लखनऊ। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती ने 77वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर देश और दुनिया भर में रह रहे भारतीय नागरिकों और उनके परिवारजनों को हार्दिक शुभकामनाएं दीं। इस मौके पर उन्होंने पार्टी के संस्थापक और बहुजन आंदोलन के पुरोधा कांशीराम को भारत रत्न से सम्मानित करने की मांग एक बार फिर दोहराई। मायावती ने कहा कि कांशीराम ने अपना पूरा जीवन देश के करोड़ों गरीब, शोषित, पीड़ित और उपेक्षित वर्गों को आत्मनिर्भर बनाने, उन्हें आत्मसम्मान और आत्मगौरव का जीवन दिलाने के संघर्ष में समर्पित कर दिया, इसलिए उन्हें बिना किसी देरी के देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाजा जाना चाहिए। नागरिकों को शुभकामनाएं
गणतंत्र दिवस के मौके पर इंटरनेट मीडिया पर जारी अपने संदेश में मायावती ने पद्म विभूषण, पद्म भूषण, पद्म श्री तथा सर्वोच्च वीरता पुरस्कारों से सम्मानित नागरिकों और उनके परिवारजनों को भी बधाई दी। उन्होंने कहा कि ऐसे सम्मान देश की प्रतिभा, सेवा और बलिदान को मान्यता देते हैं और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा प्रदान करते हैं। मायावती ने अपने संदेश में कहा कि गणतंत्र दिवस केवल उत्सव का अवसर नहीं है, बल्कि यह आत्ममंथन का भी समय है—यह सोचने का कि संविधान की मूल भावना के अनुरूप देश कितना आगे बढ़ पाया है। कांशीराम को भारत रत्न देने की पुनः मांग
बसपा प्रमुख ने कहा कि कांशीराम का योगदान केवल एक राजनीतिक दल की स्थापना तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने बहुजन समाज को राजनीतिक चेतना, अधिकार और सम्मान की राह दिखाई। उन्होंने सवाल उठाया कि जब देश ने विभिन्न क्षेत्रों में योगदान देने वाले अनेक व्यक्तित्वों को भारत रत्न से सम्मानित किया है, तो फिर कांशीराम को यह सम्मान देने में देरी क्यों? मायावती ने कहा कि देशभर में उनके करोड़ों अनुयायियों की यह लंबे समय से इच्छा रही है कि कांशीराम को भारत रत्न दिया जाए और सरकार को इस जनभावना का सम्मान करना चाहिए। विकास और सामाजिक न्याय पर सवाल
गणतंत्र दिवस के अवसर पर जारी अपने बयान में मायावती ने देश की विकास यात्रा पर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने पूछा कि क्या संविधान की मंशा के अनुसार देश में सभी क्षेत्रों में अपेक्षित विकास हुआ है और क्या आम लोगों के जीवन स्तर में वास्तविक सुधार आया है? उन्होंने कहा कि 140 करोड़ की आबादी वाले देश में गरीबी और बेरोजगारी को दूर करने के मामले में अब तक क्या ठोस प्रगति हुई है। मायावती ने यह भी सवाल किया कि क्यों कुछ मुट्ठी भर अमीर और धन्नासेठ लगातार और अमीर होते जा रहे हैं, जबकि बड़ी आबादी गरीब और बेरोजगार रहकर सरकार के सीमित अन्न और सहायता पर निर्भर होती जा रही है। आत्मचिंतन की जरूरत पर जोर
बसपा प्रमुख ने कहा कि केवल आंकड़ों का आकलन ही नहीं, बल्कि गहन आत्मचिंतन की भी जरूरत है। उन्होंने आगाह किया कि देश के आसपास और दुनिया के कई हिस्सों में हालात तेजी से बदल रहे हैं, ऐसे में भारतीय लोकतंत्र और संविधान का महत्व और बढ़ जाता है। मायावती ने कहा कि सरकार को चाहिए कि वह देश को आत्मनिर्भर बनाने के साथ-साथ लोगों की उम्मीदों और विश्वास को भी मजबूत करे। इसके लिए संकीर्ण सोच नहीं, बल्कि संविधान के अनुरूप देश को जोड़ने वाली नीयत और नीतियों पर अमल जरूरी है। एसआईआर और वोटर लिस्ट पर चिंता
मायावती ने विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और मतदाता सूची से जुड़े मुद्दों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि घुसपैठियों और विदेशियों की पहचान कर उन्हें वोटर लिस्ट से अलग करना एक निरंतर प्रक्रिया रही है, लेकिन इसके नाम पर भारतीय नागरिकों और उनके परिवारजनों को सरकारी दस्तावेजों की जटिलताओं में उलझाना उचित नहीं है। उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार को ऐसे मामलों में कोई बेहतर और सरल रास्ता अपनाना चाहिए, जिससे वास्तविक नागरिकों को अनावश्यक परेशानी न हो। धर्म परिवर्तन कानून और विभाजनकारी राजनीति
बसपा प्रमुख ने धर्म परिवर्तन से जुड़े कड़े कानूनों में सुधार की जरूरत पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि इन कानूनों की आड़ में यदि विभाजनकारी राजनीति को बढ़ावा मिलता है, तो यह देशहित में नहीं है। मायावती ने कहा कि जितनी जल्दी ऐसी राजनीति पर विराम लगेगा, उतना ही देश के लिए बेहतर होगा। अर्थव्यवस्था और रुपये की गिरावट पर सवाल
अपने बयान में मायावती ने देश की आर्थिक स्थिति को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने सवाल किया कि क्या भारतीय रुपया एक डॉलर के मुकाबले 100 के स्तर तक पहुंचने के बाद ही दम लेगा? उन्होंने संकेत दिया कि महंगाई, मुद्रा मूल्य में गिरावट और आम जनता पर बढ़ते आर्थिक दबाव पर गंभीरता से विचार किए जाने की जरूरत है। गंभीर सवाल
77वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर मायावती का संदेश केवल शुभकामनाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने इसे लोकतंत्र, संविधान, सामाजिक न्याय और आर्थिक असमानता पर गंभीर सवाल उठाने का मंच बनाया। कांशीराम को भारत रत्न देने की मांग दोहराते हुए उन्होंने सरकार से अपेक्षा की कि वह संविधान की मूल भावना—समानता, न्याय और बंधुत्व—को केंद्र में रखकर नीतियां बनाए, ताकि देश की विशाल आबादी को वास्तविक विकास और सम्मानजनक जीवन मिल सके।