27 साल से एमबीबीएस, फिर भी डिग्री अधर में: बीआरडी मेडिकल कॉलेज के चार छात्रों का क्या होगा
ये चारों छात्र 1998, 2008, 2010 और 2013 बैच के हैं और इसी वर्ष एमबीबीएस अंतिम वर्ष की परीक्षा में शामिल हुए थे। उस समय इनका चयन कंबाइंड प्री मेडिकल टेस्ट (सीपीएमटी) के जरिए हुआ था।;
एनएमसी के 10 वर्ष के नियम पर अटका मामला
विवाद की जड़ एनएमसी का वह प्रविधान है, जिसके तहत एमबीबीएस पाठ्यक्रम अधिकतम 10 वर्षों के भीतर पूरा करना अनिवार्य कर दिया गया है। विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि मौजूदा नियमों के अनुसार तय समय-सीमा से कहीं अधिक अवधि में पढ़ाई पूरी करने वाले छात्रों का परिणाम घोषित नहीं किया जा सकता। हालांकि, मामला इसलिए जटिल हो गया है क्योंकि संबंधित चारों छात्रों का नामांकन उस दौर में हुआ था, जब मेडिकल शिक्षा का नियमन मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) के अधीन था।
पुराने नियम बनाम नए नियम
जानकारी के अनुसार, ये चारों छात्र 1998, 2008, 2010 और 2013 बैच के हैं और इसी वर्ष एमबीबीएस अंतिम वर्ष की परीक्षा में शामिल हुए थे। उस समय इनका चयन कंबाइंड प्री मेडिकल टेस्ट (सीपीएमटी) के जरिए हुआ था। एमसीआई के नियमों में एमबीबीएस कोर्स को अधिकतम 10 वर्षों में पूरा करने को लेकर कोई सख्त या स्पष्ट प्रावधान नहीं था। छात्र लंबे अंतराल के बाद भी परीक्षा देकर डिग्री पूरी कर सकते थे।
बाद में एमसीआई को भंग कर नेशनल मेडिकल काउंसिल का गठन किया गया और नए नियम लागू किए गए, जिनमें एमबीबीएस पास करने की अधिकतम अवधि 10 वर्ष तय कर दी गई। यही बदलाव अब इन छात्रों के लिए सबसे बड़ी बाधा बन गया है।
विश्वविद्यालय असमंजस में, एनएमसी से मांगा मार्गदर्शन
अटल बिहारी वाजपेयी चिकित्सा विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि यह मामला नियमों के संक्रमण काल (ट्रांजिशन पीरियड) से जुड़ा है। ऐसे में विश्वविद्यालय अपने स्तर पर कोई अंतिम निर्णय लेने की स्थिति में नहीं है। मामले की गंभीरता को देखते हुए नेशनल मेडिकल काउंसिल से स्पष्ट मार्गदर्शन मांगा गया है। एनएमसी से जो निर्देश प्राप्त होंगे, उसी के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।
मेडिकल कॉलेज परिसर में चर्चाओं का दौर
चार छात्रों का रिजल्ट रोके जाने की खबर के बाद बीआरडी मेडिकल कॉलेज परिसर में चर्चाएं तेज हो गई हैं। कई छात्र और शिक्षक इसे नियमों की सख्ती से जुड़ा मामला बता रहे हैं, तो कुछ इसे पुराने छात्रों के साथ अन्याय के रूप में देख रहे हैं। छात्र संगठनों का कहना है कि जब प्रवेश के समय ऐसी कोई समय-सीमा नहीं थी, तो बाद में बदले गए नियमों को पिछली तारीख से लागू करना न्यायसंगत नहीं है।
देशभर के छात्रों के लिए बन सकता है नजीर
यह मामला केवल बीआरडी मेडिकल कॉलेज तक सीमित नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि एनएमसी का निर्णय देशभर के उन मेडिकल छात्रों के लिए नजीर बन सकता है, जो किसी कारणवश 10 वर्षों के भीतर एमबीबीएस पूरा नहीं कर पाए हैं। यदि एनएमसी सख्त रुख अपनाती है, तो ऐसे कई पुराने मामलों पर भी असर पड़ सकता है।
प्राचार्य का बयान
बीआरडी मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. रामकुमार जायसवाल ने बताया, “चारों छात्रों का परीक्षा परिणाम एनएमसी के नियमों के चलते रोका गया है। इस संबंध में नेशनल मेडिकल काउंसिल से मार्गदर्शन मांगा गया है। वहां से जो भी निर्णय होगा, उसी के आधार पर विश्वविद्यालय अगला कदम उठाएगा।”
एनएमसी के फैसले पर टिकी निगाहें
फिलहाल, इन चारों छात्रों का भविष्य पूरी तरह एनएमसी के निर्णय पर निर्भर है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट हो जाएगा कि क्या पुराने नियमों के तहत नामांकित छात्रों को राहत मिलेगी या नए प्रावधानों के तहत उनके एमबीबीएस करियर पर विराम लग जाएगा। यह मामला मेडिकल शिक्षा व्यवस्था में नियमों की निरंतरता और छात्रों के हितों के संतुलन पर भी बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है।