स्टैंड-अप कामेडियन कुणाल कामरा के खिलाफ केस दर्ज करने से कोर्ट ने किया इन्कार, कहा, व्‍यंग्‍य चुभ सकता है, यह अपराध नहीं

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि महज तीखी, असहज या आलोचनात्मक टिप्पणी जब तक वह हिंसा या सार्वजनिक अशांति के लिए उकसावे का कारण न बने उसे आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक जीवन में सक्रिय व्यक्तियों को सामान्य नागरिकों की तुलना में अधिक आलोचना और व्यंग्य का सामना करना पड़ता है।

Update: 2026-01-31 03:51 GMT

नई दिल्ली। महाराष्ट्र की राजनीतिक उठा-पटक पर बनाए गए एक व्यंग्यात्मक वीडियो को लेकर स्टैंड-अप कॉमेडियन कुणाल कामरा के खिलाफ नई प्राथमिकी दर्ज कराने की मांग को दिल्ली की रोहिणी कोर्ट ने खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि आपराधिक कानून का इस्तेमाल हास्य, असहमति या राजनीतिक आलोचना को नियंत्रित करने के लिए नहीं किया जा सकता।

न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी हिमांशु सहलोत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 175(3) के तहत दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि एक ही घटना के आधार पर अलग-अलग स्थानों पर कई एफआईआर दर्ज कराना कानून की भावना के विपरीत होगा और यह दुरुपयोग की श्रेणी में आ सकता है।

असहमति अपराध नहीं

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि महज तीखी, असहज या आलोचनात्मक टिप्पणी जब तक वह हिंसा या सार्वजनिक अशांति के लिए उकसावे का कारण न बने उसे आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक जीवन में सक्रिय व्यक्तियों को सामान्य नागरिकों की तुलना में अधिक आलोचना और व्यंग्य का सामना करना पड़ता है। किसी टिप्पणी से आहत भावना मात्र, आपराधिकता की कसौटी नहीं हो सकती। न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि लोकतंत्र को व्यंग्य या असहमति से खतरा नहीं होता, बल्कि असहिष्णुता से होता है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर जोर


अदालत ने कहा कि यह मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की राज्य की जिम्मेदारी के बीच संतुलन से जुड़ा है। न्यायालय का दायित्व यह तय करना है कि क्या राज्य अपनी दंडात्मक शक्ति का प्रयोग कानूनसम्मत तरीके से कर सकता है। कोर्ट ने कहा कि उसका काम किसी अभिव्यक्ति की शालीनता, पसंद या नापसंद का मूल्यांकन करना नहीं है। अदालत ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लोकतंत्र की “ऑक्सीजन” बताते हुए टिप्पणी की कि कानून को उसे दबाने के बजाय उसके साथ सांस लेनी चाहिए।

क्या है मामला?


याचिका में आरोप लगाया गया था कि कुणाल कामरा ने मार्च 2025 में ‘नया भारत’ शीर्षक से एक वीडियो अपलोड किया, जिसमें महाराष्ट्र में हुए राजनीतिक दल-बदल पर व्यंग्य किया गया। वीडियो में उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे पर भी टिप्पणी की गई थी। शिकायतकर्ता, जो शिवसेना के एक धड़े से जुड़े दिल्ली निवासी पदाधिकारी बताए गए हैं, ने अदालत से अनुरोध किया था कि वीडियो को लेकर न्यायालय की निगरानी में नई एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया जाए। याचिका में कहा गया था कि वीडियो में “गद्दार” और “दल-बदलू” जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा गया है, जिससे विभिन्न राजनीतिक और वैचारिक समूहों के बीच वैमनस्य फैल सकता है।

पुलिस की रिपोर्ट और पहले से दर्ज एफआईआर

सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष प्रस्तुत एक्शन टेकन रिपोर्ट (एटीआर) में बताया गया कि इसी वीडियो को लेकर मुंबई के खार पुलिस थाने में पहले ही प्राथमिकी दर्ज की जा चुकी है। यह एफआईआर महाराष्ट्र के एक विधायक की शिकायत पर दर्ज हुई थी और मामले की जांच जारी है। इसी प्रकरण में बंबई हाई कोर्ट ने कुणाल कामरा को अग्रिम जमानत प्रदान की है। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए रोहिणी कोर्ट ने माना कि समान घटना के संबंध में एक और एफआईआर दर्ज कराने का निर्देश देना उचित नहीं होगा।

‘मल्टीपल एफआईआर’ पर अदालत की आपत्ति


अदालत ने अपने आदेश में कहा कि एक ही घटना के आधार पर विभिन्न स्थानों पर कई एफआईआर दर्ज कराना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग हो सकता है। यह सिद्धांत आपराधिक कानून के उस मूल ढांचे से जुड़ा है, जिसका उद्देश्य अभियोजन की निष्पक्षता और आरोपी के अधिकारों की रक्षा करना है। कोर्ट ने कहा कि जब एक मामले की जांच पहले से चल रही है, तब उसी सामग्री के आधार पर नई प्राथमिकी दर्ज कराना उचित नहीं ठहराया जा सकता।

व्यापक संदेश



कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण संदेश देता है। अदालत ने यह स्पष्ट किया है कि राजनीतिक व्यंग्य, चाहे वह तीखा क्यों न हो, स्वतः आपराधिक कार्रवाई का आधार नहीं बन सकता। साथ ही, अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि राज्य की शक्ति का इस्तेमाल संतुलित और कानूनसम्मत तरीके से होना चाहिए।

असहमति और व्यंग्य की गुंजाइश


मुंबई में दर्ज प्राथमिकी की जांच जारी है और मामले की कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। हालांकि, रोहिणी कोर्ट का यह फैसला उन मामलों में मार्गदर्शक माना जा सकता है, जहां राजनीतिक या सामाजिक मुद्दों पर की गई टिप्पणी को आपराधिक रंग देने की कोशिश की जाती है। इस आदेश के साथ अदालत ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि लोकतंत्र में असहमति और व्यंग्य की गुंजाइश बनी रहनी चाहिए, और आपराधिक कानून का दायरा सीमित और विवेकपूर्ण होना चाहिए।

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