मज़दूर विरोधी विधेयकों के खि़लाफ़ देशभर में विरोध प्रदर्शन

आज दिल्ली के समस्त ट्रेड यूनियनों ने संयुक्त रूप से नई दिल्ली के संसद मार्ग स्थित बैंक ऑफ बड़ौदा से लेकर संसद भवन तक विरोध प्रदर्शन किया

Update: 2019-08-02 18:50 GMT

नई दिल्ली । आज दिल्ली के समस्त ट्रेड यूनियनों ने संयुक्त रूप से नई दिल्ली के संसद मार्ग स्थित बैंक ऑफ बड़ौदा से लेकर संसद भवन तक विरोध प्रदर्शन किया। यह विरोध प्रदर्शन भाजपा सरकार द्वारा संसद में-वेतन संहिता विधेयक (कोड ऑन वेजेस बिल) 2019 और कार्यस्थल पर सुरक्षा, स्वास्थ्य और काम की हालतें संहिता विधेयक (ऑक्यूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशंस कोड बिल) 2019 -पेश किए जाने के खिलाफ़ केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों के सर्व हिन्द विरोध के आह्वान पर था।

केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों सहित अलग-अलग क्षेत्रों के मज़दूरों के फेडरेशनों व संगठनों ने संयुक्त बयान जारी करके इसकी इन दोनों संहिताओं की कड़ी निंदा की। प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए, ट्रेड यूनियनों के नेताओं ने कहा कि अगर ये दोनों विधेयक संसद में पास हो जाते हैं, तो वेतन और काम की वर्तमान हालतों से संबंधित मौजूदा 17 श्रम कानूनों का स्थान ले लेंगे।

प्रदर्शनकारियों को अमरजीत कौर, एटक, शिव गोपाल मिश्रा, एचएमएस, ए आर सिंधु, सीआईटीयू, आर के शर्मा, एआईयूटीयूसी, पी. मुत्थु, एलपीएफ, श्री खुंटिया, इंटक, लता, सेवा, शत्रुजीत सिंह, यूटीयूसी, राजेश, एक्टू, संतोष, मेक, नरेन्दर, आईसीटीयू, सबीना इन्द्रजीत, इंडियन जर्नलिस्ट यूनियन, एस के पांडे, नेशनल एलाईंस ऑफ जर्नलिस्ट ने सम्बोधित किया।

उन्होंने समझाया कि इन दोनों विधेयकों में विभिन्न प्रावधानों के उन सारे विवादास्पद मुद्दों को नज़रंदाज़ किया गया है, जिन पर ट्रेड यूनियनों ने बार-बार आपत्ति जताई है। इन विधेयकों के ज़रिये मज़दूरों के अधिकारों को कम किया जाएगा, जिससे मज़दूरों के हितों को बहुत बड़ा नुकसान होगा।

उन्होंने बताया कि वेतन की गणना के लिए 15वीं लेबर कांफ्रेंस (आई.एल.सी.) ने जो फार्मूला माना था, और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार उसमें जो 25 प्रतिशत जोड़ा जाना तय हुआ था, और जिसे 45वीं व 46वीं आई.एल.सी. ने एकमत से मंजूर किया था, को ताक पर रखते हुए केन्द्रिय श्रम मंत्री द्वारा प्रतिमाह 4628 रुपये या प्रतिदिन 178/- रुपये की घोषणा की गई। जबकि 7वें वेतन आयोग ने भी जनवरी 2016 में 18,000 रुपये प्रतिमाह न्यूनतम वेतन की सिफारिश की थी।

उन्होंने बताया कि कार्यस्थल पर सुरक्षा, स्वास्थ्य और काम की हालत संहिता विधेयक 2019 दस और उससे अधिक मज़दूरों वाले कार्यस्थलों पर ही लागू होगा। 90 प्रतिशत मज़दूर जो असंगठित क्षेत्र में, ठेकेपर, या गृह उद्योगों में काम करते हैं, उन्हें इस विधेयक से कोई अधिकार नहीं मिलेंगे। इस विधेयक में अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित मौजूदा 13 श्रम कानूनों को मिलाया गया है।

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उन्होंने बताया कि मौजूदा 13 श्रम कानूनों को 1948 से 1996 के बीच की अवधि में लागू किया गया था। इसका उद्देश्य था विभिन्न क्षेत्रों के मज़दूरों के काम की हालतों का नियामन करना, जैसे कि सेल्स प्रमोशन कर्मचारी, खदान मज़दूर, बीड़ी मज़दूर, निर्माण मज़दूर, कार्यकारी पत्रकार और अखबारों के कर्मचारी, प्रवासी मज़दूर, ठेका मज़दूर, गोदी मज़दूर, आदि। उन सभी क्षेत्रों के मज़दूरों ने लम्बे संघर्ष करके इन कानूनों को पास करवाया था। इन कानूनों में अलग-अलग क्षेत्रों में काम की हालतों की विशेषताओं पर ध्यान देने का प्रयास किया गया था।

कार्यस्थल पर सुरक्षा, स्वास्थ्य और काम की हालत संहिता विधेयक 2019 ने अलग-अलग क्षेत्रों में मज़दूरों के स्वास्थ्य और काम की हालतों से संबंधित इन 13 श्रम कानूनों को सोच-समझकर एक साथ जोड़ दिया है, ताकि मौजूदा कानूनों में मज़दूरों को जो अधिकार मिलते थे, अब मज़दूरों को उनसे वंचित किया जा सके। वेतन संहिता विधेयक की तरह यह संहिता भी इजारेदार पूंजीपतियों के हित में है। समस्त ट्रेड यूनियनों ने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की गिकवाली का भी जमकर विरोध किया।

सभी ट्रेड यूनियन नेताओं ने संसद सदस्यों से मांग की है कि सरकार के इस मज़दूर-विरोधी क़दम का विरोध करें।

 

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