भारत ने ईरान के IRIS लावन युद्धपोत को क्यों दी थी शरण? विदेश मंत्री जयशंकर ने असली बताई वजह

विदेश मंत्री के अनुसार, ईरानी जहाज ‘आईरिस लावन’ को समुद्र में तकनीकी समस्या का सामना करना पड़ा था। इसी दौरान ईरान के एक अन्य जहाज ‘आईरिस देना’ (IRIS Dena) के अंतरराष्ट्रीय समुद्री क्षेत्र में डूबने की घटना भी सामने आई।

Update: 2026-03-07 09:40 GMT
नई दिल्ली: US-Iran War: विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने स्पष्ट किया है कि भारत ने ईरानी नौसेना के जहाज ‘आईरिस लावन’ (IRIS Lavan) को कोच्चि बंदरगाह पर डॉक करने की अनुमति मानवीय आधार पर दी थी। उन्होंने बताया कि जहाज में तकनीकी समस्या आने के बाद ईरान ने भारत से मदद मांगी थी, जिसके बाद यह निर्णय लिया गया। जयशंकर ने कहा कि किसी भी जहाज के संकट में होने पर उसकी सहायता करना अंतरराष्ट्रीय समुद्री परंपरा का हिस्सा है और भारत ने इसी भावना के तहत यह कदम उठाया।

तकनीकी खराबी के बाद मांगी गई थी मदद

विदेश मंत्री के अनुसार, ईरानी जहाज ‘आईरिस लावन’ को समुद्र में तकनीकी समस्या का सामना करना पड़ा था। इसी दौरान ईरान के एक अन्य जहाज ‘आईरिस देना’ (IRIS Dena) के अंतरराष्ट्रीय समुद्री क्षेत्र में डूबने की घटना भी सामने आई। इस स्थिति में ‘आईरिस लावन’ ने भारत से संपर्क कर सुरक्षित बंदरगाह पर आने की अनुमति मांगी। जयशंकर ने बताया कि यह अनुरोध लगभग 28 फरवरी के आसपास भारत को प्राप्त हुआ था। भारत सरकार ने स्थिति को देखते हुए 1 मार्च को जहाज को कोच्चि पोर्ट में प्रवेश की अनुमति दे दी। इसके बाद कुछ दिनों की समुद्री यात्रा के बाद यह जहाज केरल के कोच्चि बंदरगाह पहुंच गया।

जहाज पर मौजूद हैं 183 क्रू सदस्य

विदेश मंत्री ने बताया कि इस जहाज पर कुल 183 क्रू सदस्य मौजूद हैं। फिलहाल सभी को कोच्चि में उपलब्ध नौसैनिक सुविधाओं में ठहराया गया है। उन्होंने कहा कि जहाज पर मौजूद कई लोग युवा कैडेट थे, जो प्रशिक्षण के दौर में थे। ऐसे में जब जहाज ने मदद मांगी, तो भारत ने इसे मानवीय दृष्टिकोण से देखा। जयशंकर के अनुसार, संकट में फंसे जहाज की सहायता करना सही और जिम्मेदार कदम था और भारत ने वही किया।

‘मिलन 2026’ में शामिल होने आए थे जहाज

ईरानी नौसेना के ये जहाज भारत में आयोजित अंतरराष्ट्रीय फ्लीट रिव्यू और मिलन 2026 नामक नौसैनिक अभ्यास में भाग लेने के लिए आए थे। यह कार्यक्रम 15 फरवरी से 25 फरवरी के बीच आयोजित किया गया था, जिसमें कई देशों की नौसेनाओं ने हिस्सा लिया था। जयशंकर ने कहा कि जब यह कार्यक्रम हो रहा था, उस समय क्षेत्र की स्थिति अलग थी। लेकिन इसके कुछ समय बाद ही हालात अचानक बदल गए और ईरानी जहाज को तकनीकी दिक्कतों का सामना करना पड़ा।

हिंद महासागर में सैन्य मौजूदगी पर भी टिप्पणी

विदेश मंत्री ने हिंद महासागर क्षेत्र की रणनीतिक स्थिति पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में कई देशों की सैन्य मौजूदगी पहले से रही है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि डिएगो गार्सिया और जिबूती जैसे स्थानों पर विदेशी सैन्य ठिकाने दशकों से मौजूद हैं। वहीं हंबनटोटा बंदरगाह जैसे प्रोजेक्ट भी हाल के वर्षों में सामने आए हैं। जयशंकर ने कहा कि भारत पिछले एक दशक से हिंद महासागर क्षेत्र में व्यापार, कनेक्टिविटी और समुद्री सहयोग को मजबूत करने के लिए लगातार निवेश कर रहा है।

भारतीय नाविकों की सुरक्षा भी बड़ा मुद्दा

विदेश मंत्री ने यह भी कहा कि समुद्री मार्गों पर बढ़ते तनाव का असर भारतीय नागरिकों पर भी पड़ सकता है। उन्होंने बताया कि दुनिया भर के कई मर्चेंट शिप्स पर बड़ी संख्या में भारतीय काम करते हैं। ऐसे में समुद्री जहाजों पर होने वाले हमले या संकट की स्थिति में भारतीय नाविकों की सुरक्षा भी प्रभावित हो सकती है। जयशंकर के अनुसार, भारत के लिए अपने नागरिकों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है।

खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में भारतीय

विदेश मंत्री ने यह भी बताया कि खाड़ी देशों में करीब 90 लाख से अधिक भारतीय नागरिक रहते हैं। इस वजह से पश्चिम एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र की स्थिरता भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि विदेश नीति के तहत भारत न केवल अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की कोशिश करता है, बल्कि क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए भी सक्रिय भूमिका निभाता है।

मानवीय दृष्टिकोण से लिया गया फैसला

जयशंकर ने दोहराया कि ईरानी जहाज को कोच्चि बंदरगाह में प्रवेश की अनुमति देना पूरी तरह मानवीय और व्यावहारिक निर्णय था। उन्होंने कहा कि समुद्र में संकट की स्थिति में किसी जहाज को सहायता देना अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी का हिस्सा है और भारत ने इसी सिद्धांत का पालन किया। फिलहाल जहाज की तकनीकी स्थिति और आगे की प्रक्रिया को लेकर संबंधित एजेंसियां स्थिति की निगरानी कर रही हैं।

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