एनसीईआरटी विवाद: सुप्रीम कोर्ट की सख्ती, कांग्रेस ने साधा संघ पर निशाना

कांग्रेस ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया है कि पिछले एक दशक में द्वेषपूर्ण तरीके से पाठ्यपुस्तकों को दोबारा लिखा गया है और मौजूदा विवाद उसी का परिणाम है।

Update: 2026-02-26 09:41 GMT
नई दिल्‍ली: आठवीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान की एक किताब को लेकर उठा विवाद अब राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक और संवैधानिक बहस का मुद्दा बन गया है। सुप्रीम कोर्ट ने ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ शीर्षक वाले अध्याय पर कड़ी नाराजगी जताते हुए किताब के प्रकाशन और वितरण पर तत्काल रोक लगा दी है। इसी के साथ कांग्रेस ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया है कि पिछले एक दशक में द्वेषपूर्ण तरीके से पाठ्यपुस्तकों को दोबारा लिखा गया है और मौजूदा विवाद उसी का परिणाम है। यह घटनाक्रम शिक्षा व्यवस्था, अभिव्यक्ति की सीमा और न्यायपालिका की गरिमा जैसे अहम सवालों को केंद्र में ले आया है।

सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख

गुरुवार को चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने एनसीईआरटी की आठवीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान की उस किताब पर रोक लगा दी, जिसमें ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ से जुड़ा अध्याय शामिल था। कोर्ट ने इस किताब को छापने और बांटने पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगाया। सुप्रीम कोर्ट ने पहले से वितरित की जा चुकी प्रतियों को वापस लेने और डिजिटल प्लेटफॉर्म से इसकी कॉपियां हटाने का भी आदेश दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मामला गंभीर है और इसकी गहराई से जांच की जाएगी। अगली सुनवाई 11 मार्च को तय की गई है।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यह न्यायपालिका को बदनाम करने की “गहरी और सोची-समझी साजिश” प्रतीत होती है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि मामले में अवमानना की कार्रवाई पर विचार किया जा सकता है।

एनसीईआरटी और केंद्र को नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी के निदेशक और केंद्रीय शिक्षा सचिव को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। कोर्ट ने सिलेबस से जुड़ी बैठकों की कार्यवाही, विवादित अध्याय लिखने वाले लेखकों के नाम और उनकी शैक्षणिक योग्यता की जानकारी मांगी है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किताब के प्रिंटेड या डिजिटल संस्करण का वितरण यदि जारी रहता है, तो इसे आदेश का जानबूझकर उल्लंघन माना जाएगा। सभी राज्यों के शिक्षा विभागों को दो सप्ताह के भीतर कार्रवाई रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया है। साथ ही कोर्ट ने कहा है कि जांच रिपोर्ट मिलने के बाद एक समिति गठित की जाएगी, जो पूरे मामले की पड़ताल कर जिम्मेदार व्यक्तियों की पहचान करेगी।

सुप्रीम कोर्ट के चार प्रमुख निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में चार बड़े निर्देश जारी किए हैं 
- केंद्र और राज्यों के शिक्षा विभाग सुनिश्चित करें कि विवादित किताब, चाहे स्कूलों में हो, छपी हुई हो या डिजिटल रूप में उपलब्ध हो—उसे तुरंत आम पहुंच से हटाया जाए।

- किताब के प्रिंटेड या डिजिटल संस्करण का वितरण अदालत के आदेश का उल्लंघन माना जाएगा। 

- सभी राज्यों के मुख्य सचिव दो सप्ताह के भीतर की गई कार्रवाई की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपें।
- जांच रिपोर्ट के आधार पर कोर्ट एक कमेटी गठित करेगा, जो पूरे मामले की गहन जांच कर जिम्मेदार लोगों की पहचान करेगी।

इन निर्देशों से स्पष्ट है कि शीर्ष अदालत इस मुद्दे को अत्यंत गंभीरता से देख रही है।

कांग्रेस का आरोप: “द्वेष के साथ बदली गईं किताबें”

सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बीच कांग्रेस ने आरएसएस पर सीधा हमला बोला है। कांग्रेस का कहना है कि पिछले दस वर्षों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रभाव में पाठ्यपुस्तकों को “शरारत और द्वेष” के साथ दोबारा लिखा गया है। पार्टी का दावा है कि मौजूदा विवाद उसी प्रक्रिया का नतीजा है। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी पूरी तरह जायज है और शिक्षा व्यवस्था के साथ किसी भी प्रकार का वैचारिक प्रयोग देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। उनका आरोप है कि पाठ्यक्रमों में बदलाव के नाम पर संस्थागत संतुलन और संवैधानिक मूल्यों को प्रभावित किया गया है। हालांकि, इस आरोप पर आरएसएस या सरकार की ओर से विस्तृत प्रतिक्रिया अभी सामने नहीं आई है।

सरकारी सूत्रों की सफाई

सरकारी सूत्रों के मुताबिक, न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से संबंधित कुछ आंकड़े संसदीय अभिलेखों और नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड में उपलब्ध हैं। हालांकि, इन तथ्यों के क्रॉस वेरिफिकेशन के लिए केंद्र सरकार से परामर्श नहीं लिया गया था। सूत्रों का कहना है कि यदि तथ्यात्मक जानकारी दी भी गई थी, तो उसे प्रस्तुत करने का तरीका और संदर्भ महत्वपूर्ण है। शिक्षा सामग्री तैयार करते समय संवेदनशील संस्थाओं के बारे में संतुलित और जिम्मेदार भाषा का प्रयोग आवश्यक होता है। यह भी बताया गया कि कोर्ट की फटकार के बाद एनसीईआरटी ने बुधवार को माफी मांग ली थी। इससे संकेत मिलता है कि संस्था मामले को गंभीरता से ले रही है।

शिक्षा और संवैधानिक संस्थाओं पर बहस

यह विवाद शिक्षा सामग्री में संवैधानिक संस्थाओं की प्रस्तुति को लेकर व्यापक बहस छेड़ सकता है। एक ओर यह तर्क दिया जा रहा है कि छात्रों को संस्थागत संरचनाओं और उनकी चुनौतियों के बारे में तथ्यात्मक जानकारी मिलनी चाहिए। दूसरी ओर यह भी सवाल उठ रहा है कि क्या ऐसी सामग्री प्रस्तुत करने का तरीका न्यायपालिका की छवि को नुकसान पहुंचा सकता है। सुप्रीम कोर्ट का रुख इस बात को रेखांकित करता है कि संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा सर्वोपरि है। वहीं विपक्षी दलों का आरोप है कि पाठ्यक्रमों में वैचारिक हस्तक्षेप लोकतांत्रिक संतुलन के लिए चिंता का विषय है।

रिपोर्ट दाखिल करनी होगी


अब सबकी नजर 11 मार्च को होने वाली अगली सुनवाई पर है। तब तक राज्यों को अपनी रिपोर्ट दाखिल करनी होगी और एनसीईआरटी तथा शिक्षा मंत्रालय को भी कोर्ट के सवालों का जवाब देना होगा। यह मामला केवल एक अध्याय या एक किताब तक सीमित नहीं है। यह शिक्षा नीति, अकादमिक स्वतंत्रता, तथ्यात्मक प्रस्तुति और संस्थागत सम्मान के बीच संतुलन का प्रश्न बन चुका है। सुप्रीम कोर्ट की जांच और संभावित कमेटी की रिपोर्ट के बाद ही स्पष्ट होगा कि जिम्मेदारी किसकी है और आगे क्या कदम उठाए जाएंगे। फिलहाल, एनसीईआरटी की विवादित किताब पर रोक के साथ यह मामला देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है, जिसमें कानून, राजनीति और शिक्षा—तीनों के आयाम एक साथ जुड़े नजर आ रहे हैं।

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