल सागर के रास्ते सऊदी अरब का निर्यात 2.96 करोड़ टन से बढ़कर 5.48 करोड़ टन हो गया है यानी करीब 2.52 करोड़ टन ज्यादा. यह होर्मुज से घटे तेल निर्यात का लगभग 61 फीसदी हिस्सा है.

यह बदलाव दिखाता है कि ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन सिर्फ आपातकाल के लिए ही नहीं है, बल्कि अगर होर्मुज जलडमरूमध्य बंद हो जाता है, तो यह पाइपलाइन काफी अहम साबित हो सकती है.

हाल में ईरान समर्थित हूथी विद्रोहियों ने सऊदी अरब के खिलाफ समुद्री नाकेबंदी का ऐलान किया है. हालांकि, इसका क्या और कितना असर होगा, यह अब तक साफ नहीं है.

एक तरफ सऊदी अरब अपनी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन की बाधाएं दूर करने में जुटा है, वहीं उसका पड़ोसी संयुक्त अरब अमीरात अपने अबू धाबी क्रूड ऑयल पाइपलाइन (एडीसीओपी) के साथ एक नई समानांतर पाइपलाइन पर विचार कर रहा है.

विकल्प बनाना आसान नहीं

ऐसा लगता जरूर है कि यूएई ने होर्मुज का विकल्प ढूंढ़ लिए है. एडीसीओपी पाइपलाइन अबू धाबी के हबशन से कच्चा तेल सीधे फुजैराह तक पहुंचा सकती है, जो होर्मुज से बाहर ओमान की खाड़ी के एक किनारे है. वहां से तेल को बड़े-बड़े जहाजों में भरकर आसानी से दूसरे देशों तक भेजा जा सकता है.

जबकि असल में भले ही फुजैराह या दूसरे बंदरगाह होर्मुज जलडमरूमध्य के बाहर हैं, फिर भी वे ईरान के काफी करीब हैं. इससे ईरान की तरफ से आने वाले ड्रोन और मिसाइलों का खतरा बना रह सकता है.लड़ाई के दौरान यूएई के फुजैराह बंदरगाह यूएई के पूर्वी किनारे पर मौजूद जहाजों पर भी हमला हुआ था.

पोर्टवॉच के आंकड़ों की मानें तो अप्रैल और मई में फारस की खाड़ी वाले बंदरगाह पर यूएई के जहाजों की आवाजाही काफी घट गई है. 2025 में यहां से माल की ढुलाई 6.85 करोड़ टन थी, जो इस साल घटकर सिर्फ 1.2 करोड़ टन रह गई. वहीं यूएई के वैकल्पिक बंदरगाहों से भी माल की ढुलाई 1.37 करोड़ टन से घटकर 63 लाख टन रह गई है. यानी उम्मीद थी कि होर्मुज से बचकर आने वाला माल ज्यादातर इन बंदरगाहों का रास्ता चुनेगा, लेकिन उल्टा यहां माल की आवाजाही घट गई है.

एक बड़ी समस्या बंदरगाहों की क्षमता भी है. फुजैराह बंदरगाह इतनी बड़ी मात्रा में सामान और तेल संभालने के लिए तैयार नहीं है कि फारस की खाड़ी में मौजूद जेबेल अली जैसे बंदरगाहों की जगह ले सके. साथ ही, अगर जहाज मालिक और बीमा कंपनियां किसी वैकल्पिक बंदरगाह को भी होर्मुज जितना ही खतरनाक मानती हैं, तो उस रास्ते का भी वैकल्पिक मार्ग बनना नामुमकिन सा हो जाता है.

नई पाइपलाइन भविष्य की तैयारी, आज की समस्या का हल नहीं

अब सरकार और तेल-गैस के जानकार भी दूसरे विकल्पों की चर्चा में जुट गए हैं.

अर्थशास्त्री हसन मंसूर ने डीडब्ल्यू को बताया कि सुझावों में इराक को ओमान और जॉर्डन से जोड़ने वाली नई तेल पाइपलाइन बनाना शामिल है. साथ ही, जहाजों को पूरा घुमा कर दक्षिण अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप के रास्ते ले जाना भी विकल्प हो सकता है. लेकिन यह दोनों ही विकल्प काफी महंगे हैं और इन्हें तैयार होने में कई सालों का वक्त लग सकते हैं.

मंसूर के मुताबिक, बसरा-अकाबा पाइपलाइन बनाने में करीब 5 से 7 साल लग सकते हैं और लगभग 8 से 10 अरब डॉलर का खर्च आने का अनुमान है. साथ ही, बसरा से ओमान तक पाइपलाइन बनाने में करीब 10 से 15 अरब डॉलर खर्च हो सकते हैं. वहीं, इराक-कुवैत-यूएई-ओमान को जोड़ने वाली पाइपलाइन परियोजनाओं के लिए भी भारी निवेश की जरूरत पड़ेगी.

यहां तक कि जहाजों को केप ऑफ गुड होप के रास्ते अफ्रीका के चारों ओर घुमाने पर हर यात्रा पर लाखों डॉलर तक का अधिक खर्च आएगा. मंसूर ने कहा, "सीधी बात यह है कि ये परियोजनाएं तेल बाजार की वर्तमान समस्या का समाधान नहीं हैं.”

लाल सागर के अपने जोखिम हैं. स्वेज नहर की तरफ जाने वाले जहाजों को बाब अल-मंदब जलडमरूमध्य से होकर गुजरना पड़ता है. यहां हूथी विद्रोहियों के हमलों ने पहले भी जहाजों की आवाजाही प्रभावित की है. बात सीधी है, एक रास्ते का संकट टालेंगे, तो दूसरे रास्ते का खतरा सामने आ खड़ा होगा.

क्या इस्राएल मदद कर सकता है?

इस्राएली प्रधानमंत्री बेन्यामिन नेतन्याहू का कहना है कि तेल की सप्लाई जारी रखने के लिए इस क्षेत्र में नए और वैकल्पिक रास्ते बनाने की जरूरत है ताकि होर्मुज और बाब अल-मंदब जैसे अहम समुद्री रास्तों पर निर्भरता कम हो सके.

द टाइम्स ऑफ इस्राएल के मुताबिक, नेतन्याहू ने कहा कि अरब प्रायद्वीप से लेकर इस्राएल तक और भूमध्य सागर के बंदरगाहों तक पहुंचने वाली नई तेल और गैस पाइपलाइनों के जरिए यह हासिल किया जा सकता है. उन्होंने आगे कहा कि इससे होर्मुज जैसे समुद्री रास्तों पर निर्भरता हमेशा के लिए खत्म की जा सकती है और ऐसा करना पूरी तरह संभव है.

कतर, कुवैत और बहरीन के पास कोई रास्ता नहीं

तेहरान के राजनीतिक विश्लेषक रहमान गहरमानपुर ने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य को बाइपास करने के तरीके ढूंढना कोई नई बात नहीं हैं. युद्ध ने सिर्फ उसके जोखिम को सामने खड़ा कर दिया है.

उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा कि नई पाइप लाइन होर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भरता और उसके असर को कम कर सकती हैं, लेकिन युद्ध के समय ये पाइप लाइन खुद भी निशाने पर आ सकती हैं. चूंकि, ईरानी और हूथी विद्रोहियों के ड्रोन फुजैराह और लाल सागर दोनों ही जगह आराम से पहुंच सकते हैं. उन्होंने आगे कहा कि कतर, कुवैत और बहरीन के लिए मुसीबत ज्यादा बड़ी हैं.

उनके मुताबिक, सऊदी अरब और यूएई के उलट उनके पास फारस की खाड़ी के बाहर कोई समुद्री तट नहीं है. तेल को दूसरे रास्ते से भेजने के लिए उन्हें इराक, सीरिया, जॉर्डन और इस्राएल जैसे देशों के सहयोग की जरूरत होगी.

गहरमानपुर के मुताबिक, फिलहाल इन देशों के पास होर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भर रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं हैं.

होर्मुज जलडमरूमध्य का विकल्प मुश्किल

वैकल्पिक रास्ते बनाने से खाड़ी देशों का तेल निर्यात होर्मुज पर कम निर्भर हो सकता है जैसा कि सऊदी अरब के मामले में देखने को मिला है. इसके अलावा, मौजूदा तेल पाइपलाइनों की क्षमता बढ़ाई जाए, तो मौजूदा संकट का असर भी कुछ हद तक कम किया जा सकता है.

युद्ध शुरू होने से पहले हर दिन करीब 2 करोड़ बैरल तेल और पेट्रोलियम उत्पाद होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरते थे. लेकिन होर्मुज के विकल्पों से तेल भेजने वाले रास्तों की क्षमता बहुत कम है.

गहरमानपुर ने चेतावनी दी, "सिर्फ पाइपलाइन बनाने से ही समस्या हल नहीं होगी.” उन्होंने कहा, "बंदरगाहों, तेल टर्मिनलों और पाइपलाइनों पर भी हमला हो सकता है.”

उनके मुताबिक, होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने का असर ईरान के लिए भी एक बड़ी परेशानी है.

उन्होंने कहा, "अगर ईरान लंबे समय तक होर्मुज को बंद रखता है, तो दूसरे देशों को लग सकता है कि यह संकट लंबे समय तक चलने वाला है यानी ईरान के खिलाफ कई देशों का बड़ा संगठन खड़ा हो सकता है.”

उन्होंने कहा, "ईरान ऐसा कोई बड़ा अंतरराष्ट्रीय गठबंधन उसके खिलाफ नहीं बनने देना चाहता है.”

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