बंगाल SIR मामले में सुप्रीम कोर्ट सख्त: अंतिम मतदाता सूची जारी करने का समय एक सप्ताह बढ़ाया, DGP डीजीपी से मांगा हलफनामा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एसआईआर की मौजूदा अंतिम तिथि 14 फरवरी थी, जिसे अब एक सप्ताह आगे बढ़ाया जा रहा है। अदालत ने निर्वाचन आयोग (ECI) को निर्देश दिया कि अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित करने से पहले जांच प्रक्रिया को पर्याप्त समय दिया जाए।

Update: 2026-02-09 15:30 GMT
नई दिल्‍ली। पश्चिम बंगाल में प्रस्तावित विधानसभा चुनावों से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision—SIR) को लेकर चल रहा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट में है। इस मामले में सोमवार को सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने महत्वपूर्ण अंतरिम निर्देश जारी किए और एसआईआर की समयसीमा एक सप्ताह बढ़ाने का आदेश दिया। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि प्रक्रिया को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने के लिए अतिरिक्त समय आवश्यक है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अंतिम निर्णय निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) का ही होगा, जबकि माइक्रो-ऑब्जर्वर या राज्य सरकार के अधिकारी केवल सहयोग की भूमिका निभाएंगे।

डेडलाइन एक सप्ताह बढ़ी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एसआईआर की मौजूदा अंतिम तिथि 14 फरवरी थी, जिसे अब एक सप्ताह आगे बढ़ाया जा रहा है। अदालत ने निर्वाचन आयोग (ECI) को निर्देश दिया कि अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित करने से पहले जांच प्रक्रिया को पर्याप्त समय दिया जाए। पीठ ने कहा कि चूंकि प्रक्रिया में नए सरकारी अधिकारियों को शामिल किया गया है, इसलिए दस्तावेजों की जांच में अतिरिक्त समय लग सकता है। ऐसे में ईआरओ को 14 फरवरी के बाद एक सप्ताह का अतिरिक्त समय दिया जाना उचित है।

नए अधिकारियों की भूमिका पर स्पष्टता

अदालत ने कहा कि माइक्रो-ऑब्जर्वर या राज्य सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए अधिकारी केवल ईआरओ की सहायता करेंगे। अंतिम निर्णय लेने का अधिकार केवल ईआरओ के पास रहेगा। सीजेआई सूर्यकांत ने निर्देश दिया कि राज्य सरकार यह सुनिश्चित करे कि 8,555 ग्रुप-बी अधिकारी, जिनकी सूची अदालत में सौंपी गई है, उसी दिन शाम 5 बजे तक जिला निर्वाचन अधिकारियों (DRO/DEO) को रिपोर्ट करें। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग के पास मौजूदा ईआरओ और एईआरओ को बदलने का अधिकार है और वह योग्य पाए जाने पर नए अधिकारियों की सेवाएं ले सकता है।

सुनवाई के दौरान अदालत की सख्ती

सुनवाई के दौरान अदालत में बहस के दौरान कुछ क्षणों में तीखी नोकझोंक भी देखने को मिली। जब कई वकील एक साथ बोलने लगे तो चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने नाराजगी जाहिर की और कहा कि अदालत में अनुशासन और गरिमा बनाए रखना जरूरी है। सीजेआई ने तल्ख लहजे में कहा, “क्या आप बाजार में बैठे हैं या अदालत में?” उन्होंने वकीलों को बारी-बारी से अपनी दलीलें रखने की हिदायत दी। पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस एन.वी. अंजरिया भी शामिल थे।

डीजीपी को हलफनामा दाखिल करने का आदेश

सुनवाई के दौरान निर्वाचन आयोग ने आरोप लगाया कि कुछ असामाजिक तत्वों ने फॉर्म-7 (आपत्ति फॉर्म) जलाए हैं। आयोग के इस आरोप को गंभीरता से लेते हुए अदालत ने पश्चिम बंगाल के पुलिस महानिदेशक (DGP) को हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने डीजीपी से पूछा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं और अब तक कितनी एफआईआर दर्ज की गई हैं। अदालत ने कहा कि यदि चुनाव आयोग के आरोप सही हैं और अब तक कोई एफआईआर दर्ज नहीं हुई है, तो यह चिंताजनक स्थिति है। सुनवाई में यह भी सामने आया कि मैनपावर की कमी के कारण चुनाव आयोग को माइक्रो-ऑब्जर्वर नियुक्त करने पड़े थे।

इस पर राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील श्याम दीवान ने कहा कि सरकार ने 8,500 अधिकारियों की व्यवस्था कर दी है। सीजेआई ने चुनाव आयोग से पूछा कि क्या इन अधिकारियों की सूची मिल गई है। आयोग के वकील ने कहा कि अभी तक नाम प्राप्त नहीं हुए हैं। बाद में पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से पूर्व मुख्य सचिव और वर्तमान प्रधान सचिव मनोज पंत ने अदालत को बताया कि 292 ईआरओ (ग्रुप-ए, एसडीएम रैंक) के नाम भेजे गए हैं, जिनमें कुछ आईएएस अधिकारी भी शामिल हैं। इसके अलावा 8,525 सहायक ईआरओ उपलब्ध कराए गए हैं। अधिकारियों की सूची में लगभग 65 प्रतिशत ग्रुप-बी, 10-12 प्रतिशत ग्रुप-सी और शेष ग्रुप-ए के अधिकारी हैं।

आयोग और राज्य सरकार के तर्क

राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि आयोग ने पहले ग्रुप-बी अधिकारियों की मांग नहीं की थी। उन्होंने कहा कि अदालत के सुझाव के बाद ही इन अधिकारियों की सूची तैयार की गई और ईमेल के माध्यम से आयोग को भेजी गई है। वहीं, सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने आयोग की ओर से दलील दी कि अदालत के फैसले से यह संदेश जाना चाहिए कि संविधान पूरे देश में समान रूप से लागू होता है। उन्होंने कहा कि आयोग ने विस्तृत हलफनामा दाखिल किया है, जिसमें कई चिंताजनक बिंदु उठाए गए हैं।

ममता बनर्जी की याचिका में क्या है?

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपनी याचिका में एसआईआर प्रक्रिया की वैधता पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि यह प्रक्रिया राजनीतिक पक्षपात से प्रेरित है और इससे समाज के कमजोर वर्गों के लाखों मतदाताओं के नाम हटाए जा सकते हैं। उन्होंने अदालत से अनुरोध किया कि एसआईआर के दौरान किसी भी मतदाता का नाम न हटाया जाए, विशेष रूप से उन मामलों में जहां केवल तकनीकी या वर्तनी संबंधी विसंगतियां हों। पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि स्थानीय बोलियों के कारण नामों की वर्तनी में अंतर होना आम बात है और इसे मतदाता को सूची से बाहर करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।

महिलाओं और प्रवासी मतदाताओं की चिंता

ममता बनर्जी ने यह भी कहा कि शादी के बाद नाम बदलने वाली महिलाएं और निवास स्थान बदलने वाले लोग इस प्रक्रिया से अधिक प्रभावित हो सकते हैं। उनका आरोप है कि पश्चिम बंगाल को विशेष रूप से निशाना बनाया जा रहा है, जबकि अन्य राज्यों में इसी तरह की व्यापक संशोधन प्रक्रिया नहीं चल रही है। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग को कई बार शिकायतें भेजी गईं, लेकिन कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला।

अदालत का आश्वासन

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान आश्वासन दिया कि कोई भी वास्तविक मतदाता अपने अधिकार से वंचित नहीं होगा। अदालत ने कहा कि व्यावहारिक और संतुलित समाधान निकाला जाएगा, जिससे पारदर्शिता और निष्पक्षता दोनों सुनिश्चित हों। फिलहाल, एसआईआर की समयसीमा बढ़ाए जाने के साथ ही राज्य सरकार और चुनाव आयोग को स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए गए हैं। अब सभी की नजर अगली सुनवाई और इस प्रक्रिया के अंतिम परिणाम पर टिकी है, क्योंकि मतदाता सूची का अंतिम स्वरूप ही आगामी विधानसभा चुनाव की आधारशिला तय करेगा।

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