नई दिल्ली: समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने लोकसभा में आम बजट पर चर्चा के दौरान केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने अमेरिका के साथ हुई कथित ‘डील’ को देशहित के खिलाफ बताते हुए इसे ‘डील नहीं, ढील’ करार दिया। यादव ने कहा कि सरकार की आर्थिक नीतियां और बजट की प्राथमिकताएं आम जनता, किसानों और कमजोर वर्गों के हितों के अनुरूप नहीं हैं।
‘डील’ पर सवाल: पहले बजट या पहले समझौता?
अखिलेश यादव ने अपने भाषण में अमेरिका के साथ हुए व्यापार समझौते को लेकर कई सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार लगातार विभिन्न देशों के साथ फ्री ट्रेड डील (एफटीए) करने का दावा करती रही है, लेकिन अब यह स्पष्ट नहीं है कि कितने देश ऐसे बचे हैं जिनसे अब तक कोई डील नहीं हुई है। उन्होंने सरकार से पूछा कि क्या यह डील बजट से पहले तय की गई थी या बजट के बाद? उनके मुताबिक, अगर यही समझौता करना था तो पहले क्यों नहीं किया गया। यादव ने कहा कि इस समझौते का वास्तविक लाभ क्या है, यह अभी स्पष्ट नहीं है, लेकिन इसके संभावित दुष्प्रभावों को लेकर चिंता जरूर है। रुपये की स्थिति को लेकर भी उन्होंने सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि ऐसे अंतरराष्ट्रीय समझौतों का सीधा असर मुद्रा विनिमय दर और घरेलू बाजार पर पड़ता है। ऐसे में सरकार को पारदर्शिता के साथ यह बताना चाहिए कि इस डील से देश की अर्थव्यवस्था को कितना लाभ और कितना नुकसान होगा।
‘18 बड़ा या जीरो?’: बजट की प्राथमिकताओं पर कटाक्ष
अखिलेश यादव ने तंज कसते हुए कहा कि देश को यह तय करना होगा कि 18 बड़ा है या जीरो। उनका इशारा टैरिफ और आयात-निर्यात नीतियों की ओर था। उन्होंने कहा कि अगर किसी वस्तु पर शुल्क कम या शून्य कर दिया जाता है तो इसका असर घरेलू उद्योगों और किसानों पर पड़ सकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार बजट के जरिए बड़े-बड़े आंकड़े पेश कर रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई ठोस बदलाव दिखाई नहीं दे रहा। उनके अनुसार, यह बजट दिशा और दृष्टि दोनों से रहित है।
गरीब, पिछड़े और दलित वर्ग की अनदेखी का आरोप
सपा प्रमुख ने कहा कि मौजूदा बजट में गरीब, पिछड़े और दलित वर्ग के लिए कोई स्पष्ट और ठोस प्रावधान नजर नहीं आता। उन्होंने सवाल किया कि जब देश का बजट लगातार बढ़ रहा है, तो आम आदमी की प्रति व्यक्ति आय क्यों नहीं बढ़ रही है? उन्होंने सरकार से मांग की कि वह यह बताए कि जो करोड़ों लोग फ्री राशन योजना का लाभ ले रहे हैं, उनकी प्रति व्यक्ति आय क्या है। यादव के अनुसार, यदि इतनी बड़ी संख्या में लोगों को मुफ्त राशन देना पड़ रहा है, तो यह संकेत है कि आर्थिक असमानता और गरीबी अब भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।
उत्तर प्रदेश के लिए विशेष योजनाओं का अभाव
अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश के संदर्भ में भी केंद्र सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि देश का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य होने के बावजूद बजट में उत्तर प्रदेश के लिए कोई विशेष योजना का उल्लेख नहीं है। उन्होंने दावा किया कि प्रधानमंत्री उत्तर प्रदेश से सांसद हैं, लेकिन केंद्र सरकार के बजट से राज्य में कोई बड़ा एक्सप्रेसवे नहीं बना है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जो परियोजनाएं शुरू की गईं, उनकी गुणवत्ता ‘विकसित भारत’ के मानकों के अनुरूप नहीं है। अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर बन रहे एक एक्सप्रेसवे का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि उसका नाम बदल दिया गया और परियोजना सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई है। उन्होंने इन परियोजनाओं में भ्रष्टाचार की आशंका भी जताई।
किसानों की आय दोगुनी करने के वादे पर सवाल
कृषि क्षेत्र को लेकर भी अखिलेश यादव ने सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि किसानों की आय दोगुनी करने का वादा अब तक पूरा नहीं हुआ है। अमेरिका के साथ हुए समझौते का हवाला देते हुए उन्होंने आशंका जताई कि यदि बड़े पैमाने पर कृषि उत्पादों का आयात बढ़ता है, तो भारतीय किसानों की प्रतिस्पर्धा और बाजार हिस्सेदारी प्रभावित हो सकती है। यादव ने पूछा कि यदि विदेशी उत्पाद सस्ते दाम पर भारतीय बाजार में आएंगे, तो किसान क्या उगाएगा और किस दाम पर बेचेगा? उन्होंने कहा कि सरकार एग्री इंफ्रास्ट्रक्चर और मंडियों के आधुनिकीकरण की बात तो करती है, लेकिन किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी गारंटी अब तक नहीं दी गई है। उन्होंने हर्टिकल्चर फसलों और दुग्ध उत्पादन के बढ़ते आंकड़ों का जिक्र करते हुए कहा कि आंकड़े गिनाने से किसानों की आय सुनिश्चित नहीं होती। असली सवाल यह है कि एमएसपी की कानूनी गारंटी कब दी जाएगी।
सरकार से पारदर्शिता की मांग
अपने भाषण के दौरान अखिलेश यादव ने सरकार से आग्रह किया कि वह अमेरिका के साथ हुए समझौते की शर्तों को स्पष्ट करे। उन्होंने कहा कि संसद और देश की जनता को यह जानने का अधिकार है कि इस डील के तहत किन क्षेत्रों में रियायतें दी गई हैं और बदले में भारत को क्या लाभ मिला है। उन्होंने कहा कि बजट और अंतरराष्ट्रीय समझौते देश की आर्थिक दिशा तय करते हैं। ऐसे में सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इन फैसलों का बोझ गरीबों, किसानों और मध्यम वर्ग पर न पड़े।
राजनीतिक तापमान में बढ़ोतरी
लोकसभा में अखिलेश यादव के इस आक्रामक रुख ने राजनीतिक माहौल को और गर्म कर दिया है। जहां विपक्ष सरकार से जवाबदेही की मांग कर रहा है, वहीं सरकार की ओर से इन आरोपों पर विस्तृत प्रतिक्रिया आने की संभावना है। बजट सत्र के दौरान ‘डील बनाम ढील’ का यह मुद्दा आने वाले दिनों में और चर्चा का विषय बन सकता है। फिलहाल, सपा प्रमुख ने स्पष्ट कर दिया है कि उनकी पार्टी इन मुद्दों को संसद और सड़क दोनों जगह उठाती रहेगी।