मुजफ्फरनगर : अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश, त्वरित न्यायालय और विशेष न्यायाधीश एनडीपीएस एक्ट रवि कुमार दिवाकर ने उनकी अदालत से हत्या के 97 मुकदमों की पत्रावलियां वापस लिए जाने के जिला जज के आदेश पर एक बार फिर सवाल उठाए हैं। गुरुवार को 12 साल पुराने एनडीपीएस मामले में आरोपी अशोक भारती को दोषमुक्त करते हुए दिए गए फैसले में न्यायाधीश ने अदालतों के अधिकार क्षेत्र और लंबित मुकदमों की पत्रावलियां रिकॉल किए जाने की प्रक्रिया को लेकर कई कानूनी सवाल दर्ज किए।
चरस बरामदगी मामले में आरोपी दोषमुक्त
मामला करीब 12 वर्ष पुराना था और आरोपी अशोक भारती के खिलाफ 150 ग्राम चरस बरामद होने का आरोप था। मामले की सुनवाई के बाद विशेष न्यायाधीश ने पुलिस और अभियोजन की ओर से प्रस्तुत साक्ष्यों को दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं माना। इसके आधार पर आरोपी को दोषमुक्त कर दिया गया। इसी निर्णय में न्यायाधीश ने अपनी अदालत से हत्या के 97 मामलों की पत्रावलियां वापस लिए जाने के मुद्दे का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि एक न्यायाधीश का दायित्व न्याय करना है और यदि न्यायिक व्यवस्था में उसके साथ ही अन्याय होने की स्थिति पैदा हो, तो उसके सामने भी सवाल खड़ा होता है कि वह अपनी बात कहां रखे।
धारा 409 और 449 के प्रावधानों का हवाला
न्यायाधीश दिवाकर ने अपने फैसले में दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 409(2) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 449(2) का उल्लेख किया। फैसले के मुताबिक, जिन मामलों की सुनवाई शुरू हो चुकी हो और वे पार्ट-हीर्ड यानी आंशिक रूप से सुने जा चुके हों, उनकी पत्रावलियों को सेशन जज द्वारा रिकॉल किए जाने के संबंध में कानूनी सीमाएं हैं। न्यायाधीश ने अपने आदेश में सवाल उठाया कि यदि किसी जिला जज का आदेश संबंधित कानूनी प्रावधानों के अनुरूप नहीं है, तो क्या अधीनस्थ न्यायाधीश ऐसे आदेश का पालन करने के लिए बाध्य है।
एक ही दिन नौ आदेशों का किया जिक्र
फैसले में कहा गया कि तत्कालीन जिला जज ने 18 अगस्त को एक ही प्रकृति के नौ आदेश पारित किए थे। इन आदेशों के माध्यम से विशेष न्यायाधीश की अदालत में चल रहे हत्या के गंभीर मामलों से संबंधित 97 पत्रावलियों को रिकॉल कर जिला जज की अदालत में मंगाया गया। न्यायाधीश दिवाकर ने इन आदेशों की प्रक्रिया पर आपत्ति दर्ज करते हुए कहा कि यदि मामले पार्ट-हीर्ड थे, तो उन्हें रिकॉल किए जाने को लेकर कानूनी प्रावधानों की जांच जरूरी थी। उन्होंने यह भी लिखा कि संबंधित आदेश तत्कालीन जिला जज के सेवानिवृत्त होने से करीब 13 दिन पहले पारित किए गए थे और आदेशों में इसके लिए कोई कारण नहीं बताया गया था।
रिकॉल को लेकर क्या है न्यायिक प्रक्रिया?
फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया कि ऐसे मामले जो पार्ट-हीर्ड नहीं हैं, उन्हें जिला जज द्वारा रिकॉल किए जाने की स्थिति अलग हो सकती है। हालांकि न्यायाधीश ने यह भी कहा कि ऐसी कार्रवाई के लिए भी उचित कारण दर्ज किया जाना जरूरी है। इस टिप्पणी के जरिए न्यायाधीश ने लंबित आपराधिक मुकदमों की सुनवाई, केस ट्रांसफर और पत्रावलियों को एक अदालत से दूसरी अदालत में मंगाए जाने की प्रक्रिया में कानूनी प्रावधानों के पालन के महत्व को रेखांकित किया।
‘शक्ति का इस्तेमाल कैसे होता है, यह महत्वपूर्ण’
अपने फैसले में न्यायाधीश ने ब्रिटिश इतिहासकार लॉर्ड एक्टन के चर्चित कथन का भी उल्लेख किया। उन्होंने सत्ता और अधिकार के इस्तेमाल से जुड़े विचार को सामने रखते हुए कहा कि किसी व्यक्ति के पास जितनी अधिक शक्ति होती है, उसके दुरुपयोग की संभावना पर उतनी ही गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। हालांकि यह टिप्पणी फैसले के न्यायिक संदर्भ में दर्ज की गई है। इसे किसी व्यक्ति के खिलाफ भ्रष्टाचार का प्रत्यक्ष आरोप नहीं माना जा सकता, जब तक उसके समर्थन में अलग से तथ्य या न्यायिक निष्कर्ष मौजूद न हों।
हत्या के मामलों में सजा पर चर्चा में रहे दिवाकर
न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने 29 नवंबर 2025 को जनपद में पदभार ग्रहण किया था। दिए गए विवरण के अनुसार, इसके बाद उन्होंने हत्या के 10 मामलों में 23 दोषियों को मृत्युदंड सुनाया है। इससे पहले बरेली में तैनाती के दौरान भी उन्होंने 13 दोषियों को फांसी की सजा सुनाई थी। 97 हत्या के मामलों की पत्रावलियां रिकॉल किए जाने को लेकर उनकी ताजा टिप्पणी अब न्यायिक प्रशासन में अदालतों के अधिकार, केस ट्रांसफर और लंबित मामलों की प्रक्रिया से जुड़े सवालों के संदर्भ में चर्चा का विषय बन गई है।