मिस्र की संसद ने दी सऊदी अरब की सहायता को मंजूरी

हूथियों के हमले से जूझ रहे सऊदी अरब को मिस्र से सैन्य सहायता मिल सकती है.;

Update: 2026-10-27 07:09 GMT

हूथियों के हमले से जूझ रहे सऊदी अरब को मिस्र से सैन्य सहायता मिल सकती है. मिस्र की संसद ने इस सहायता को मंजूरी दे दी है.

मिस्र के राष्ट्रपति फतह अल सिसी ने पिछले हफ्ते संसद के सामने प्रस्ताव रखा था कि क्या उनके देश को सऊदी अरब की मदद करनी चाहिए. सऊदी अरब, मिस्र का बड़ा साझेदार है. राष्ट्रपति अल सिसी ने संसद से पूछा था कि अगर सऊदी अरब ने हूथियों के खिलाफ जंग में मदद मांगी तो क्या किया जाए. ईरान में जारी युद्ध के बीच सऊदी अरब पर यमन के हूथी विद्रोही हमले कर रहे हैं.

स्वेज नहर का ट्रैफिक भी मुश्किल में

मिस्र के स्थानीय मीडिया के मुताबिक, सोमवार को संसद ने सऊदी अरब की सहायता करने की मंजूरी दे दी. इस अनुमति के बाद सऊदी अरब, यमन और ईरान में चल रहा विवाद बड़े दायरे में फैल सकता है. हूथी विद्रोहियों के हमलों के कारण बाब एल मंदेब जलडमरूमध्य का अहम समुद्री रास्ता प्रभावित हो रहा है. मिस्र की स्वेज नहर के लिए यह समुद्री मार्ग अहम है. मध्य पूर्व से यूरोप और अमेरिका को जाने वाली पेट्रोलियम सप्लाई इसी रूट से गुजरती है.

हूथी विद्रोहियों को ईरान का समर्थन है. मिस्र बार बार खाड़ी देशों पर ईरान या उसके समर्थित गुटों द्वारा किए जा रहे हमलों की आलोचना कर चुका है. लेकिन मिस्र अब तक सीधे तौर पर इस विवाद में नहीं कूदा है. काहिरा ने अगस्त 2026 में ईरान, पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब के बीच हुए मक्का समझौते में भी हिस्सा नहीं लिया है. हालांकि इसी महीने मिस्र के विदेश मंत्री बरद अब्देलाती ने कहा कि उनका देश मक्का समझौते की सदस्यता पर "गंभीरता से विचार कर रहा है."

मिस्र के लिए कितना जरूरी है सऊदी अरब

मिस्र अरब जगत में सबसे बड़ी आबादी वाला देश है. उसके पास बहुत बड़ी सेना भी है. मार्च 2015 में हूथियों के खिलाफ छिड़े सैन्य अभियान की शुरुआत में उसने सऊदी समर्थक गठबंधन में हिस्सा लिया था. तब मिस्र ने नौसेना वहां भेजी थी. अपनी नौसेना के जरिए मिस्र ने लाल सागर के शिपिंग रूट को बहाल रखने की कोशिश की थी.

मिस्र 1960 के दशक में यमन में सैन्य दखल में शामिल हुआ था. लेकिन 1991 के खाड़ी युद्ध के बाद से मिस्र ने किसी विदेशी धरती पर बड़ी संख्या में अपनी सेना नहीं उतारी है. लेकिन सऊदी अरब की हालत देख मिस्र को अपना रुख बदलने पर मजबूर होना पड़ रहा है. सऊदी अरब मिस्र का बड़ा राजनीतिक और वित्तीय साझेदार है.

राष्ट्रपति अल सिसी के कार्यकाल के दौरान सऊदी अरब मिस्र को अरबों डॉलर की वित्तीय मदद भी दे चुका है.

सऊदी अरब पर हमला कर रहे हूथी विद्रोही रियाद इंटरनेशनल एयरपोर्ट और आरामको जैसी तेल कंपनी को निशाना बना रहे हैं. इन हमलों की वजह से विमान परिवहन और तेल निर्यात बाधित हो रहा है. बुधवार को मिस्र के खुफिया प्रमुख हसन रशद रियाद गए. उन्होंने सऊदी अरब के शासक मोहम्मद बिन सलमान से मुलाकात की और उन्हें सिसी की एक चिट्ठी सौंपी. इस चिट्ठी में भी सीमित मदद का आश्वासन दिया गया था.

तेहरान में मक्का समझौते के सदस्यों की बैठक

इस बीच सोमवार को ईरान की राजधानी तेहरान में पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब के अधिकारियों की बैठक शुरू हुई है. इस बैठक में पाकिस्तान के शीर्ष सैन्य अधिकारी, फील्ड मार्शल आसिम मुनीर, सऊदी अरब के रक्षा मंत्री प्रिंस खालिद बिन सलमान, तुर्की के इंटेलिजेंस चीफ इब्राहिम कालिन और ईरान के शीर्ष सैन्य अधिकारी मेजर जनरल मोहसेन रेजाई हिस्सा ले रहे हैं.

पाकिस्तान के अधिकारियों के मुताबिक, इस बातचीत के दौरान सऊदी अरब की सुरक्षा पर मंडराते खतरे को कम करने और ऊर्जा संकट से निपटने के संभावित रास्ते खोजे जाएंगे.

पाकिस्तान, ईरान युद्ध को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की कोशिशें करता रहा है. लेकिन अब तक ये कोशिशें फरवरी 2026 से जारी ईरान युद्ध को खत्म करने में विफल रही हैं.

सोमवार को संयुक्त राष्ट्र महासचिव अंटोनियो गुटेरेष ने भी सभी पक्षों से मध्य पूर्व में "किसी भी तरह की भड़काऊ कार्रवाई को रोकने" की अपील की है. मिस्र की राजधानी काहिरा में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए गुटेरेष ने कहा, "ईरान पर किसी सैन्य हमले, और खाड़ी देशों पर ईरान के सैन्य हमले की आशंका को देखते हुए, हर कीमत पर इससे जुड़े जोखिमों को टाला ही जाना चाहिए."

ईरान पर फिलहाल अमेरिका और इस्राएल हमले नहीं कर रहे हैं, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप बीच बीच में ईरान पर हमले करने की चेतावनी देते जा रहे हैं.

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