अजीत पवार: गुट के मजबूत स्तंभ
अजीत पवार ने जुलाई 2023 में अपने चाचा शरद पवार से अलग होकर बड़ा राजनीतिक दांव खेला था। उन्होंने न सिर्फ 41 विधायकों के अपने गुट को एकजुट रखा, बल्कि शिवसेना-भाजपा के साथ गठबंधन कर सत्ता में भी प्रवेश किया। इसके बाद उन्होंने नए राजनीतिक समीकरणों के तहत पहले लोकसभा और फिर विधानसभा चुनाव लड़े। हालांकि लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी को खास सफलता नहीं मिली, लेकिन विधानसभा चुनाव में राकांपा (अजीत पवार) के 41 विधायक जीतकर विधानसभा पहुंचे। यह परिणाम अजीत पवार की सांगठनिक क्षमता और राजनीतिक पकड़ को दर्शाता था। उनके निधन के साथ ही यह सवाल सबसे बड़ा बनकर उभरा है कि अब इस गुट की कमान कौन संभालेगा।नेतृत्व को लेकर अनिश्चितता
अजीत पवार के बिना पार्टी के भीतर नेतृत्व का स्पष्ट चेहरा फिलहाल नजर नहीं आता। महानगरपालिका चुनावों में हालिया प्रदर्शन ने भी पार्टी की स्थिति को कमजोर दिखाया है। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि विधायकों के बीच गुटबाजी और खींचतान बढ़ सकती है। परिवार की बात करें तो अजीत पवार के पीछे पत्नी सुनेत्रा पवार, जो वर्तमान में राज्यसभा सदस्य हैं, और दो बेटे पार्थ पवार एवं जय पवार रह गए हैं। सुनेत्रा पवार का राज्य की सक्रिय राजनीति में अनुभव सीमित माना जाता है। वहीं, ज्येष्ठ पुत्र पार्थ पवार पार्टी संगठन से जुड़े हुए हैं और राजनीति में उनकी रुचि भी स्पष्ट है। हालांकि बड़ा सवाल यह है कि क्या पार्टी विधायक दल और वरिष्ठ नेता पार्थ को स्वाभाविक उत्तराधिकारी के रूप में स्वीकार करेंगे, या फिर किसी अनुभवी नेता को आगे किया जाएगा।शरद पवार की पार्टी में विलय के संकेत
अजीत पवार के निधन से पहले ही दोनों राकांपा गुटों के बीच सुलह की चर्चाएं तेज हो चुकी थीं। पिछले सप्ताह हुए महाराष्ट्र के महानगरपालिका चुनाव अजीत पवार और शरद पवार की पार्टियों ने मिलकर लड़े थे, हालांकि परिणाम दोनों के लिए निराशाजनक रहे। चुनावी नतीजों के बाद अजीत पवार ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि उनके परिवार में एकता हो चुकी है और कार्यकर्ता चाहते हैं कि दोनों पार्टियां भी एक हो जाएं। इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई थी कि जल्द ही दोनों राकांपा का विलय संभव है। कयास लगाए जा रहे थे कि अप्रैल में शरद पवार का राज्यसभा कार्यकाल पूरा होने के समय या फिर 10 जून को राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के स्थापना दिवस के मौके पर दोनों दलों का औपचारिक एकीकरण हो सकता है। अब अजीत पवार के निधन के बाद यह सवाल और जटिल हो गया है कि क्या यह प्रक्रिया तेज होगी या ठंडे बस्ते में चली जाएगी।भावनात्मक माहौल और ‘पुनर्मिलन’ की मांग
अजीत पवार के निधन के बाद शरद पवार, सुप्रिया सुले और पवार परिवार के अन्य सदस्य बारामती पहुंच गए हैं। इस भावनात्मक माहौल में कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं के बीच ‘पुनर्मिलन’ की मांग और तेज हो सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि दोनों पार्टियों का औपचारिक विलय नहीं होता, तो अजीत पवार गुट के कई नेता खुद को असुरक्षित महसूस कर सकते हैं और शरद पवार के नेतृत्व में ‘घर वापसी’ का रास्ता चुन सकते हैं। शरद पवार अब भी महाराष्ट्र की राजनीति के सबसे कद्दावर और अनुभवी नेताओं में गिने जाते हैं।गठबंधन से अलग होने की संभावना कम
हालांकि यह संभावना फिलहाल तुरंत बनती नहीं दिख रही। अजीत पवार गुट के करीब 40 विधायक इस समय भाजपा के नेतृत्व वाली देवेंद्र फडणवीस सरकार का हिस्सा हैं। सत्ता से बाहर जाना न तो उनके राजनीतिक हित में होगा और न ही व्यक्तिगत प्रभाव के लिहाज से। विशेषज्ञों का कहना है कि निकट भविष्य में ये विधायक सरकार से समर्थन वापस लेंगे, इसकी संभावना बेहद कम है। सत्ता में बने रहने के लिए पार्टी नेतृत्व स्तर पर बातचीत का रास्ता चुना जा सकता है।सरकार में पदों को लेकर मंथन संभव
यदि अजीत पवार के निधन के बाद सरकार में संतुलन बिगड़ता है, तो राकांपा विधायक दल के नेता, उपमुख्यमंत्री पद और वित्त मंत्रालय जैसे अहम विभागों को लेकर बातचीत हो सकती है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सुनील तटकरे और कार्यकारी अध्यक्ष प्रफुल्ल पटेल मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के साथ चर्चा कर कोई व्यावहारिक समाधान निकालने की कोशिश कर सकते हैं।संक्रमण काल में राकांपा
अजीत पवार का जाना राकांपा (अजीत पवार) के लिए सिर्फ एक नेता का खोना नहीं, बल्कि संगठनात्मक रीढ़ के कमजोर पड़ने जैसा है। आने वाले हफ्ते तय करेंगे कि पार्टी नेतृत्व के नए चेहरे के साथ आगे बढ़ेगी, शरद पवार की पार्टी में विलय का रास्ता चुनेगी या फिर आंतरिक संघर्ष से जूझेगी।महाराष्ट्र की राजनीति फिलहाल एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां हर फैसला दूरगामी असर डाल सकता है।