प. बंगाल समेत सभी राज्यों में नफ़रत की राजनीति करेगी बीजेपी – सिंघवी

कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद और जाने माने वकील अभिषेक मनु सिंघवी से देशबंधु समूह के मुख्य संपांदक राजीव रंजन श्रीवास्तव की तमाम सवालों पर बातचीत

By :  Atul Sinha
Update: 2026-01-06 04:26 GMT

कांग्रेस के एक बड़े नेता रहे हैं अभिषेक मनुसिं। पेशे से मशहूर वकील हैं। कांग्रेस के प्रवक्ता भी हैं और लेखक विचारक तो हैं ही। देशबंधु समूह और डीबी लाइव के एडिटर इन चीफ राजीव रंजन श्रीवास्तव से हर पखवारे तमाम सवालों पर अभिषेक मनु सिंघवी विस्तार से बात करते हैं। इस बार अभिषेक मनु सिंघवी से तब बात हुई जब संसद का शीतकालीन सत्र खत्म हुआ, मनरेगा हटा दिया गया, नेशनल हेरॉल्ड मामले में गांधी परिवार पर जबरन केस फाइल हुआ और उसे अदालत ने खारिज किया। बांग्लादेश की हालत बेहद खराब रही। वहां जेन ज़ी सड़कों पर उतर आया। हिंसा की तमाम घटनाएं हुईं। इसके अलावा भी कई मुद्दे उठे इस बातचीत में। पेश है चार बार के सांसद रहे अभिषेक मनु सिंघवी के साथ राजीव रंजन श्रीवास्तव की उसी बातचीत के कुछ हिस्से।

नेशनल हेरॉल्ड मामला बेबुनियाद

राजीव रंजन श्रीवास्तव -- संसद की कार्यवाही कुछ समय पहले खत्म हुई है। मनरेगा काफी चर्चा में रहा उसमें। उससे पहले भी वंदे मातरम से लेकर चुनाव सुधार पर चर्चा हुई हैं। लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा में जो है वो मनरेगा है। विकसित भारत जी राम जी योजना उस पर भी आएंगे। लेकिन उससे पहले नेशनल हेराल्ड केस पर आना चाहता हूं। जिस केस को आप ही लड़ रहे हैं और राउज़ एवन्यू कोर्ट से उस केस को खारिज कर दिया गया। आपने हमें विस्तार से बताया भी था कि यह केस टिकने वाला नहीं लगता। लेकिन उसके आगे अब इसको चुनौती ईडी ने दे दी है हाईकोर्ट में। अब आगे की प्रक्रिया। बहुत कुछ आप बता चुके हैं। थोड़ा आगे की प्रक्रिया समझाने की कोशिश कीजिए।

अभिषेक मनु सिंघवी – जी। मैंने कहा था ये एक अजीबोगरीब केस है। स्थानांतरण अचल संपत्ति का स्थानांतरण रुपए पैसे का 1 मि.मी. नहीं हुआ। ए से बी, बी से सी। और फिर भी एक अजीबोगरीब एक अनूठा सा एमएल मनी लॉन्ड्रिंग का केस बन गया जिसमें कि स्थानांतरण होना या कन्वर्जन होना अति आवश्यक है। यह तो हुई मेरिट्स की बात। जी, वही कंपनी AJL (एजेल), जो सैकड़ों सालों से रखती है वही अचल संपत्ति उसी की अचल संपत्ति है। एजेएल अपने आप को डेप्ट फ्री ऋण मुक्त करने के लिए एक असाइनमेंट करती है अपने ऋण का, और उसको कन्वर्ट करती है इक्विटी में जो कि आज सैकड़ों कंपनियां आमतौर पर हिंदुस्तान में करती हैं। जो वह अपने ऋण को कन्वर्ट करती है हिस्सेदारी में। इक्विटी में वह होती है। कंपनी सेक्शन आठ सेक्शन 25 की कंपनी जो नॉट फॉर प्रॉफिट कंपनी होती है जिसमें डिविडेंड का एक पैसा नहीं ले सकती सोनिया गांधी, राहुल गांधी, खरगे जी, जिसमें गाड़ी, घोड़ा, पर्क्स, घर कुछ नहीं मिलता। तो ये कैसा स्थानांतरण हुआ मुझे समझ नहीं आया| खैर वो तो वही बात जो पहले कही थी मैंने। उसके बाद जो मैंने आपको कहा जो अब निर्णय में आया है क्योंकि तीन भाग में बांट रहा हूं निर्णय की बात कर रहा हूं निर्णय के बाद जो नोटिस हुआ है वह तो हाल रह ही में हुआ है। उसकी बात बाद मैं करूंगा। निर्णय आया उसमें बड़े चौंकाने वाली बात लिखी गई है। और यह जानना जरूरी है आपके दर्शकों को जिन्होंने पहले ये नहीं सुना होगा। देखिए इसमें तीन या चार मील के पत्थर वाली तारीखें आवश्यक हैं। जैसे दिखाता है कि क्यों पूर्णतया राजनीतिक प्रतिशोध और द्वेष की भावना से हुआ है। 2013 तक कुछ था नहीं। 13 में एक निजी व्यक्ति यानी प्राइवेट पर्सन कितने भी वो वरिष्ठ हों लेकिन है वो एक सरकारी व्यक्ति नहीं है। पुलिस अफसर नहीं है। सुब्रमण्यम स्वामी साहब ने एक कंप्लेंट फाइल की। मैजिस्ट्रेट ने उस पर समंस इशू किया। वो केस चल रहा है। मैंने आपको पहले बता दिया है कि वो रोचक बात ये है कि एक दो साल बाद खुद स्वामी साहब ने अपने खुद के केस को स्थगित यानी स्टे कर दिया आंतरिक स्टे हाई कोर्ट जाकर किसी तकनीकी मामले में तो वो पड़ा हुआ है। वो शुरू हुआ एक प्राइवेट निजी व्यक्ति के एक कंप्लेंट द्वारा जो मैजिस्ट्रेट के सामने है। अब यह 14 से 21 तक ये हाल है। अब रोचक बात ये है कि 13-14 में ही स्वामी साहब ने छत पे खड़े हो के चीख-चीख के लिखी चिट्ठियां सीबीआई को और ईडी को भेजीं कि भाई मैंने ये केस दायर किया है। ये केस के तथ्य हैं। आप कर सकते हो इसमें एफआईआर आप कर सकते हो अपनी खुद की कंप्लेंट। जी सात साल तक ये बहुत महत्वपूर्ण बात बोल रहा हूं मैं आपको। फाइल पे लिखा है सीडी सीबीआई की फाइल पर लिखा है। ईडी की कोई प्रेडिकेट ऑफेंस सीबीआई ने लिखा है। मुख्य तौर पर ईडी तो बाद में आती है कोई प्रेडिकेट ऑफेंस यानी मूल ऑफेंस नहीं बनता इसमें जिसमें हम एफआईआर करें। एक बार मत नहीं, चार बार मत। ये न्यायाधीश ने रिकॉर्ड किया है। इन तारीखों को ये ओपिनियंस आईं जिसमें लिखा है कि कोई प्रिडिकेट ऑफिस बनता ही नहीं। हमको कुछ नहीं करना है। ये हुआ कब से 13- 14 से लेके 21 तक। 7 साल छोटे नहीं होते, छ साल कम नहीं होते। हम 2021 में अचानक और अचानक कभी होता नहीं सिवाय ऊपर से आदेश आए। एक नया पांचवां ओपिनियन लिया गया तो कहा कि अब हम प्रेडिकेट ऑफेंस अब हम एक्शन लेते हैं। और उसके चार दिन बाद ईडी वाली ईसीआर हुई। अब गलतियां क्या करती? देखिए जब आप द्वेष से करते हैं, जल्दबाजी में करते हैं तो गलती करते हैं। बहुत गलतियां होती है। सोच समझ के तो काम होता नहीं है। मैंने आदेश दिया राजीव रंजन को राजीव रंजन कहा मेरे को तो नहीं होता। मेरे हिसाब से नहीं बनता लेकिन कह रहे हैं मेरे मास्टर्स कह रहे हैं तो मैं कर देता हूं। तो गलती क्या की? उस वक्त सीबीआई का कोई एफआईआर नहीं था। सीधा ऊपर के दबाव से ईडी ने उस 7 साल पुरानी निजी व्यक्ति की कंप्लेंट को लिखते हुए एक ईसीआर इशू कर दी। अभी आप थोड़ा तकनीकी लगता है लेकिन बड़ा रोचक है ये। अब पीएमएलए एक एक परिणाम स्वरूप ऑफेंस है। पीएमएलए एक अपने टेल की तरह है। एक पूंछ की तरह है जो बिना बॉडी के घूम नहीं सकता। बॉडी होनी पड़ती है। प्रेडिकेट ऑफेंस कहते हैं उसको। जहां कुत्ता नहीं है तो वहां पूंछ कैसे हिलेगी। तो वो कुत्ते का जो शरीर है वो होता है प्रेडिकेट ऑफेंस। वो कभी सीबीआई ने किया नहीं, बल्कि उन्होंने मत दिया था लिख के कि केस बनता नहीं। हम नहीं कह रहे हैं इसलिए। लेकिन उनके दबाव के कारण ईडी ने ईसीआर कर दी हम उस ईसीआर में 21 से 25 तक चार साल और हो गए। यानी छ और चार 10 साल। 100 घंटे। सामूहिक रूप से अगर लिया जाए तो। उसमें से 55 घंटे तो सिर्फ राहुल गांधी जी के हैं। 10 घंटे सोनिया जी के। आठ घंटे खरगे जी के। और जाने कितने। मिला लिया गए तो 80- 90 घंटे तो होंगे ही होंगे। आपने उनको इंटेरोगेट कर दिया। अभी तक यह नहीं देखा आपने कि सीबीआई की प्रेडिकेट ऑफेंस कोई है ही नहीं। आपने जानबूझ के दबाव के कारण 2021 से माना कि सुब्रह्मण्यम स्वामी वाली कंप्लेंट चल जाएगी एज प्रेडिकेट ऑफेंस के लिए। अब आया रोचक तीसरा पक्ष इसका। एक प्रावधान है 12 ए। उसमें लिखा है बाय अ पर्सन ऑथराइज्ड टू इन्वेस्टिगेट। कंप्लेंट मस्ट बी फाइल्ड बाय अ पर्सन ऑथराइज्ड टू इन्वेस्टिगेट। ये सेक्शन है, प्रावधान है पीएमएलए एक्ट में। पीएमएलए में ठीक है तो पर्सन ऑथराइज टू इन्वेस्टिगेट तो सुब्रह्मण्यम स्वामी नहीं हो सकते। पर्सनल ऑथराइज टू इन्वेस्टिगेट होता है एक सरकारी व्यक्ति जो एक सोवरन देश का जो रिप्रेजेंट करता है। उसका कोई भी पुलिस ऑफिसर कर सकता है अब इनको मालूम हुआ तो किया ही नहीं था हमने। जल्दबाजी में काम हुए थे, प्रतिशोध की भावना से हुए थे, द्वेष की भावना से हुए थे, ये मैंने जिरह की 2025 जुलाई अगस्त में ये एग्जैक्ट जो मैंने आपको बताया। फिर वो आरक्षित हुआ निर्णय। अब निश्चित रूप से जो मैंने बोला है वो कहीं ना कहीं सरकार को भी लगा होगा सही है। मेरे को एक लेफ्ट हैंडेड कॉम्प्लीमेंट दिया है क्योंकि अक्टूबर में, निर्णय के एक महीने पहले। इस भय से कि शायद जो मैंने कहा है वो हो जाएगा, उन्होंने एक नई एफआईआर कराई ईओब्ल्यू द्वारा। मतलब एक पर्सन ऑथराइज टू इन्वेस्ट यानी पुलिस। आम शब्दों में कहें तो पुलिस। पुलिस कभी सीबीआई होती है, कभी ईओडब्ल्यू होती है, कभी दिल्ली पुलिस होती है। 3 अक्टूबर 2025 को किया है और जो मैंने कहा वही परिणाम स्वरूप नवंबर मे एंड में या दिसंबर में ये निर्णय आ गया। ये जो जो मैंने कहा ये लिखा है निर्णय में क्योंकि मैंने बहस की, दलील की है। अब आप समझिए राजीव जी अगर यह प्रतिशोध नहीं तो क्या है? 2013 से हम बात करें 2025 पर। उसमें भी दो हिस्से हैं। 13 से 21 से 21 से 25। और सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है 3 अक्टूबर वाली एफआईआर। अगर अरे भाई अगर आपका था प्रेडिकेंट आफेंस, तो आपने क्यों किया ये वापस। तो ये होता है। आप देखिए कानून सबके लिए एक बराबर होता है। एक अच्छा शब्द है कि सबके लिए बराबर होता है। वास्तव में बराबर नहीं होता है। ये दुर्भाग्य है हमारे देश का। आप विकसित भारत की बात करते हैं। विकसित भारत का यह बहुत एक मूलभूत सिद्धांत होना चाहिए कि आपके अफसर आपको डांट फटकार लगाएं तो आप अफसरों को मना कर दें कि ये नहीं हो सकता। आपका जो पुलिस अफसर है, आपका जो सीबीआई है, आपकी जो ईसीआर वाली ईडी है, उनमें हिम्मत होनी चाहिए। मैं अभी सरकार की गलती नहीं निकाल रहा हूं। हमारे बीजेपी मास्टर्स की गलती बाद में निकालूंगा। आपके सिस्टम में वो नीव की हड्डी कहां गई। रीढ़ की हड्डी कहां गई? जो नीव होनी चाहिए सुशासन के लिए जो नौ रत्न थे अपने अकबर के जी वो कहा करते थे उनको कि साहब हमको तो आपने अभी तक निकाला नहीं हम तो हर दिन आपका विरोध करते हैं तो अकबर ने कहा मैंने रखा आपको इसीलिए कि आप मुझे सही सुझाव दो और विरोध करो नहीं तो मैं रखता ही क्यों आपको निकालता तो तब अगर आप मेरी जी हजूरी करते तो ये बात है मूल और अब आखिरी बात अभी सिर्फ नोटिस हुआ है मैं पेश हुआ था कल कल परसों की बात है। नोटिस में ये ध्यान रहे उन्होंने कोई आंतरिक आदेश नहीं दिया है। मैंने खुद नहीं कहा मैं झेल नहीं करूंगा। आज आप नोटिस कर रहे हैं। हम आएंगे छ हफ्ते बाद। मार्च में डेट पड़ी है। मार्च में डेट ये पूरी कहानी है।

राजीव रंजन श्रीवास्तव - जी। लेकिन ये बताइए कि किस बेस पर फिर दोबारा ईडी गई है वहां?

सिंघवी – नहीं, देखिए ये पूरा प्रकारण। अगर आपको कुछ करना है, प्रभाव डालना है तो सरकार आपकी है। आप जानते हैं कि सरकार में कितने सारे येन केन प्रकारेण होते हैं। कितने सारे रिसोर्सेज होते हैं। तो कुछ ना कुछ करके उनको अब एक केस बनाना है। जमीन नहीं थी। आपने इमारत खड़ी कर दी और इमारत खड़ी करने का आपका उद्देश्य एक था। देखिए, इन 11 वर्ष में एक उद्देश्य आपका साध्य हो गया। क्या था, कि हर बार जब आप जाते थे कुछ फाइल करने कोर्ट में। जब आप छींकते थे, तो इसे जानबूझकर लीक कर दिया जाता था। अखबारों में वो आता था बड़ी सुर्खियों में कि आज ईडी ने यह दस्तावेज फाइल किया, उसमें लिखा है कि राजीव रंजन इस प्रकार से गलत हैं। तो आईडिया इनका जीतने का होता था। ये जानते हैं कि कोई चांस नहीं है लेकिन ये इनको चाहते हैं जिसको अंग्रेजी में कहते हैं - पॉट बॉइलिंग रखो, एक तलवार लटका के रखो और प्रेस में लीक करते रहो तो आपके प्रश्न का उत्तर यही है कि जवाबदेही जीरो होती है। अब दो केस चल रहे हैं। एक तो जो तहकीकात करेंगे, अटैचमेंट कंटिन्यू करेंगे, नई एफआईआर में। वो निचली अदालतों में चल रहे हैं जहां पर वो चलेगा नहीं चलेगा वो सब बाद की बात है। दूसरा केस इसकी अपील है। अपील की मार्च में तिथि है। वो अलग से चलेगा। तो मैं ये नहीं कह रहा हूं कि केस खत्म हो गया है लेकिन किसी भी विकसित, अच्छे, व्यापक सिस्टम में जवाबदेही होनी चाहिए।

राजीव - तो ये जो ईडी की जो हाईकोर्ट में अपील है उस अपील पर मार्च में सुनवाई है।

सिंघवी - अभी कोई आंतरिक आदेश नहीं दिया गया है। सिर्फ कहा है कि हम कारण बताओ नोटिस दे रहे हैं कि आप बताइए कि हम इसमें क्या करें आगे? जो एफआई आर है उस पर अभी कुछ भी नहीं हुआ है। उस एफआईआर में अलग से तहकीकात हो रही है। तहकीक वो नहीं है। फिर उसमें इस पुराने निर्णय में लिखा है कि साहब उन्होंने बताया हमको ये और ये स्पष्ट किया कि उस एफआईआर इसमें लिखा है निर्णय में कि नए एफआईआर क्योंकि निर्णय आया नवंबर दिसंबर में वो एफआईआर अक्टूबर की है। तो ईडी ने कहा है कि उसका उस एफआईआर से कोई संबंध नहीं है। ये रिकॉर्डेड है। तो उसकी अलग शुरुआती होगी। उसकी अलग कार्यवाही होगी।

राजीव – नहीं, वो उस एफआईआर का नहीं है तो इसका मतलब है कि फिर से आप इंटोरेगेट करोगे?

सिंघवी - अब आप देखिए इसका मैं आपको ज्यादा नहीं कहना चाहता इस वक्त पूर्वानुमान का नहीं है। अगर आप किसी निरस्त नॉन एक्जिस्टेंट प्रोसीडिंग जो कि कॉश हो गई है। देखिए एक चीज मैं दो चीज बोलना भूल गया। कॉग्निजेंस एक शब्द होता है वकीलों का। कॉग्निजेंस होता है न्यूनतम धरातल। जी। कॉग्निजेंस से नीचे कुछ नहीं होता है। सबसे कम होता है वो। जज कॉग्निजेंस लेता है यानी आपको पहचानता है सिर्फ कि मैंने देखा है कि राजीव रंजन मेरे कोर्ट में है। इसमें जज ने कॉग्निजेंस लेने से मना कर दिया कंप्लेंट का। इसका मतलब है वो निरस्त नहीं, वो है ही नहीं। कानून में एक्सिस्ट नहीं करती है। हम उस नॉन एक्जिस्टेंट दस्तावेज के आधार पर आपने 90 घंटे, 80 घंटे वरिष्ठ नेताओं को इंटेरोगेट कर दिया? हम तो उस 90 घंटे में अगर आपने 90 पेजेस रिकॉर्ड किए हैं या 9000 किए हैं तो मेरा मानना है कि कानून के रूप से वो निरस्त है। जी मेरा मानना है कोर्ट क्या कहता है मेरे को पता नहीं। अब आप वापस उनको करेंगे खानापूर्ति। तो ये देखिए ये जब द्वेष की भावना किसी अच्छे सिस्टम में ये होता कि भाई साहब गलती हुई हमारी, छोड़ो इसको या कम से कम मैं यह बोलता हूं कि राजीव रंजन की गलती है या इस व्यक्ति की गलती है। यहां तो कोई जवाबदेही का सवाल नहीं उठता। सब बोलते हैं हम सही थे और अपने आप को सही सिद्ध करने के लिए एक तरफ अपील करेंगे, एक तरफ दूसरी एफआईआर करेंगे।

राजीव - तो मार्च का समय है मार्च में इलेक्शन है. मार्च अप्रैल में इलेक्शन होगा फिर...

सिंघवी - वो तो लटकाना है उसको रिलीज़ करना है लीक करना है आंशिक रूप से दो-दो पैराग्राफ बताने हैं इंटरव्यू देने वो तो वो ये कारवाई पिछले 10 साल से चल रही है और मजे की बात ये है कि जो आपने उसमें से सात साल तक सुब्रमण्य स्वामी की कंप्लेंट के आधार पे किया था सुब्रमण स्वामी की कंप्लेंट को कुछ वो ध्यान नहीं दे रहे जी शुरुआत तो सात साल उसके ऊपर हुई थी। आपका खुद का केस उसके ऊपर आधारित था। आपकी पूरी इमारत उसी नीव पे थी। तो स्वामी जी का आज आपने उनको तिरस्कार कर दिया है।

राजीव - सुब्रमण्यम स्वामी कहां हैं आजकल.. वो तो गायब हैं।

सिंघवी - तो आपको अच्छा इंटरव्यू उनसे करना चाहिए कि क्या उनका

राजीव - जरूर करूंगा. मैं चाहता हूं मैं करूंगा उनसे। लेकिन ये सही बात है कि इस पूरे मसले पे अब उनकी कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। ये मजेदार है। मैं खोज रहा था कि उनकी कोई प्रतिक्रिया हो। लेकिन नहीं है।

सिंघवी - उन्होंने चीख-चीख कर दसों दस्तावेज लिखित दिए हैं 2013- 14 में कि मैंने यह कंप्लेंट की है। इसकी प्रतिलिपि यह है। इसमें आज आरोप यह है। आप प्रेडिकेट कुछ करना है तो करिए। और उसके ऊपर लिखित मत है कि एक प्रेडिकेट ऑफेंस नहीं बनता। हम कुछ नहीं करेंगे। 21 में पहली बार किया है वो भी ईडी ने। सीबीआई ने नहीं।

राजीव - मजेदार है। इसपर आगे भी बात होगी ही। लेकिन कोर्ट से ही दूसरा मामला बहुत गंभीर है और पर्यावरण से संबंधित है। अरावली। हम लोग हैं दिल्ली में रहते हैं। दिल्ली भी अरावली और रायसीना हिल्स तक। और हम लोग जानते ही हैं कि पूरा एरिया और खासकर इकोलॉजिकल राजस्थान तो पूरा का पूरा अरावली और इकोलॉजिकली और आर्थिक रूप से भी काफी मजबूत बनाता है। ये पहाड़, ये पूरा रेंजेज जो है। और उस मामले में अभी काफी गर्म है पूरा का पूरा और काफी लोग जो पर्यावरणविद हैं जो इकोलॉजिस्ट हैं वो लोग इसपर सड़कों पर हैं। सरकार के खिलाफ भी मामला यह है कि 100 मीटर तक जो आदेश है कि 100 मीटर से ऊपर ही पहाड़ माना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट में और शायद उस समय सीजीआई भी थे उस पैनल में उस बेंच में उनका ही फैसला है। अब दोबारा इस केस में याचिका लगी है और अब इस पर सुनवाई होगी। जरा इस पूरे मसले को समझाइए।

अरावली मामला जबरन उठाया गया

सिंघवी - मैं उस मामले में पेश नहीं हो रहा हूं। इसलिए मैं बड़े बेबाक रूप से, खुले रूप से कह सकता हूं। आज की तारीख में कल होता हूं तो पता नहीं मुझे। जी नंबर एक, दुर्भाग्य है ये। दुर्भाग्यपूर्ण निर्णय है। नंबर दो, मैं मुख्य न्यायाधीश का बहुत ज्यादा आदर करता हूं। मैं मानता हूं बहुत। वो तीव्र बुद्धि के और बहुत अच्छे न्यायाधीश हैं। लेकिन गलतियां होती हैं सुप्रीम कोर्ट से। नंबर तीन, गलतियां बहुत गंभीर है। पर्यावरण का मुद्दा सबसे पहले आपको उस परिपेक्ष उस संदर्भ में देखना चाहिए कि ये आपका और मेरा मुद्दा नहीं है। हमारे बच्चों का मुद्दा भी नहीं है। आपके पोतों का मुद्दा भी नहीं है। मेरे परपोतों का मुद्दा है ये। इंटर जनरेशनल इक्विटी जिसको कहते हैं। आज अरावली इतने वर्षों से, जिसको कहा जाता है, डेजर्टिफिकेशन। मैं राजस्थान से आता हूं। मरु देश से आता हूं। ऊंट वाले देश से आता हूं। वहां का डेजर्ट या थार कोई छोटा-मोटा डेजर्ट नहीं है। सिंध और राजस्थान में बाउंड्री नहीं होती थी। बहुत अरसे तक। आज भी बाउंड्री आपको मिलेगी नहीं कई बार। तो वो डेजर्टिफिकेशन पूर्व की तरफ नहीं बढ़ा है इसका सबसे बड़ा कारण है अरावरी। पॉइंट नंबर चार। यह बताइए मुझे आप कि इतने वर्षों से 100 मीटर पहले कभी क्यों नहीं हुआ? या ईजाद क्यों किया गया आज? अरावली, पर्यावरण, ग्रीन बेंच हर हफ्ते सुप्रीम कोर्ट में बड़े-बड़े पर्यावरण के मुद्दे तो पिछले 50 साल से आ रहे हैं। अब 40 साल से आ रहे हैं। ये किसी की ब्रेन वेव में क्यों नहीं आई कि 100 मीटर होना चाहिए? इसका कारण है। और नंबर पांच, एक्सपर्ट बॉडीज ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई हुई और पुराने 40 सालों से डिग्री ऑफ स्लोप के साथ-साथ तीन और कसौटियां रखी हैं। 3 डिग्री का स्लोप। और उन्होंने बताया, मैं टेक्निकल शब्द नहीं जानता हूं। तीन चार और टेस्ट उनको मिला है जो 3 डिग्री का स्लोप या ज्यादा हो वो पहाड़ है, हिल है। ये टेस्ट चल रहा है 30-40 साल से। प्लस दो तीन और टेस्ट अब उसको बदल के। मेरा छठा पॉइंट है आपने जब 100 मीटर किया तो एक स्टडी कहती है कि सिर्फ 10% हिल्स भारतवर्ष में है। मैं अरावली की बात नहीं कर रहा हूं। ये 100 मीटर वाली बात को संतुष्ट करेंगी। यानी 90% और 90 में से कम से कम 60% तो 3 डिग्री वाले में आ जाएंगी। लेकिन वो हिल नहीं मानी जाएंगी। एक सर्वे आया है 400 हिल्स का। उसमें से 9% है जो 100 मीटर को संतुष्ट करेंगी। नंबर सात। इसका मतलब हुआ आज ही आपने पढ़ा होगा, मैप आया है अखबारों में। कि सिर्फ अरावली अपने सीकर डिस्ट्रिक्ट के हिस्से में. जी, सीकर डिस्ट्रिक्ट मेरे प्रदेश का एक जिला, पूरे अरावली की बात नहीं हो रही है, उसमें सिर्फ दिख रहा है कि 60- 70% 100 से बाहर है। लेकिन 3 डिग्री के स्लोप के अंदर है यानी अगर 3 डिग्री की कसौटी लगाएं तो वो हिल होगा लेकिन 100 मीटर का लगाएं तो बाहर बाहर होगा। एक डिस्ट्रिक्ट के छोटे हिस्से की मैप है सिर्फ। अरावली तो बहुत बड़ा एरिया है। अच्छा अब इसमें आप प्रोसीजरल देखिए जो नंबर आठ और नौ है। आपकी जो मेन समिति इन मामलों को देखती है वो है सीईसी। वो नहीं मान रही है। आपने उस समिति को एक और समिति का हिस्सा बना दिया। एक उससे भी बड़ी समिति। उसमें भी वो मानी नहीं। यह मैप जो आज छपा है। और जो दलीलें मैं कर रहा हूं और वो परमेश्वर जो अमाइकस हैं उन्होंने लिखित दी हैं और ओरली की है। मौखिक। तो तीन हिस्से तो अगेंस्ट है आपके। एक जो लार्जर समिति बनाई आपने उसपर ब्यूरोक्रेट्स बैठे हैं। मैं ये नहीं कहता कोर्ट की गलती से होती है कोर्ट कई बार किसी के प्रभाव में आ जाता है, बहकावे में आ जाता है, दलील में आ जाता है। वो गलती हो सकती है, तो वो लार्जर समिति के लोगों ने ये लिख के दे दिया कि साहब ये हो जाएगा। मैं नहीं कह रहा हूं कि अमाइकस बाध्य होता है। अमाइकस भी एक दलील होती है। लेकिन उसमें वजन दिया जाता है। क्यों? क्योंकि अमाइकस निष्पक्ष है। वो ना राजीव रंजन का आदमी है ना सिंघवी का आदमी है। मैं तो एक वादी हूं। आप प्रतिवादी हैं। हमारे वकील तो एक इस प्रकार से उतना वजन नहीं रखते। अमाइकस को बनाया इसलिए जाता है कि वो निर्विवादी है। और वो एक तीसरा पक्ष है। निष्पक्ष। तो यह आठ नौ जो मैंने आपको बातें बोली अभी। अच्छा, इसका जो दुष्प्रभाव होता है वह अरावली में नहीं होता है। केस तो अरावली के बारे में है। लेकिन हम जानते हैं, दो कारण और हैं। एक तो अरावली में सबसे ज्यादा शोषण हुआ है बिल्डर्स द्वारा। लेकिन इसका जो प्रभाव और दुष्प्रभाव होगा सभी हमारे हिल्स में। बिल्कुल। वेस्टर्न घाट्स कोई कम नहीं है। जिसको हम अंग्रेजी में वेस्टर्न घाट्स कहते हैं। सब जगह मैं तो गया हूं बहुत वहां पर। चिकमगलूर से ले कुन्नूर से लेकर... इतनी सुंदर जगह हैं वो सब वेस्टर्न घाट के साथ लगी हुई है। जी अब इन सब पर जो सबसे बड़ी क्रूर दृष्टि पड़ रही है और वो स्वाभाविक है सबसे कम जो सबसे महंगी संपत्ति है वो जो सबसे कम होती है मात्रा में, हमारी आपकी मात्रा बढ़ रही है, जमीन की मात्रा वही है। आपकी और हमारी मात्रा बढ़ने लगती है। बच्चे होते हैं। पड़पोते होते हैं। जमीन उतनी रहती है। तो ये जमीन को जो बनाने वाले लोग हैं बिल्डर्स, इनकी निश्चित रूप से आंख होती है। अरावली भी उतनी होती है वेस्ट घाट से भी उतनी होती तो उनको दोषी ठहराना गलत है। वो तो करेंगे अपना काम। आपका काम है कि आप निर्भीक रूप से ऐसी बाउंड्री, रेड फ्लैग लगाएं कि वो आगे नहीं जा सके। और इसका दुष्प्रभाव अभी नहीं मालूम पड़ता है। आपने देखा हमारे सब इलाकों में। जहां पहले दो फ्लोर अलाउड थे, वहां तीन फ्लोर हो गए। जी। तीन फ्लोर तो फिर भी चल जाते हैं क्योंकि वहां अर्बन एरिया है। अब आप देखेंगे कि सब जगह इसी ग्राउंड पर, कि भाई ये 99 फीट है। 100 फीट नहीं है। तीन, क्या 5 डिग्री का स्लोप है। 5 डिग्री का स्लोप लेकिन 50 फीट का है। वहां पर आपने लगा दिया एक उठा के अपना एक रिसोर्ट। बिल्कुल। तो आप अपने जो पड़पोतों की बात करते हैं इंटर जनरेशनल इक्विटी। क्या हुआ इन सबका? तो मैं समझता हूं इसका पुन निरीक्षण रिव्यू तुरंत होना चाहिए और न्यूनतम पुरानी चीज को रिस्टोर करके उसमें और ज्यादा सफाई लानी चाहिए।

राजीव - कोर्ट में जो यह मामला है मतलब सुनवाई क्योंकि आप उसमें नहीं है इसलिए खुल के आप बता भी रहे हैं लेकिन रिव्यू के लिए है। आपको लगता है कि पुनर्विचार होना चाहिए।

सिंघवी - अब देखिए, गोदावरमन का जो ये पैच कहते हैं जिसको तो उसमें एक प्रकार से एक बहती गंगा होती है। उसमें केसेस आते रहते हैं। आईएएस आते रहते हैं, एप्लीकेशंस आती रहती है। तो उसको रिव्यु कह लीजिए लेकिन निश्चित रूप से पुनर्विचार तो होगा ही। इसमें नहीं तो क्योंकि अभी निर्णय हो चुका है। जी तो इस बात को वापस से देखना कि भाई 100 मीटर होना चाहिए 3 डिग्री होनी चाहिए कोई और कसौटी होनी चाहिए कि नहीं तो पुनर्विचार तो है ही। उच्चतम न्यायालय ने पिछले एक साल में दसों में पुनर्विचार किया है। मैंनें तो निंदा की है कि पुनर्विचार नहीं अपील की है। बेंच ए से बेंच बी की अपीलें हुई है उसको भी होनी चाहिए वो तो पूरी तरह से सही नहीं थे। ये तो सही पुनर्विचार होगा।

राजीव - लेकिन इस पर जो आंदोलन हो रहा है, पब्लिक ओपिनियंस जो आ रहे हैं वो साफ-साफ पहली बार देख रहा हूं कि इकोलॉजिकली लोग अवेयर हैं और उसमें भी राजस्थान के लोग तो काफी अवेयर हैं। आप चूंकि राजस्थान से आते हैं और बिश्नोई समाज के लोगों को देख रहा हूं। बाकी अलग-अलग समाज के लोग हैं। यहां किसी समाज की बात नहीं है, लेकिन कुछ लोग हैं जो...

सिंघवी – देखिए, बिश्नोई का नाम लिया आपने तो मैं थोड़ा डाइवर्ट करूंगा। वो तो खैर पर्यावरण के सबसे ज्यादा प्राचीन द्योतक रहे हैं। सबसे ज्यादा बिश्नोई जोधपुर के हैं। मेरा जो होम निवास है, होमटाउन है। और मैं तो मजाक किया करता था अपने मुख्यमंत्री हरियाणा से कि आप तो राजस्थानी आदमी मुख्यमंत्री कैसे बन गए हरियाणा के? क्योंकि उनके समाज के सबसे ज्यादा लोग तो यहीं हैं। वो रेगुलरली आया करते थे। बड़ा उनका समाज का फंक्शन होता है जोधपुर में। हम तो प्राचीन द्योतक इसलिए है क्योंकि ये समाज एक ऐसा समाज था जिसने पहली बार पर्यावरण की लड़ाई लड़ी। ये चिपको मूवमेंट तो बहुत बाद में आया। इन्होंने सैकड़ों साल पहले कहा था कि पेड़ और हम एक हैं। जिस प्रकार आप और हम एक ह्यूमन बीइंग हैं, मानव हैं। वो पेड़ भी मानव है। यहां तक कि ये बहुत कम फलसफों में होता है। जैनिज्म में है। और जगह भी है। ये जो पत्ता है ये भी। हमारी एक आंख या उंगली या कोई भी चीज है, चमड़ी है। जिसे अगर आप इसको काटोगे तो हम इससे चिपक जाएंगे। ये शुरुआत सबसे पहले इसी समाज ने की थी। आपने देखा कि सलमान खान का जो इंसिडेंट हुआ, उसमें बहुत अरसे निकल गए। और सबका व्यू था, मत था, मेरा भी था एक तरह से कि अब खत्म करो उसको, क्योंकि कई अरसे निकल गए। उन्होंने पेनल्टी पे कर दी। उन्होंने जो भी करना था, जुर्माना कर दिया। पर बिश्नोई समाज खड़ा रहा। बिश्नोई समाज। जोधपुर में सिर्फ उनकी वजह से केस चल रहा है अभी तक। और ये केस मेरे को सलमान खान की तरफ से ऑफर हुआ, मैंने विवशता प्रकट की कि मैं जोधपुर से हूं। मैं किसी को जज नहीं करता मैं वकील की तरह पेश हो सकता हूं। लेकिन मैं इस समझता हूं कि ठीक नहीं रहेगा मेरा। यह केस मेरे पास आया था बीच में। तो यह एक बात है पर्यावरण का। सबसे बड़ा जो गणतांत्रीकरण है वो सबसे महत्वपूर्ण मैं समझता हूं शिक्षा और नॉलेज का सुधार है इस देश में। आज पर्यावरण एक एलीट या ड्राइंग रूम का कांसेप्ट नहीं रहा है। आपके और मेरे बैठ के एक चाय कप में, किसी मल्टी स्टोरी टावर में बैठ के वाली बात नहीं रही है क्योंकि वो आम आदमी को असर करता है। राजस्थान को छोड़िए, जो दिल्ली में रहता है। थोड़ा बाहर सांस लेने निकलता है। आज तो सांस यहां देने के लिए टैक्स भी नहीं पे करके ले सकते हैं आप सांस यहां पर। सांस तो टैक्स पे करके भी नहीं दे सकते आप। बाहर निकलो थोड़ा तो पहले आती है आपके घर के दरवाजे के आगे। बिल्कुल। अगर उसको आप करना शुरू करोगे और ऑलरेडी देखिए, अरावली में प्रदूषण और नुकसान हो चुका है। काफी कुछ देहरादून में पहले हो चुका है जो अब आप देख रहे हैं। मसूरी, देहरादून वो अरावली में एक रोकथाम है जो पुराना नुकसान होता है वो तो हो गया वो हो चुका है।

राजीव - हां हो चुका है लेकिन क्या लगता है आपको कि सुप्रीम कोर्ट से इसमें..

सिंघवी - मैं तो पूरी तरह से समर्थन करूंगा इसका। मैं पूरी तरह से विश्वास और आशा करूंगा और मैं चाहूंगा कि उच्चतम न्यायालय ने गवर्नर के मामले में पुन विचार कैसे किया था। जी कुत्तों के मामले में कैसे किया था पुनर्विचार? मैं सही गलत नहीं बोल रहा हूं आपको। हां सही। तो आप पुनर्विचार अगर कर सकते हो तो ये तो सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण कैसे पुनर्विचार करने की? महत्वपूर्ण है। जबकि दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट भी है। मतलब डेजर्ट में अगर तब्दील होना होगा उधर से थार होगा। अरावली एक ऐसी चीज है जो एक प्रदेश की बात नहीं है। जी गुजरात है ये। राजस्थान है ये। दिल्ली है ये। हरियाणा है ये। जी। मध्य प्रदेश के हिस्से हैं इसमें। जी। तो यह तो एक पूरा एक आधार है और बहुत हद तक तो हमारे उत्तर और दक्षिण का भी आधार ये हुआ करता था। हां बिल्कुल होता था।

मनरेगा को खत्म करना ज़िद की राजनीति

राजीव - जी सही कह रहे हैं। तीसरा एक बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा है - मनरेगा। और मनरेगा को समाप्त कर अब विकसित भारत जी राम जी अब तो वो पूरा याद भी नहीं रहता। मनरेगा का तो, राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना - वो याद रहता था। यह अब नया आ गया। इस विषय में जरा बात जरूरी है। इसलिए कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक बहुत बड़ा जरिया होता था। अब सरकार का कहना है कि हमने उसको रिप्लेस किया है और यह उससे भी बेहतर हम लेके आए हैं। 125 दिन तक हम इसमें रोजगार दे रहे हैं। पहले वाले में 100 दिन दे रहे थे। जरा इसको विस्तार से बताइए सिंघवी साहब।

सिंघवी - ये सब चीजें आज आप बहुत दुर्भाग्यपूर्ण विषयों को उठा रहे हैं। लेकिन महत्वपूर्ण इशू है इसलिए। पहले वाला भी मैंने जो बोला और यह उससे भी ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण है। और इसको आप किसी भी पहलू से देखिए। यह है जिद वाली राजनीति। ये है हट वाली राजनीति। ये है बहुमत वाली राजनीति आंख बंद करके। इसका कोई भी पहलू सही नहीं है। और जिस प्रकार से प्रेजेंट हो रहा है, वह फ्रॉड है उल्टा। झूठ बोलना एक चीज़ होती है। जानबूझकर दुष्परिणाम जानकर मूर्ख बनाने की प्रक्रिया करके झूठ बोलने को फ्रॉड कहा जाता है। एक तो आपने नाम बदला जी। चलिए उसको छोड़ दीजिए एक बार। वो बहुत महत्वपूर्ण है मैं मानता हूं। मजाक है, अपमान है। सस्ता मजाक है। मतलब ये सब कहते हैं दूसरी हत्या है महात्मा गांधी की वगैरह। महात्मा गांधी को फर्क नहीं पड़ता है। इसका महात्मा गांधी का आप नाम रखे ना रखे फर्क पड़ता है उनको क्या? महात्मा गांधी को आप किसी में नाम नहीं रखिए। वो इतने महान पुरुष है कि वो रहेंगे हमेशा। लेकिन यह एक सस्ता मजाक है। यह मजाक महात्मा गांधी पे तो है ही। लेकिन ये मजाक है कि भाई जो पूरा भारतवर्ष शुरू हुआ 2014 से। पूरा ये अस्तित्व इस देश का इस लोगों का 2014 से और मेरे पहले कोई सरकार नहीं थी। मेरे पहले कोई प्रधानमंत्री नहीं था। मेरे पहले कोई राजनीतिक पार्टी नहीं थी। कोई सोच नहीं थी। कोई संस्कृति नहीं थी। कोई इतिहास नहीं था, कोई विरासत नहीं थी। यह दुर्भाग्य है इस बात का। नंबर दो ये फ्रॉड क्यों है? आप ये समझिए कि 25% सिर्फ मटेरियल्स का पे करती थी। इसमें हमेशा करती थी प्रदेश सरकार पे। हम ये लोग जानते नहीं है। लेकिन सिर्फ मटेरियल्स का और वो 25% आजकल पूरे एसेट का मटेरियल सिर्फ नहीं जी वह पे करेंगे 60%। अब आप आज बताइए, आज इस संशोधन के पहले कितने वर्ष कम से कम 5 वर्षों से बीजेपी के खुद के प्रदेश खड़े हुए हल्ला कर रहे हैं कि जीएसटी का हमारा मुआवजा नहीं मिलता है। हम मर रहे हैं।

राजीव - पहले शायद मुझे ध्यान आ रहा है 90 और 10 था। 10% राज्यों का और 90% केंद्र का।

सिंघवी - और साथ में मटेरियल्स के हिस्से में 25% । तो इस मुद्दे को छोड़कर, संघीय ढांचे में डिस्ट्रीब्यूशन ऑफ़ फंड्स पे हल्ला था। जीएसटी शेयरिंग पर तो बहुत बड़ा हल्ला था। कितने लाख करोड़ की बात है। आंकड़े हमारे पास हैं। कोविड का बहाना हटा तो उसके बाद और हल्ला बढ़ा। उसके वक्त अगर आप इसको यह करते हैं जहां कि आपके पास कोई प्रदेश हो बीजेपी शासित प्रदेश भी बोलता नहीं होगा, इतना हल्ला नहीं करता, अंदर से रो रहे हैं कि उनके पास पैसा नहीं है उनके खुद के नागरिकों के लिए। अब हम ये कैसे करेंगे ये। तीसरा इसमें दो या तीन चीजें मूल थी - ऑन डिमांड था ये। कानून का महत्व क्या था... यूपीए के कानून का कि मैं कानूनी रूप से मैं डिमांड कर सकता हूं जैसे कि मेरे को आप चांटा नहीं मार सकते। ये कानूनी हक है कि है कि रास्ते चलते मेरे को आप गोली नहीं मार सकते। उसी तरह से कानूनी हक बनाया था कि मैं 90 दिन रोजगार मांग सकता हूं। वो चला गया। अब आपका हक नहीं रहा। अब इसको टारगेटेड बनाया है कि जो अवेलेबल होगा और नीड होगी। नीड सबसे इंपॉर्टेंट आ गई है। हटा दिया है आपको। चौथा, नीड होगी सिर्फ पांच एरियाज में। तो इसके दिन बढ़ाने का जो फ्रॉड किया है उसमें हर तरफ से इसको समेट दिया है। 125 दिन का कोई मायने नहीं है। आप डिमांड नहीं कर सकते। पहले था वो किसी भी एसेट के लिए-- तालाब, बॉल्स। अब चार एसेट्स स्पेसिफाई किए हैं कि इन चार क्षेत्रों में हमको चाहिए आवश्यक है तो वहीं काम मिलेगा। तो अगर मैं आज डिमांड करता हूं तभी तो डिमांड चलेगी ना। मैं आज डिमांड कर रहा हूं काम चाहिए। मेरे डिस्ट्रिक्ट में वो चार में से एक भी एरिया की जरूरत नहीं है। तो फिर कुछ नहीं है। नहीं हो सकता। तो डिमांड कहां हुई आपकी? चार स्पेसिफाइड है। एक्ट में स्पेसिफाइड है, अब संशोधन में। इसका जो मूल तत्व है, अस्मिता थी - वो थी ऑन डिमांड रोजगार मिलेगा। उसके बाद एक और कटौती। दो महीने निकाल दिए बीच के। तो उसमें, जो आंकड़े आए हैं उस पर तो बहुत बड़ी क्षति है पैसे की। इसका मतलब क्या हुआ कि हम मानते हैं कि 2 महीने आपको रोजगार की आवश्यकता नहीं है। ये किसने बोला आपको? ये किसने बोला आपको कि 2 महीने आपको सब लोग क्या सोइंग सीजन में व्यस्त होते हैं, रोजगार होता है उनके पास? ये किसने बताया आपको? 2 महीने तो बहुत बड़ा टाइम होता है किसान के लिए। छठा हिस्सा निकाल दिया साल से आपने। एकदम अलाउड ही नहीं है। डिमांड छोड़ो कुछ मिलता ही नहीं है आपको। उस वक्त इसके जो प्रभाव हुए थे अच्छे वो सब आंकड़े आए हुए हैं लोगों की वेजेस बढ़ गई थी। बल्कि हम कंप्लेन करते थे। मेरे पास कि हमको आजकल यहां रोजगार दिल्ली में नहीं मिलता लेकिन उसमें अच्छी बात क्या है। नहीं मिलता, क्योंकि वो सशक्त हैं, खुश हैं अपने गांव में। हमारे यहां काम नहीं करता, हमको तकलीफ है, वो अलग बात है। तो इसलिए इसको फ्रॉड बनाके यह कहा गया। सिर्फ एक कारण है - नाम हमारा होना चाहिए, हमने नई चीज की। हर चीज में यह जो ईगो है ये गणतंत्र में पहले कभी अनहोनी थी, बीजेपी सरकार में भी अनहोनी थी, वाजपेयी सरकार में भी अनहोनी थी, जनता दल सरकार में भी अनहोनी थी. ये तो कोई अजीब सा अहंकार आ गया आज। क्या होगा सरकारें बदलेंगी, चिरायु तो होती नहीं है। फिर वापस उसको बदलेंगे उससे किसका, देश का फायदा होगा। यह रहने वाला तो है नहीं, यह तो बदलेगा वापस इसका स्वरूप। लेकिन आपने नुकसान जो करना था, कर दिया। आपने अब दो साल और करेंगे तीन साल और करेंगे नुकसान। और इसमें आंकड़े प्रकाशित हैं कि गांव वालों की जो वेजेस और रोजगार बढ़े हैं, वो जबरदस्त बढ़े हैं। ये बात अलग है कि वो थोड़ा निकम्मा हो सकता है, बैठ सकता है घर में, अपने गांव के परिपेक्ष में, लेकिन उसको जो एक सशक्तिकरण मिला है उसीको तो बनाया गया था ये कानून। आप ये कहते हैं बार-बार कि साहब इसमें लीक था, करप्शन था। वो तो हमेशा से रहेगा। तो आप करप्शन को बंद करिए, प्लग करिए। आप संशोधन करिए, सुधार करिए। इसकी जगह मजबूत करिए। यहां तो आपने बेबी विद द बाथ वाटर। जब आप नहलाते हैं तो बच्चे की जो गंदगी होती है तो पानी फेंकना है या बच्चे को फेंकना है? पानी फेंको ना आप। आप बच्चे को भी फेंक रहे हो उठा के। दोनों फेंक दिए।

राजीव - लेकिन एक चीज़ ज़रा स्पष्ट कीजिए...लेकिन इसको कैसे देखा जाए? अगर जैसे आप बता रहे हैं इसका मतलब है कि पूरा का पूरा ये जो कानून है मनरेगा जो था उसको इन्होंने खत्म कर दिया।

सिंघवी - मैं समझता हूं एक हड्डी कुछ छोड़ दी होगी। वो भी नहीं छोड़ी। कुछ हड्डी-वड्डी कुछ ढांचा छोड़ रखा होगा। लेकिन उसका पूरा बदन, उसकी पूरी चमड़ी, उसका पूरा आधार, उसका पूरा उद्देश्य, उसकी पूरी व्यापकता, उसकी आत्मा तो बहुत पहले ही खत्म कर दी। वो तो नाम बदलने से खत्म कर दी। वो एक कोई टूटा फूटा ढांचा छोड़ दिया है। खंडहर खंडहर कह लीजिए उसको आप खंडहर तो छोड़ा ही है। अभी हमारे कंट्री में है एक डिमांड की स्कीम कोई ना कोई वो डिमांड क्या होगी क्या नहीं होगी हमने बता दिया मैंने आपको।

राजीव - जी जी, आप कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता भी हैं उस लिहाज से जरा और कांग्रेस पार्टी इस पे काफी सीरियस नजर आ रही है इस मुद्दे पे। सोनिया जी के का आर्टिकल आया। हालांकि सोनिया गांधी ऐसे तमाम मसलों पर काफी सीरियस नजर आती हैं। अरावली पर भी उन्होंने पिछले महीने आर्टिकल लिखा था। हिंदू में यह आर्टिकल लिखा। आगे क्या रणनीति है कांग्रेस की?

सिंघवी – देखिए, कांग्रेस पार्टी में आपको मैं एक इतिहास पर ले जाऊं। ये कानून आसानी से हमारी पार्टी में भी पास नहीं किया था। बहुत जद्दोजहद हुआ था। इसमें कई महीने लगे थे और यह सोचा गया था बहुत सोच समझ के कि क्या हम इसको अफोर्ड कर पाएंगे। क्योंकि यह दुनिया की सबसे बड़ी रोजगार स्कीम है। दुनिया की सबसे बड़ी सामाजिक कल्याण की रोजगार की स्कीम थी ये। उसमें कई सारी स्टडीज हुई। आपस में आरोप प्रत्यारोप हुआ पार्टी के अंदर। कई लोग नहीं माने थे। एनएससी ने इसमें स्टडीज की एडवाइज़री कमेटी ने। फिर पास हुआ तो यह शोपीस है कांग्रेस का। कांग्रेस से वैसे उस वक्त अपने यूपीए वन और टू दुनिया की सबसे बड़ी रोजगार स्कीम, दुनिया की सबसे बड़ी बीमा स्कीम, दुनिया की सबसे बड़े खाद्य पदार्थ की सुरक्षा की चक्र बनाना। इस तरह की बहुत चीजें की थी। राइट टू और उसमें सबके लिए पैसे की बचतें की गई, कैलकुलेशन किया गया। उसमें पहले कहा गया नहीं कर सकते। पैसे को कम करो। कहा, नहीं इस तरह से पैसे निकालो। व्यापकता बनाई गई। सोच समझ के किया गया तो वह तो हमारी शो पीस है। अब देखिए गणतंत्र में इससे ज्यादा कर नहीं सकते कुछ। मैं आपके गले के अंदर मुंह में हाथ डाल के तो कुछ निकाल नहीं सकता हूं। और ये सिर्फ एक अहंकार की राजनीति और स्थिति की राजनीति है कि मैं बहुमत में हूं तो मैं जो मर्जी कर सकता हूं। तो ये हम बताएंगे कि ये श्रम विरोधी है लेकिन श्रम की बात नहीं है। लेबर तो बहुत छोटा शब्द है। मैं समझता हूं इसमें। ये ग्रामीण जो लाखों करोड़ों लोग हैं जो आप मान गए कि कोविड में सबसे बड़ा सुरक्षा चक्र ये था। उसकी हत्या है। महात्मा गांधी की हत्या तो है ही लेकिन इसकी हत्या है। जो जीवित लोग हैं।

राजीव - ये बताइए सिंघवी साहब, इसको लाने के पीछे थोड़ा सा भाजपा की रणनीति समझने की कोशिश करता हूं। हालांकि स्पेकुलेशन हो सकता है। क्या कारण हो सकता है इसके लाने के पीछे? यह तो अहंकार ठीक है। लेकिन पॉलिटिकली फायदा क्या होगा?

सिंघवी – देखिए, बहुत हद तक यह एक सोच है। इसकी नहीं सब चीजों में यह सोच है। सेंट्रल विस्टा स्कीम से लेकर ये एक सोच है कि नामोनिशान किसी और सोच का, किसी और पार्टी का, किसी और एक धारा का खत्म करना है। ये सबसे पहले वहां से शुरू होता है। और इसके लिए जरूरी है समझना कि यह इसका मैनिफेस्टेशन अलग-अलग तरह लेकिन मूल सोच वही है। इसका मैनिफेस्टेशन अलग-अलग तरीके से होता है। कभी भाषा में, कभी बोलचाल में कभी ये जो असहिष्णुता आई है। अभी आप सबका साथ, सबका विकास जो स्लोगन देते हैं। आपने देख लिया सबका साथ, सबका विकास कैसा था अखलाक के साथ। मैंने ट्वीट भी किया। मैंने कहा इससे ज्यादा बड़ा अपमान देश को नहीं हो सकता कि 302, और जज ने बड़ा अच्छा प्रश्न पूछा तो कहा कि हमको पता नहीं किसी केस में हुआ है ऐसा 302 में आप विड्रॉ कर लोगे? मैं तो कभी तक सुना नहीं। ये सोच है कि आप एक सेकंड क्लास सिटीजन हो, आप एक थर्ड क्लास सिटीजन हो. क्या हुआ तो हुआ। बहुमत का तो यह मत था। लिंचिंग का मतलब होता है बहुमत का मत। तो ये सबसे महत्वपूर्ण है। दूसरा यह है कि देखिए। इस स्कीम की निंदा माननीय मुख्यमंत्री गुजरात ने तब की थी जो आज प्रधानमंत्री हैं। अब प्रधानमंत्री के रूप में भी इन्होंने कहा था कि मैं चाहूंगा कि ये रहे क्योंकि आपकी सबसे बड़ी गलती भूल है तो ये रहना चाहिए दिखने के लिए। तो वह दूसरा कारण हो सकता है। सिद्ध करना कि स्मारक है। लेकिन मैं मानता हूं पहला कारण ही मुख्य कारण है। क्योंकि इसका कोई इसका कोई मेरे को तुक नहीं लगता। एक स्कीम चली आ रही है। आपने निंदा कर दी बात खत्म हुई। लोग भूल गए। अब तो अच्छी चल रही है। कोविड में आपने इसको खुद भी नतमस्तक हुए थे। तो अब इसका क्या तुख हो सकता है बताइए? सिवाय अहंकार के। एक है सिद्ध और अहंकार।

राजीव - मतलब पहले नेहरू पर वार किया, इंदिरा जी पर किया, राजीव जी पर अब महात्मा गांधी पर आ गए।

सिंघवी - ये महात्मा गांधी की इतनी बात नहीं है। ये पिछले सरकार की एक बहुत बड़ी शोपीस स्कीम है। इसकी बात है। महात्मा गांधी तो कोलटरल डैमेज हो गए हैं इसमें। क्योंकि आपको अपनी एक छाप छोड़ने के लिए नाम ही बदलना पड़ता है। लेकिन वह जानते हैं कि महात्मा गांधी को किसी नाम की आवश्यकता नहीं है। नामकरण नहीं हो तो इसलिए उनका यह उद्देश्य नहीं कि वो महात्मा गांधी का नाम मिटा दे। लेकिन ये बहुत छोटी सोच है कि मैं अपना नाम या अपना अस्तित्व दिखाऊं। अपनी पहचान बताऊं, अपनी आइडेंटिटी छोडूं, अपना हस्ताक्षर छोडूं, अपना सिग्नेचर छोडूं, अपनी तस्वीर छोडूं। ये गलत है। उसमें कोलटरल डैमेज निश्चित रूप से महात्मा गांधी जी भी हैं। राजीव - अभी अखलाक का आपने जिक्र किया। अच्छा आपने जिक्र किया। ये सवाल बहुत इंपॉर्टेंट है कि देखिए गौ मांस के शक में अखलाक की हत्या हो जाती है। उसके बाद फिर यह केस चलता है सूरजपुर, ग्रेटर नोएडा के आगे और मैं गया हुआ हूं उस गांव में मैं। और आज उसको विथड्रॉ करने की बात हो रही है

सिंघवी - अब आप सोचिए। देखिए, एक प्रावधान है। धारा 321 वापस लेने का। पहली बात 302 में मैं समझता हूं आज तक वापसी नहीं हुई होगी। डिस्चार्ज हो सकता है। देखिए, कोर्ट जो है, कह सकती है कि इसमें कोई तथ्य नहीं है। नहीं है आपने खून किया इसका कोई मेरे पास एविडेंस नहीं है तो छोड़ दो रंजन को, छोड़ दो सिंघवी को। एक्विट हो सकता है सिंघवी। वो कोर्ट करती है। विड्रॉ करता है प्रोसीक्यूशन। 302 में प्रोसिक्यशन नंबर वन है। नंबर टू, देखिए। इसमें एक संदेश भेज रहे हैं वहां के मुख्यमंत्री जो एक शोपीस ब्वाय हैं इस सोच के लिए। यह एक संदेश की बात है कि हमारे धर्म पर एक आरोप के रूप में एक संदेह था कि गऊ माता को यह हुआ। उसके लिए देखिए हम इनको सेकंड क्लास सिटीजन करेंगे। वो आरोप सिद्ध नहीं हुआ है। तीसरा, ये संदेश भेजने की आवश्यकता में उन्होंने पूरा प्रयत्न किया और अगर जज नहीं होता वहां लोअर कोर्ट का तो आप समझिए कैसे चलता। देखिए, बड़ी अजीब बात होती है। अब भी इससे बहुत बड़े संदेह की बात है। बहुत दुर्भाग्य की बात है। अब ये निरस्त हो गया। उन्होंने कहा चलाओ केस। चलाएगा केस कौन? आप चलाएंगे? मैं चलाऊंगा? नहीं, वही प्रोसिक्यूशन चलाएगा जो विड्रॉ करना चाहता था। अब ये बताइए जो प्रोसीक्यूशन विड्रॉ करना चाहता था, कैसे चलाएगा? कैसे चलाएगा? हाउ विल आई प्रोसीक्यूट यू इफ आई वांट टू विड्रॉ द केस अगेंस्ट यू? तो आप समझ लीजिए कि कहीं ना कहीं ये इस प्रकार अपील में कहीं ना कहीं कुछ त्रुटि छोड़ देंगे। तरीके और बहुत होते हैं। आप जानते हैं अगर मैं त्रुटियां छोड़ दूं अपने तहकीकात में तो बेचारे जज को एक्विट करना ही पड़ता है। अब आप यह सोचिए कि एक धर्म के अलावा, एक समुदाय के एक एंगर के अलावा एक मानवता होती है कि नहीं है? उस परिवार का सोचिए आप, जो अभी तो लगी हुई है, कर रही है दलीलें। कहां तक उनके पास साधन है। कहां तक उनके पास पावर है कि पूरे उत्तर प्रदेश जैसे पावरफुल मुख्यमंत्री और उनके स्टेट के अगेंस्ट खड़ी होगी वो। वो जाएगी अपील में। कहीं ना कहीं वो त्रुटि निकाल के निकल जाएंगे। पांच डिस्चार्ज हो जाएंगे। पांच विड्रॉ हो जाएंगे। चार वैसे हो जाएंगे। कोई जज कहेगा व्यवस्था में कि साहब इतना गंदा प्रोसीक्यूशन था। ये जो आप देख रहे हैं ये भी इस सोच का ही एक द्योतक है। और इस देश में ये देश के जो जितने भी स्तंभ हैं हमारे प्रिएमबल के जो स्तंभ हैं उसको कभी कोई आप नाम कुछ भी दे सेकुलरिज्म आजकल शब्द ही बड़ा मजाकिया कर दिया है इन लोगों ने। या कह दीजिए एक सौराद्र या कह दीजिए संघीय भाषा है। कुछ भी कह दीजिए। ये स्तंभ है हमारे रिपब्लिक के। इन स्तंभ को आप एक-एक संदेश भेज रहे हैं स्तंभों पे। इस पर दाग लगा रहे हैं। इसको आप कमजोर कर रहे हैं। इसमें छेद कर रहे हैं।

राजीव - दो केसेज बहुत मजेदार हुए। मतलब जजेस को सैलू्यूट करना होगा। राउज़ एवेन्यू कोर्ट मे राहुल गांधी का मामला, जिस केस के बारे से हमने शुरुआत की। मतलब नेशनल हेराल्ड का मामला। और एक परसेप्शन बन गया है सिंघवी साहब, कि कोर्ट में ये मामला है और विपक्षी दल का या सत्ता पक्ष से कोई लड़ रहा है तो आपका जीतना बहुत मुश्किल है। ये एक परसेप्शन बन गया है आज की तारीख में इस देश में। और दूसरी बात जजेस भी सॉरी टू से कि बहुत हद तक सत्ता पक्ष का साथ देते हुए नजर आते हैं। ये भी परसेप्शन है। और ऐसे में ये दो केस एक सूरजपुर जो अखलाक का मामला है जहां जज ने साफ-साफ मना कर दिया। यानी उन्होंने सत्ता पक्ष को मना किया है। यह तो साफ और न्यूनतम स्तर का कोर्ट और राउज रेवेन्यू कोर्ट भी। ये दिल्ली हाई कोर्ट नहीं है। सुप्रीम कोर्ट नहीं है। तो ये सल्यूट है ऐसे जजेस को।

सिंघवी - बिल्कुल सल्यूट है। ये एक संदेश है। और मैं मजाक में कहता हूं कि जितना ऊपर जाते हो उतना कई बार धैर्य कम होता है। शक्ति और साहस कम होता है। क्योंकि वहां पर कई और कंसीडरेशन होते हैं। आपको चाहिए कुछ ज्यादा। आपकी सोच और मांग जब बढ़ जाती है। तो साहस कम हो जाता है। लेकिन ये बात दुर्भाग्यपूर्ण है। लोअर कोर्ट में भी ऐसी बात नहीं है कि वहां भय नहीं फैला हुआ है। वहां हिचक नहीं फैली हुई है। इसलिए जो अपवाद आते हैं ऐसे कभी-कभी, वो बड़ा अच्छा लगता है देख के। बाद में देखिए क्या हो मैंने जैसा कहा कि येन केन प्रकारेण हर तरह के तौर तरीके होते हैं इन लोगों को वापस रिवर्स करने के और हराने के। लेकिन एक बार भी ये होता है तो एक बड़ी घोषणा होती है। एक मानसिक घोषणा होती है कि न्याय के लिए थोड़ा साहस चाहिए और अन्याय के लिए थोड़ी कॉमन सेंस चाहिए। हम सब जानते हैं कि न्यायिक प्रक्रिया क्या है। जानने के बाद उसको हम बोल नहीं सके या उसको हम प्रमाणित नहीं कर पाए तो वो हमारी हिचक है और आप अपनी हिचक को उठाएं तो कोई कुछ कर नहीं सकता। आपको बता रहा हूं मैं। आपको ज्यादा कुछ हो नहीं सकता। कितना होगा आपको। बताइए क्या कर सकता हूं। मैं सर आपका स्थानांतरण कर सकता हूं। मैक्सिमम स्थानांतरण होगा आपका। ये सोच अगर आ जाएगी तो बहुत फर्क पड़ेगा।

बांग्लादेश का मामला दुर्भाग्यपूर्ण, 2014 से विदेश नीति सवालों के घेरे में

राजीव - लिंचिंग से एक खबर और भी रिलेटेड है। बांग्लादेश का मामला। कहां दो देशों का मामला। कहां मुक्ति संग्राम, कहां हम विजय दिवस मनाते हैं और 16 दिसंबर अभी बीता है और 16 दिसंबर 1971। बांग्लादेश का जन्म। इंदिरा गांधी की पूरी दुनिया तारीफ करती है अमेरिका और पाकिस्तान को छोड़ कर। उस मसले को लेकर मैं बात कर रहा हूं। बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज भारत भारत और बांग्लादेश बिल्कुल तलवार लेकर एक दूसरे के सामने खड़े नजर आ रहे हैं। और या ऐसे कहा जाए कि भारत पाकिस्तान के साथ तो एक दुश्मनी है ही। हम दूसरे साइड भी एक दुश्मन पैदा कर चुके हैं। कर रहे हैं। ये इसलिए कह रहा हूं क्योंकि जो परिस्थितियां अपने यहां निर्मित हो रही हैं। हम लोगों ने अखलाक का केस देखा। हम लोगों ने नफरत का पूरा माहौल देखा। देख ही रहे हैं। और ऐसे में वहां वो हिंदू था या मुसलमान था मायने नहीं रखता। मायने ये रखता है कि एक इंसान को जिस ढंग से मारा गया, वो गलत है। वो गलत है। लेकिन उसको लेकर अपने देश में जो सियासत चल रही है इस पर मैं चाहता हूं कि अपनी बात आप रखिए।

सिंघवी – देखिए, यह एक ऐसा क्षेत्र है विदेश नीति जिसपर बड़ा एक रोचक व्यंग्य है कि हम पूरी तरह से सरकार के साथ हैं। मैं तो कम से कम जो बोलता हूं, मैं सरकार के समर्थन में बोलता हूं। और सरकार गलतियां भी कुछ करे तो बहुत हद तक उनका समर्थन करते हैं। पहली बात ये ध्यान रखना आवश्यक है। विदेश नीति में सीधा कांग्रेस ने या मैंने निंदा की हो बहुत कम मैं देखूंगा इस तरह से। और लोग करें भी तो मैंने कम से कम नहीं की। दूसरा उसके बावजूद यह जानना और अवेयर होना आवश्यक है कि शायद हमारे पड़ोसियों से हमारे रिश्ते इतने खराब कभी नहीं हुए जितने 2014 के बाद हुए हैं। ये एक सामूहिक सच है। मैं इसको निंदा के रूप से नहीं कह रहा हूं क्योंकि मैं समर्थन करता हूं फिर भी सरकार का अगर वो कुछ भी करती है तो वो भारत के हित में कर रही है। लेकिन सच्चाई तो यह है कि ना नेपाल से, ना बांग्लादेश से। पाकिस्तान से तो सवाल ही नहीं उठता। श्रीलंका से अब थोड़ा बहुत हिलना हुआ है। तो कुछ अरसे पहले तक बड़ा ही एक ठंडा सा रिश्ता था। चीन का हमारा कभी हमारा दोस्त रहा ही नहीं। तो हमारे जो इमीडिएट पड़ोसी हैं उनमें हमारी हालत काफी एक नया सिर्फ दोस्त मिला है हमें। कितना चलेगा पता नहीं। अफगानिस्तान। उसको अगर आप पड़ोसी कह दें तो। तो ये जो है कहीं हमको इंट्रोस्पेक्शन, आत्मचिंतन करना आवश्यक है कि हमारे सभी सामूहिक रूप से क्या हमको ज्यादा धौस वाला मानते हैं? क्या हमको ज्यादा एक विभाजन वाली नीति वाला मानते हैं? क्या हमको ज्यादा एक अहंकार वाला बिग ब्रदर मानते हैं। हमारे को आत्मचिंतन करना जरूरी है। तीसरी बात, बांग्लादेश में जो हो रहा है उसकी मैं कड़े शब्दों में भर्त्सना करता हूं। उसमें कोई इफ एंड बट या कंडीशन नहीं लगाता हूं। क्योंकि बांग्लादेश सबसे पहले खुद को सेल्फ डिस्ट्रैक्ट करेगा। उसको नष्ट करने की प्रक्रिया खुद उनके यहां हो रही है। और वहां सीधे रूप से राजनीति खेली जा रही है। इसके कई कारण है वो जानना आवश्यक होता है। यूनुस साहब को भय लगा है कि मैं हटने वाला हूं, जा रहा हूं मैं। मेरे दिन अब गिनती के हैं। उसके बाद मेरी इतनी जबरदस्त अधिकार क्षेत्र और सत्ता नहीं रहेगी। बीएनपी को यह डर है कि जो जमात की पार्टी है और एनसीपी है वह आ जाए या हमको मिलीजुली सरकार करनी पड़े। हमको पावर में आना अति आवश्यक है जल्दी जिससे हम अपने आप को सशक्त कर सकें। तीसरा जो है कि भाई हमको अपने को सशक्त करना है और सर्वव्यापी करना है और डिक्टेटर बनाना है आवामी के वापस आने से पहले क्योंकि आप ये भूल रहे हैं कि बहुत बड़े हिस्से बांग्लादेश के अभी तक आवामी सपोर्टर हैं। जी हसीना सपोर्टर हैं। तो वो रिग्रुप करें और एक मजबूत बने और सामूहिक रूप से वापस सत्ता में आए। उससे पहले हमको अपनी मजबूती बतानी है। इसलिए चुनाव जल्दी चाहिए। चौथा है कि ये जो आवामी है उनको भारत से कोई नफरत नहीं है। एक्चुअली वास्तविकता ये है कि भारत और बांग्लादेश की। मैं सार्क लॉ का प्रेसिडेंट रहा हूं। तो सबसे अच्छे मित्र हमारे बांग्लादेश के हैं वहां। लेकिन सबसे अच्छा तरीका हसीना और आवामी को आइसोलेट करना है कि भारत के विरुद्ध नफरत फैलाओ। यह कारण है। भारत का कोलटरल डैमेज है। तो इस कारण से सरकार की इतनी गलती नहीं है। क्योंकि उनका सबसे बड़ा टेरर है कि हसीना वापस आ जाएंगी। उनका सबसे बड़ा टेरर है कि समय निकलने से साइकिल बदलती है। आप जानते हैं राजनीति साइकिल की चीज होती है। तो आवामी की साइकिल का टाइम आएगा। तो उसको जागरूक रखने के लिए उसको बोइलिंग रखने के लिए आवश्यक है कि आप भारत की नफरत बढ़े। भारत इस वक्त हसीना है। आवामी लीग और भारत और हसीना। उनके लिए सब इंटरचेंजबल हो गया। तो ये सब समझते हुए हमको बहुत ही एक अच्छे तरीके से इसको नेविगेट करना पड़ेगा। आज आसान नहीं है। अच्छा इसमें क्या होता है कि जब हसीना आपकी शत्रु हैं और भारत शत्रु का शत्रु हो जाता है अपने आप। उनका मित्र है तो शत्रु हो गया। इनका तो आपका सबसे बड़ा मित्र वही होगा जो भारत का शत्रु है। वो तो हो गया पाकिस्तान और चीन। अभी तक तो चीन कार्ड बांग्लादेश ने प्ले नहीं किया ज्यादा अभी। मैं तो आगे भविष्यवाणी कर रहा हूं कि चीन कार्ड होगा बड़े तरीके से प्ले। क्योंकि पाकिस्तान तो एक दिखावट का मौखटा है अंदर से खोखला है। पैसे दे नहीं सकता बांग्लादेश को। जो पैसे लेंगे वो चाइना से लेंगे। भारत के एक लेवरेज पर। तो यह है पूरी भौगोलिक चीज़। अब इसमें हम समर्थन दे सकते हैं। बाकी तो विदेश नीति करनी पड़ेगी सरकार को।

राजीव - लेकिन इंटरनली यह बताइए कि अबकि असम और अब पश्चिम बंगाल दोनों में इलेक्शन है। इलेक्शन तो साउथ में केरल, तमिलनाडु और पुदुचेरी में भी है। लेकिन ये दोनों राज्य। इस पर कितना प्रभाव पड़ सकता है यह जो कॉन्फ्लिक्ट है और आपने देखा दिल्ली और छह अलग राज्यों में विश्व हिंदू परिषद का...

सिंघवी - सबसे ज्यादा प्रभाव और दुष्प्रभाव होगा विभाजन का...और यह विभाजन करने वाले वक्तव्यों का असम और बंगाल में। इसमें कोई दो राय नहीं स्पष्ट कहना आवश्यक है और इसलिए पहले से विपक्ष की यूपीए-इंडिया अलायंस की सभी घटकों को उसी हिसाब से नीति बनानी चाहिए। हर चीज में मैं ये भविष्यवाणी कर सकता हूं, हर हफ्ते आप एक डिवाइसिव हिंदू मुस्लिम कम्युनल वक्तव्य या इवेंट या कोई ना कोई वारदात देखेंगे। इसलिए नहीं कि कोई उसमें विश्वास करता है। जो करने वाले भी विश्वास नहीं करते हैं। इसलिए, क्योंकि यही सबसे अच्छा तरीका है विभाजन के आधार पर वोट लेना। ये एक नीति है बंगाल में। भारत की सबसे बड़ी अल्पसंख्यक संख्या 35% मानते हैं। ऑफिशियल कम है। लेकिन एक्चुअल 35% यानी एक तिहाई से ज्यादा। तो उसमें सिर्फ एक दुराव, भय हिंदुओं में। कोई ना कोई एक भय, सोच, विभाजन, अपनत्व वर्सेस दुरत्व की भावना इसी के आधार पर वोट लेने का एक गेम है और वह जानते हैं कि इसी आधार पर वोट मिल सकता है उनको उस प्रदेश में। असम में ये पहले ही हो चुका है क्योंकि वहां पर बड़ा दिलचस्प है। वहां हिंदू मुस्लिम मुद्दा इतना नहीं है। वहां असमीज़ हिंदू और असमीज़ मुस्लिम वर्सेस नॉन असमीज़ मुस्लिम, नॉन असमीज़ हिंदू हैं। असम का एक एथनोग्राफी समझना जरूरी है। असम में है वो हेमंत बिस्वसर्मा ने कर रखा है शुरू से। लेकिन क्योंकि ज्यादा नॉन एसएमस इस्लामिक हैं तो इसलिए वो जो है डोमेस्टिक मुस्लिम्स को भी प्रताड़ना करते रहते हैं। लेकिन वहां भी यही नीति चलेगी असम के चुनाव में। और असम में खासतौर से। क्योंकि हमारे यहां बहुत सशक्त हमारे यहां के लीडर हैं जो कर रहे हैं और हमारे वहां पर उनको सत्तारूढ़ होने के कारण भी भय है कि साइकिल चलेगी नहीं। तो इसलिए वहां तो ये ऑलरेडी उन्होंने किया। हर चीज में हिंदू मुस्लिम ले आते हैं। और हिंदू मुस्लिम का एक वेरिएंट असमीज़- नॉन असमीस। तो इसलिए बांग्लादेश के निवासियों का, उनके नाम का, उनके अस्तित्व का, उनकी आइडेंटिटी का दुष्प्रभाव और दुरुपयोग, मैं कहूंगा, दुरुपयोग बीजेपी निश्चित रूप से 100% स्तर तक करेगी असम में भी और बंगाल में भी करेगी। इसके लिए आपको सावधान होना पड़ेगा। इसके लिए आपको पहले से नैरेटिव बताना पड़ेगा कि साहब, ये देखिए हम जानते हैं ये होने वाला है। ये कर रहे हैं। हमारा कोई इरादा नहीं था। और वो इंसिडेंट्स जो क्रिएट किए जाते हैं। एक चमकीला सा वो डाला जाता है। फायर क्रैकर हर जगह कि इससे एक शोले उभरे। वो आपको उसके अगेंस्ट बहुत ध्यान रखना पड़ेगा। और लूज कमेंट्स आप बोलोगे तो उसका दुरुपयोग करके उसके ऊपर और लूज कमेंट्स आएंगे।

राजीव - मतलब साफ है कि बांग्लादेश में यूनुस जो हैं वह चाहते हैं कि सत्ता पर काबिज रहे और फरवरी में उन्होंने चुनाव की घोषणा कर दी है। तो उससे पहले बांग्लादेश में चल रहा है। फिर इधर भारत के लिए बीजेपी के लिए विन विन सिचुएशन है क्योंकि जो कॉन्फ्लिक्ट उसमें भी एक हिंदू की हत्या वहां पे दुर्भाग्यपूर्ण है। लेकिन फिर भी उसका बेनिफिट कल से जो दिख रहा है यहां पर हिंदुस्तान में जो विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। वीएचपी की तरफ से और चुनाव भी है सामने फरवरी के बाद मार्च अप्रैल में। दो महीने में चुनाव इन पांचों राज्यों में करवाना है तो वो एक बेहतर स्थिति बनाने की....

सिंघवी - और ये चार इनमें से हारने वाले प्रदेश हैं जो पांच आपने नाम लिए बीजेपी के लिए। तो वहां तो और भी आवश्यक है ये दुराव करवाना। ये आप हर हफ्ते हर दिन देखेंगे। दुराव की कोई ना कोई नई, एक प्रैक्टिस, नई एक वारदात, नया एक वक्तव्य, नई एक चिंगारी, कुछ भी कह लीजिए आप देखेंगे। कभी केरल में देखेंगे, कभी यहां देखेंगे, कभी वहां देखेंगे। तमिलनाडु में भी होगी। हालांकि तमिलनाडु में खैर इतना वो नहीं कर सकते, तमिलनाडु में समीकरण थोड़ा अलग है लेकिन वहां भी कोशिश तो करेंगे ही। राजनीति दूसरी तरह की होगी।

राजीव - मनरेगा पर आप जो बात कर रहे थे वो बात यहां साफ आगे दिखाई देती है कि वो किसी भी हद तक की राजनीति कर सकते हैं। सिंघवी साहब बहुत सारी बातें हमने कीं। बहुत गंभीर चर्चा और बहुत इंटरेस्टिंग। आप जैसा बताते हैं तो मजा आता है सुन के भी और चर्चा करेंगे। बहुत-बहुत शुक्रिया आपका समय देने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया।

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https://www.youtube.com/watch?v=६ल१वहनकल००



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