यूजीसी बिल और शंकराचार्य प्रकरण के विरोध में बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट का इस्तीफा, जानें क्‍या कहा

इस्तीफे से पहले सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री की एक तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हुई, जिसमें वह अपने कार्यालय के सामने एक पोस्टर लेकर खड़े दिखाई दिए। पोस्टर पर लिखा था— “#UGC Roll Back… काला कानून वापस लो”, “शंकराचार्य और संतों का अपमान नहीं सहेगा हिंदुस्तान।”

Update: 2026-01-26 11:44 GMT
बरेली। उत्तर प्रदेश के बरेली में उस समय प्रशासनिक और राजनीतिक हलचल तेज हो गई, जब सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने सोमवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। 2016 बैच के पीसीएस अधिकारी अग्निहोत्री ने अपने इस्तीफे के पीछे दो प्रमुख कारण बताए हैं- प्रयागराज माघ मेले के दौरान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शिष्यों के साथ हुई कथित मारपीट की घटना और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए कानून का विरोध। उनका इस्तीफा ऐसे समय आया है, जब राज्य में संतों की सुरक्षा, प्रशासन की भूमिका और उच्च शिक्षा से जुड़े कानूनों को लेकर बहस तेज हो चुकी है।

पोस्टर के साथ कार्यालय के सामने प्रदर्शन

इस्तीफे से पहले सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री की एक तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हुई, जिसमें वह अपने कार्यालय के सामने एक पोस्टर लेकर खड़े दिखाई दिए। पोस्टर पर लिखा था— “#UGC Roll Back… काला कानून वापस लो”, “शंकराचार्य और संतों का अपमान नहीं सहेगा हिंदुस्तान।” पोस्टर में एक राजनीतिक दल के विरोध में नारे भी दर्ज थे। अग्निहोत्री ने मीडिया से बातचीत में कहा कि वह मौजूदा घटनाक्रम से आहत हैं और इसे केवल प्रशासनिक मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक अस्मिता से जुड़ा मामला मानते हैं।

शंकराचार्य प्रकरण से आहत 

अपने इस्तीफे और बयान में अलंकार अग्निहोत्री ने प्रयागराज में वर्ष 2026 के माघ मेले के दौरान मौनी अमावस्या स्नान के समय हुई एक घटना का उल्लेख किया है। उनके अनुसार, ज्योतिर्मठ पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके शिष्य बटुक ब्राह्मणों के साथ स्थानीय प्रशासन द्वारा मारपीट की गई। उन्होंने आरोप लगाया कि इस दौरान वृद्ध आचार्यों को भी पीटा गया और एक बटुक ब्राह्मण को जमीन पर गिराकर उसकी शिखा पकड़कर घसीटा गया, जिसे उन्होंने धार्मिक और सांस्कृतिक मर्यादा का घोर उल्लंघन बताया।

‘धार्मिक प्रतीकों का अपमान’

अग्निहोत्री ने अपने इस्तीफे में लिखा कि चोटी और शिखा संतों के धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीक हैं। उनका कहना है कि इस प्रकार की कार्रवाई केवल व्यक्तियों के खिलाफ नहीं, बल्कि पूरे ब्राह्मण समाज और साधु-संतों की अस्मिता पर आघात है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि वह स्वयं ब्राह्मण समाज से आते हैं और इस घटना ने उन्हें गहरे स्तर पर आहत किया है। उनके अनुसार, यह घटना यह संकेत देती है कि स्थानीय प्रशासन और राज्य सरकार ब्राह्मण विरोधी मानसिकता के साथ काम कर रही है।

यूजीसी के नए कानून पर आपत्ति

सिटी मजिस्ट्रेट ने अपने इस्तीफे में यूजीसी के नए कानून पर भी कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने 13 जनवरी 2026 को भारत के राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना का हवाला देते हुए कहा कि इसमें पैरा 2, 5, 6 और 7 के प्रावधान सामान्य वर्ग के छात्रों के साथ भेदभाव को बढ़ावा देते हैं। उनका आरोप है कि इन प्रावधानों के तहत सामान्य वर्ग के छात्रों—जिनमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, कायस्थ और भूमिहार समुदाय के छात्र शामिल हैं को एक वर्ग विशेष के प्रति स्वतः संदेह के दायरे में रखा गया है।

फर्जी शिकायतों की आशंका

अग्निहोत्री ने आशंका जताई कि नए यूजीसी नियमों के चलते फर्जी और निराधार शिकायतों के जरिए सामान्य वर्ग के छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ हो सकता है। उन्होंने यह भी दावा किया कि समता समितियों के दुरुपयोग की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, जिससे प्रतिभावान छात्रों को नुकसान पहुंच सकता है। उन्होंने इसे सामाजिक समरसता के लिए घातक बताते हुए कहा कि इस तरह के नियम समाज में अविश्वास और टकराव को जन्म दे सकते हैं।

शैक्षणिक पृष्ठभूमि और भावनात्मक संदर्भ

अपने इस्तीफे में अलंकार अग्निहोत्री ने अपनी शैक्षणिक पृष्ठभूमि का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के अंतर्गत आईआईटी बीएचयू से शिक्षा प्राप्त की है और वह भारत रत्न महामना मदन मोहन मालवीय के विचारों से प्रेरित रहे हैं। उन्होंने लिखा कि महामना के आत्मबल और राष्ट्रवादी सोच से उन्हें सदैव प्रेरणा मिली है और उसी प्रेरणा के तहत उन्होंने यह निर्णय लिया है।

प्रशासन और राजनीति में प्रतिक्रिया का इंतजार

अलंकार अग्निहोत्री के इस्तीफे ने प्रशासनिक गलियारों के साथ-साथ राजनीतिक हलकों में भी चर्चा तेज कर दी है। अब निगाहें राज्य सरकार और प्रशासनिक नेतृत्व की प्रतिक्रिया पर टिकी हैं कि वह इस मामले में क्या रुख अपनाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल एक अधिकारी के इस्तीफे तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यूजीसी कानून, संतों की सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे मुद्दों पर व्यापक बहस को जन्म दे सकता है।


Tags:    

Similar News