अजीत पवार के निधन के बाद सुनेत्रा या पार्थ पवार में से कौन लेगा स्थान, कौन बनेगा उपमुख्‍यमंत्री

चूंकि मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल अभी करीब चार वर्ष शेष है, इसलिए अजीत पवार के निधन से खाली हुई बारामती सीट पर उपचुनाव होना तय है। राजनीतिक गलियारों में लगभग यह तय माना जा रहा है कि इस सीट से पवार परिवार का ही कोई सदस्य उम्मीदवार होगा और उसकी जीत की संभावना भी मजबूत मानी जा रही है।

Update: 2026-01-29 21:46 GMT
पुणे। महाराष्ट्र की राजनीति में अपनी आक्रामक कार्यशैली, निर्णायक तेवर और सांगठनिक क्षमता के लिए पहचाने जाने वाले उपमुख्यमंत्री अजीत पवार के आकस्मिक निधन ने राज्य की सियासत को गहरे शोक और अनिश्चितता में डाल दिया है। विमान दुर्घटना में बुधवार को हुए उनके निधन के बाद सबसे बड़ा सवाल बारामती विधानसभा सीट को लेकर खड़ा हो गया है—वह सीट, जो दशकों से पवार परिवार की राजनीति का केंद्र रही है। चूंकि मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल अभी करीब चार वर्ष शेष है, इसलिए अजीत पवार के निधन से खाली हुई बारामती सीट पर उपचुनाव होना तय है। राजनीतिक गलियारों में लगभग यह तय माना जा रहा है कि इस सीट से पवार परिवार का ही कोई सदस्य उम्मीदवार होगा और उसकी जीत की संभावना भी मजबूत मानी जा रही है। असली सवाल यह है कि परिवार किस चेहरे पर दांव लगाएगा—सुनेत्रा पवार या पार्थ पवार?

अजीत पवार: एक ऐसा कद, जिसकी बराबरी मुश्किल

क्षमता, निर्णय लेने की रफ्तार और राजनीतिक पकड़ इन तमाम पैमानों पर अजीत पवार का मुकाबला न उनके परिवार में और न ही उनकी पार्टी में किसी से किया जाता रहा है। बारामती से उन्होंने आठ बार विधानसभा जीतकर अपनी पकड़ को लगातार मजबूत किया। उनकी गैरमौजूदगी में यह सीट केवल एक निर्वाचन क्षेत्र नहीं, बल्कि राजनीतिक विरासत का प्रतीक बन गई है।

उपचुनाव की तैयारी और संभावित चेहरे

अजीत पवार के जाने के बाद एनसीपी खेमे में मंथन तेज हो गया है। सूत्रों के मुताबिक, उनकी पत्नी और वर्तमान राज्यसभा सांसद सुनेत्रा पवार का नाम सबसे आगे चल रहा है। चर्चा यह भी है कि सुनेत्रा पवार को महाराष्ट्र का उपमुख्यमंत्री बनाया जा सकता है, ताकि पार्टी और सरकार दोनों में नेतृत्व का संतुलन बना रहे। सूत्र बताते हैं कि एनसीपी के वरिष्ठ नेता प्रफुल्ल पटेल, छगन भुजबल, धनंजय मुंडे और सुनील तटकरे ने हाल ही में सुनेत्रा पवार से मुलाकात की है। इस प्रस्ताव को लेकर पार्टी नेतृत्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से भी चर्चा करने की तैयारी में है।

पार्थ पवार का विकल्प

दूसरी ओर, अजीत पवार के ज्येष्ठ पुत्र पार्थ पवार भी इस दौड़ में मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं। पार्थ ने 2019 में पड़ोसी मावल लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था, हालांकि उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद वे सक्रिय चुनावी राजनीति से दूर रहे। अब बारामती उपचुनाव को पार्थ की राजनीतिक पुनःप्रवेश का अवसर माना जा रहा है। पार्टी के कुछ नेताओं का मानना है कि यह सीट युवा नेतृत्व को आगे लाने के लिए उपयुक्त मंच हो सकती है।

पवार परिवार की राजनीति

पिछले तीन वर्षों में पवार परिवार ने जिस तरह के उतार-चढ़ाव देखे, वह महाराष्ट्र की राजनीति में विरल हैं। शरद पवार द्वारा पार्टी की कमान अजीत पवार को न सौंपे जाने से नाराज होकर अजीत ने जुलाई 2023 में एनसीपी को विभाजित कर दिया और पार्टी के दो-तिहाई से अधिक विधायकों को अपने साथ कर लिया। यह टकराव 2024 के लोकसभा चुनाव में चरम पर पहुंचा, जब अजीत पवार ने बारामती से अपनी पत्नी सुनेत्रा पवार को, अपनी चचेरी बहन सुप्रिया सुले के खिलाफ मैदान में उतारा। हालांकि, बारामती की जनता ने चाचा शरद पवार के पाले में रहना चुना और सुप्रिया सुले पहले से भी बड़े अंतर से चौथी बार संसद पहुंचीं।

हार के बाद राज्यसभा और फिर विधानसभा जीत

लोकसभा में हार के बाद अजीत पवार ने सुनेत्रा पवार को राज्यसभा भेजकर दिल्ली की राजनीति में मजबूत किया। इस फैसले का पार्टी के वरिष्ठ नेता छगन भुजबल ने विरोध भी किया, लेकिन अजीत अपने निर्णय पर अडिग रहे।दिलचस्प यह रहा कि जहां लोकसभा में सुनेत्रा पवार को हार मिली, वहीं छह महीने बाद हुए विधानसभा चुनाव में अजीत पवार खुद आठवीं बार बारामती से जीतने में सफल रहे। उस चुनाव में शरद पवार गुट ने उनके ही भतीजे युगेंद्र पवार को मैदान में उतारा था, लेकिन अजीत की पकड़ के आगे वह चुनौती टिक नहीं सकी।

शरद पवार और सुप्रिया सुले की भूमिका

अजीत पवार के असमय निधन के बाद समीकरण एक बार फिर बदलते नजर आ रहे हैं। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि बदले हालात में शरद पवार और सुप्रिया सुले का समर्थन पार्थ पवार को मिल सकता है। यदि ऐसा होता है, तो यह न केवल पारिवारिक मेल का संकेत होगा, बल्कि बारामती की राजनीति में एक नई शुरुआत भी मानी जाएगी।

एनसीपी के भविष्य पर भी नजर

इन सबके बीच यह चर्चा भी तेज है कि एनसीपी का अजीत पवार गुट शरद पवार गुट से विलय कर सकता है। यदि ऐसा होता है, तो बारामती उपचुनाव केवल एक सीट का चुनाव नहीं रहेगा, बल्कि वह एनसीपी के भविष्य की दिशा तय करने वाला मुकाबला बन जाएगा।

निष्कर्ष: विरासत बनाम भविष्य

बारामती की सियासत एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर है। एक ओर सुनेत्रा पवार हैं—अनुभव, संसदीय हैसियत और प्रशासनिक संभावनाओं के साथ। दूसरी ओर पार्थ पवार—युवा चेहरा, नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व और बदले समीकरणों में संभावित सर्वसम्मति।

अजीत पवार के जाने से खाली हुई जगह केवल एक सीट नहीं, बल्कि एक राजनीतिक विरासत है। यह देखना दिलचस्प होगा कि पवार परिवार और एनसीपी इस विरासत को अनुभव के भरोसे सौंपते हैं या भविष्य की ओर कदम बढ़ाते हैं।

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